NO DISCRIMINATORY ONLINE EXAMS using pretext of COVID 19 Crisis!

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COLLECTIVE started this petition to University Grants Commission and

स्वास्थ्य आपातकाल के आड़ में ऑनलाइन परीक्षा लागू करना नही सहेंगे!
UGC और MHRD तक अपनी आवाज़ पहुँचायें| [English translation below]

कोविड- 19 जैसी महामारी के आने के पश्चात सभी गतिविधियों के साथ - साथ शैक्षणिक गतिविधि भी पूरी तरह रुक गई। जिसने छात्रों के बीच चिंता और अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। Amity और जिंदल जैसे निजी विश्वविधालयो ने इस परेशानी को कम करने के लिए ऑनलाइन क्लास और परीक्षा की और कदम बढ़ा दिया है। साथ ही इसने विभिन्न सरकारी विनियामक निकायों को एक ऑनलाइन शिक्षा मंच के निर्माण की लंबी परियोजना को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित भी किया है। UGC के चुप्पी में, मोतिहारी के महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय ने व्हात्सप्प पर परीक्षा लेने का निर्णय लिया है। लेकिन हमें इसे आलोचनात्मक दृष्टि से देखने को मजबूर करती है कि निकट भविष्य में इसके परिणाम क्या होंगे? यह छात्रों के एक बड़े समुदाय पर क्या प्रभाव डालेगा और यह किस तरह के समाज का सृजन करेगा।

समानता के अधिकार को नकारती ऑनलाइन परीक्षा

तमाम फी वृद्धि के बावजूद अलग-अलग तबके के लोग सार्वजनिक संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए पहुंचते है। इसलिए हम कह सकते हैं कि इस कोविड-19 के कारण हुए लॉक डॉउन का प्रभाव अलग-अलग विद्यार्थियों पर अनिवार्यतः अलग-अलग होगा। यह बात किसी के पास केवल इंटरनेट की पहुंच के आधार पर नहीं कही जा रही (जो कि NSSO के एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट मात्र 12% भारतीय छात्रों तक ही उपलब्ध है) बल्कि इसके अलावा अन्य और कई कारण और आयाम भी है।

लाइब्रेरी, रीडिंग रूम और हॉस्टल बंद किया जाने के कारण, छात्रों का एक बड़ा समूह ऐसा है जिसे अपने- अपने घरों में एक ऐसे स्थान की तलाश करने में मुश्किल आएगी जहां वह शांति पूर्वक बैठ के पढ़ सके। एक महिला छात्रा के लिए घर में बैठ के पढ़ना, ऑनलाइन क्लास करना और अपना शोध पत्र लिखने में कहीं ज्यादा कठिनाई है क्योंकि उसे घरेलु कामों में पुरुषों से ज्यादा समय देना पड़ता है। या यूं कहे कि ये परंपरा है, जिससे घर में रहते उन्हें बार बार घर के काम के लिए घर वालो के द्वारा बुलाया जाना लाज़मी है। वहीं अगर हम दलित और मुसलमानों की और देखे तो उनकी परेशानी अलग है। कई इलाकों में उन्हें अपने रोजमर्रा के समान को जुटाने के लिए ही काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। क्योंकि समाज के द्वारा अपनाए गए ‘social distancing’ खत्म नहीं हो पाई है, बल्कि और अलग-अलग सरकारी नीतियों और राजनीति से इन्हें लॉकडाउन में बढ़ावा ही दिया गया है।

किसी भी परीक्षा की पहली शर्त होती है कि सभी छात्रों को समान मंच और समान तैयारी का मौका मिले। इंटरनेट और डिजिटल माध्यम का प्रयोग समानता लाने के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह समानता लाने की सोच के साथ किया जाए। परन्तु इसके बिना, ऑनलाइन परीक्षा, कंप्यूटर पर MCQ परीक्षण और इस तरह के अन्य विकल्प केवल असमानता को बढ़ावा देंगे।

किसको डिजिटल/डिस्टेंस शिक्षा के ओर धकेला जा रहा है?

NSSO 2014 का एक आंकड़ा यह बताता है कि भारत में 10% से भी कम उच्च शिक्षा में जाते है (खासकर जिसमे ग्रामीण भारत, महिला और पिछड़े जाति/जनजाति की संख्या ज्यादा है)। हाल ही में सरकार ने कुछ कदम ऐसे उठाए है जिससे गुणवत्तपूर्ण शिक्षा के दायरे को बढ़ाने के बजाए, शिक्षा में असामनता को पाटने के बजाए, उसे बढ़ने की और पहल की है। हाल ही में आए नई शिक्षा नीति 2019 को देखे तो हमे पता चलता है कि कैसे इसके द्वारा धीरे- धीरे और बड़े स्तर पर सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों को निजी हाथों में दिया जा रहा है, खास कर ‘वित्त स्वायत्ता’ के नाम पर। यह मुहिम सरकार के द्वारा शुरू की जा चुकी है। नई शिक्षा नीति 2019 के तहत् एक पदानुक्रमित शिक्षा संरचना बनाने, जिसमे कार्यबल दो शिविरों में विभाजित होगा- उच्च कुशल और विशिष्ट कर्मियों का एक समूह और कम कौशल वाले कर्मियों का एक विशाल समूह। इसी नीति की निरंतरता में एक व्यवसायिक परिशिक्षण की शुरुआत की गई और महाविधालय और विश्वविधालय के लिए स्व-अध्ययन सामग्री तैयार की गई। गत वर्ष वित्त मंत्री श्रीमती सीतारमन ने टॉप-100 NIRF रैंकिंग के संस्थाओं को ऑनलाइन कोर्स की तरफ बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया।

इस तरह के सभी क़दमों के लिए घोषित लक्ष्य उन सभी छात्रों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराना या शिक्षा तक उन विद्यार्थियों की पहुंच को निश्चित करना रहा है, जो अलग-अलग कोर्स के बढ़ते लागतों के कारण संसाधन से वंचित रह जाते है। लेकिन असलियत यह रहा है की इस आड़ में जनता के पैसे को सरकार ने कॉरपोरेट जगत के लिए निम्न कौशल के प्रशिक्षण के कार्यक्रम में खर्च किया है। तो अगर इस तरह के लक्ष्य को लेकर अधिकारी ऑनलाइन मोड में शिक्षा को ले जाने का प्रयास कर रहे हैं तो इसका जोरदार विरोध करना चाहिए।

नवउदारवाद के आक्रमण और तीव्रता के कारण हमने छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न अन्य हितधारकों को सड़कों पर देखा है। हाल ही में JNU, IIMC, IIT, AIIMS, TISS, NLUऔर उत्तराखंड में आयुर्वेदिक कॉलेजों ने इस तरह के संघर्षों को देखा है और पूरे देश में छात्र इन संघर्षों के प्रति एकजुटता से सामने आए हैं। चल रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट हमें उन कार्यक्रमों को त्यागने के लिए मजबूर करते हैं जो हमें विफल कर रही है और जो आवश्यक है, उसे लागू करने के लिए और मजबूर कर रही है। 'आपातकालीन उपायों' की आड़ में जनविरोधी नीतियों को वैध बनाने की किसी भी कोशिश को रोकने के लिए हमे अपनी पूरी ताकत से लड़ना होगा। इसलिए, हम इस तरह के सभी प्रयासों को अस्वीकार करते हैं और यूजीसी से वैकल्पिक तरीकों की सिफारिश करने के लिए मांग करते हैं, जिसमें शिक्षा संकट को इस मोड़ पर हल किया जा सकता है। बहुकांश आबादी के लिए ऑनलाइन/डिस्टेंस लर्निंग को बढ़ावा नही दिया जाना चाहिए अगर इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अधिक विशेषाधिकार प्राप्त लोगो तक ही सीमित कर दिया जाए।

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The outbreak of COVID-19 has brought all academic activities to a complete halt thereby generating much anxiousness and uncertainty among the students. Private Universities, such as Amity and OP Jindal, have tried to mitigate this problem by taking recourse to online classes and conducting of online examination. This has given an impetus to various state regulatory bodies to finish a long-standing project of building an online education platform. Today, Mahatma Gandhi Central University, Motihari has directed students to submit exam answers over WhatsApp despite coming under UGC regulation. While the use of technology to facilitate learning should be a welcome move, we need to be critical as to what purpose it might serve in the near future, what consequences will it have for the vast majority of the students in this country and eventually what society it will give shape.

ONLINE EXAMS NEGATE 'EQUALITY OF OPPORTUNITY'

Despite rising costs, public education institutions are accessed by varied populations. So, the effect of a lockdown is massively different from student to student.

This is not simply limited to home internet access (which is available to only 12.5% Indians, as per NSSO 2014). A majority of students may find it extremely difficult to find a place in their home where they can sit and concentrate on their studies. Beyond financial status alone, a woman student at home during lockdown is more likely to be forced into household chores which may not leave her any time to study while a Dalit or a Muslim family may be find it harder to acquire basic necessities from the local grocery store due to the new state-approval for pre-existing 'social distancing'. In a country where the supposed deity Ganesh is celebrated for plastic surgery instead of promoting the science advanced by Shusruta, such scenarios are not completely unimaginable and in fact a glance at daily news reports prove so.

The premise of any examination is that all students must be able to prepare for it on an equal footing. The internet and digital mediums can be used to promote such equality if this principle is valued but without doing so, online examinations, MCQ-based 'standardised testing' and other such alternatives only deepen the inequality of opportunity within the education system.

WHO IS BEING PUSHED TOWARDS 'e-LEARNING'?

NSSO data reveals that, as of 2014, less than 10% of Indians (with an even lower proportion among rural Indians, women and the historically oppressed castes/tribes) could access any form of higher education after school. Instead of remedying such stark inequality by expanding quality higher education coverage, recent moves have aimed at formalising these divides.

The New Education Policy has laid out extensive plans to slowly and increasingly privatize the state-owned Higher Education Institution, primarily under the garb of financial 'Autonomy'.NEP 2019 proposes creating a hierarchical education structure such that it will divide the workforce in two camps: a small group of highly skilled and specialized personnel and the other of the vast majority of the workforce with low skills. In continuation of such policies, introduction of vocational training and self-study material for online courses were devised for colleges and universities. Last year, Finance Minister Sitharaman announced that top 100 NIRF-ranked institutes will now be incenticised to move towards online course.

The declared goal for all such moves has always been to make education accessible to the vast majority of the students who cannot afford a discipline specific course due to rising costs. In actuality, this has reduced state spending on necessary infrastructure while increasing the share of tax money spent on subsidize low skill training programmes for corporates. When such is the aim all efforts on part of the authorities to shift to an online mode of education should be resisted with all vociferousness.

In India we have seen one policy after the other to further the neoliberal cause and in the same intensity we have seen students and teachers and various other stakeholders come out on the streets. Recently JNU, IIMC, IITs, AIIMs, TISS, NLUs, Ayurvedic Colleges in Uttarakhand have witnessed such struggles and students throughout the country have come out in solidarity to these struggles. The ongoing public health crisis forces us to discard what has failed us and put in place what is required. Any attempt to legitimize anti-people policies under the garb of 'emergency measures' must be fought back tooth and nail! Hence, we reject all such attempts and demand from the UGC to consider alternative methods in which the education crisis can be resolved instead of promoting a shift towards online/distance learning for the majority while making quality education even more of a privilege for the few.

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