Petition Closed

Stop the VC, Delhi University from implementing Anti Student 'Reforms'

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Petition to the Vice Chanceller, Delhi University 

Respected Sir,
There have been a number of 'reforms' in the University over the past few years, and we are very concerned about the direction they have taken.
1. Semesterisation in its current form has only led to chaos. The COURSES ARE BADLY DIVIDED, with no sense of structure at all in the content of the courses. The SYLLABUS IS INVARIABLY FINISHED IN A RUSHED MANNER, which affects the standard of teaching.
2. There is a lot of administrative chaos, so much so that the QUESTION PAPERS ARE DISTRIBUTED IN A DISORGANISED MANNER, often, as we experienced in the last semester REACHING THE WRONG CLASS. Many issues have not been thought out properly. For example, in case a student falls ill during the exams, due to lack of retests, they fail all the papers, and have to give them along with all their other papers the following year, or in some cases may have to repeat the year.
3. Marks have been inflated arbitrarily, leading to a COMPLETE LACK OF CREDIBILITY in the University education and examination procedures.
5. Around 4000 permanent TEACHER POSTS HAVE NOT BEEN ADEQUATELY FILLED, and are either lying empty, or are filled by ad hocs. Often, lack of faculty leads to OPTIONAL PAPERS NO LONGER BEING AN OPTION, despite the university rule that if ten or more students opt for a paper it must be offered.
6. WE ARE PARTICULARLY CONCERNED ABOUT THE RECENT ANNOUNCEMENT THAT EXAM ANSWER SHEETS WILL NO LONGER BE ANONYMOUS TO THE EVALUATOR. Instead s/he will have the information of the student's name, father's name and institution while checking the paper. This completely undervalues the idea of an impartial free and fair method, and could LEAD TO CASTE, GENDER, RELIGIOUS AND INSTITUTIONAL BIASES.
7. Along with this, the PROPOSAL TO DO AWAY WITH REVALUATION is alarming. THE CURRENT FEE FOR REVALUATION, RS. 1000, IS ALSO ONE MANY STUDENTS CAN'T AFFORD. Doing away with revaluation altogether will mean that there will be no accountability, particularly against the biases that will be produced due to lack of anonymity. The process of revaluation was implemented after a student struggle, and doing away with this is completely regressive. WE THEREFORE REQUEST YOU TO IMMEDIATELY REVOKE THIS PROPOSAL ALONG WITH THE PREVIOUS ONE.
8. The Meta University and Meta College system, we feel, might lead to greater problems, due to lack of faculty, as well as due to its implementation without having created a full structure for it and having determined the course. The three exit concept will lead to people who can't afford the education moving out with a lower degree, thus bringing down education system itself. The Meta system, along with the proposal for a public private partnership would LEAD TO A CONSIDERABLE FEE HIKE, thus making it unaffordable for low income groups to finish their education.
We urge you therefore to immediately reinstate anonymity of the examination procedure and retain revaluation at a low cost and reinstate retests. As members of the university, and affected by these decisions, we stand against the current form of the semester system, the privitisation of the university, the hasty implementation of the Meta system. We also demand that teachers posts be adequately filled such that the standard of education is maintained. Further we demand that the the current course structure and various other problems of the semester system be addressed immediately. Above all we urge you not to undermine the idea of a University space that is secular and democratic, with no class caste, language, institutional and gender biases, all of which are becoming more prevalent due to the recent set of reforms.
Yours sincerely,
The Undersigned"

दिल्ली विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर को याचिका

मानवीय महोदय
पिछले कुछ सालों में दिल्ली विश्वविद्यालय में काफ़ी बदलाव आये हैं, और इनकी दिशा को लेकर हम काफ़ी चिंतित हैं|
१. सेमेस्टरीकरण ने अपने स्थाई रूप में काफ़ी उलझाने पैदा की हैं| विषयों का विभाजन विषयसूची को नज़रंदाज़ करते हुए रखा गया है| पाठ्यक्रम काफ़ी जल्दबाज़ी में समेटा जाता है जो शक्षा की वावार्यता को प्रभावित करता है|
२. काफ़ी प्रशासनिक उलझाने पाई गई हैं, यहाँ तक की प्रश्नपत्र भी अव्यवस्थित तरीके से बटते हैं, जैसे कि हमने पिछले सेमेस्टर में देखा कि प्रश्नपत्र गलत कक्षाओं में पहुचे| कई मुद्दों पर ढंग से विचार नहीं हुआ है, जैसे कि, रीटेस्ट हटाने के कारण अगर कोई छात्र परीक्षा के समय बीमार पड़ता है और परीक्षा नहीं दे पता तो वह उस विषय में अनुत्तीर्ण हो जाता है, और अगले साल के विषयों के साथ उस विषय कि परीक्षा भी देनी पड़ती है, या कई बार उसे साल दौहराना पड़ता है|
३. अंको का विभाजन और बढ़ाव बहुत ही असमान है, जो विश्वविद्यालय कि शिक्षा प्रणाली और मान्यता पर प्रश्न उठाता है|
४. हिंदी माध्यम के छात्रो के लिए पर्याप्त किताबें उपलब्ध नहीं हैं| यह बहुत ही निंदनीय है|
५. लगभग चार हज़ार नियमित शिखाकों के पद पर्याप्त ढंग से नहीं भरे गए हैं| यह या तो रिक्त हैं या तो ऐड होक तौर पर दिए गए हैं| कई बार शिक्षकों कि कमी वैकल्पिक विषय को एक विकल्प नहीं रहने देती, जबकि विश्वविद्यालय का एक नियम है कि अगर दस छात्र भी विषय को चुनते है तो उनको यह विषय प्रदान करना होगा|
६. हम खास तौर पर हाल ही में की गई घोषणा को लेकर चिंतित हैं, जिसके अनुसार विद्यार्थी की कांकरी मूल्यांकनकर्ता के लिए अज्ञात नहीं होगी| बल्कि मूल्यांकनकर्ता को छात्र का नाम, छात्र के पिता का नाम, और संसथान की भी जानकारी होगी| यह एक निश्पक्ष स्वतन्त्र तरीके को पूर्ण रुप से निर्मूल कर देता है| यह लिंग, जाती, धर्म और संसथान के आधार पर भेद भाव को बढ़ावा देगा|
७. साथ ही में, पुनरमूल्यांकन को समाप्त करने का प्रस्ताव मान्य नहीं है| वर्त्तमान पुनर्मूल्यांकन शुल्क रूपए एक हज़ार हैं, जो बहुत छात्रों के लिए महंगा है| पुनर्मूल्यांकन को हटा देने का मतलब यह होगा, की उस छात्र के पास कोई चारा नहीं रह जाएगा जो कि किसी भी पक्ष्पाद का शिकार हो| पुनर्मूल्यांकन की क्रिया एक छात्र संघर्ष के कारण की चर्चा में आई थी और इसे हटा देना शर्मनाक होगा| इसलिए हमारी आपसे मांग है की आप इन दोनों प्रस्तावों को खारिज़ करे|
८. हमें लगता है की यह मेटा यूनिवर्सिटी प्रणाली काफी समस्याएं पैदा करेगी, क्यूंकि न तो पूरी मात्रा से शिक्षक है और ना ही पाठ्यक्रम का ढांचा सही ढंग से निर्धारित किया गया है| 'थ्री एग्जिट' प्रणाली शिक्षा के स्वरुप को काफ़ी शर्मनाक बनाएगी| साथ ही में मेटा सिस्टम और बाजारीकरण के कारण शिक्षा शुल्क काफ़ी मात्रा में बढ़ जाएगा, जो कम आय वाले लोगों के लिया कठिनाई पैदा करेगा|

हम आपसे यह मांग करते हैं कि परीक्षा प्रक्रिया को अज्ञात रहने दे, पूर्नामुल्यांकन को कम शुल्क में स्थापित करें और रीटेस्ट को नियुक्त करें| विश्वविद्यालय के सदस्य होने के नाते और इन निर्णयों से प्रभावित होने के नाते हम इस सेमेस्टर पदति, विश्वविद्यालय का निजीकरण, मेटा सिस्टम कि जल्दबाज़ी में स्थापना के खिलाफ हैं| हम आपसे यह भी मांग करते हैं कि अध्यापको के पद पर्याप्त ढंग से भरे जाये ताकि शिक्षा का स्तर बना रहे| हम यह भी मांग रखते हैं आप जल्द से जल्द वर्तमान पाठ्यक्रम, एवं सेमेस्टर सिस्टम की अन्य समस्याओं पर ध्यान दें| उच्चतम स्तर पे हम आपसे यह आग्रह करते हैं कि विश्वविद्यालय कि लोकतान्त्रिक बुनियाद को कमज़ोर ना बनाये, जो कि जाति, वर्ग, भाषा, धर्म, संस्था और लिंग के पक्षपादों से मुक्त है| लाये गए बदलावों से यह पक्षपाद और गहरे होते जा रहे हैं|
भवदीय/ भवदीया
निम्न हस्ताक्षरकर्ता


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