

सरकार द्वारा उपभोक्ता संरक्षण एवम् उपभोक्ता जागरूकता के बड़े बड़े दावे किये जा रहे किन्तु मेरे द्वारा माननीय प्रधानमंत्री जी को सम्बोधित दिनांक 30-06-2018 को पंजीकृत कर वास्तवित मूल्यांकन हेतु जांच कराने के स्थान पर केवल औपचारिकता पूर्ण कर विषय को बन्द करने की सूचना प्रदान कर दी गई है।
क्या यही सरकार की गुड गवर्नेन्श है?
माननीय प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पारदर्शिता और व्यक्तिगत जवाबदेही नीति के तहत जांच प्रारम्भ कर वास्तविक सच्चाई सामने लाने एवम् दोषी अधिकारियों को कड़ा संदेश देने के स्थान पर दोषी अधिकारियों को ही बचाने का प्रयास ही वर्तमान सरकार के बदलते भारत की तस्वीर है?
क्या बैक के प्रबंध निदेशक द्वारा आज तक किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया प्रदान नहीं करना सत्ता के दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आता जबकि बैंक की घोषित ग्राहक अधिकार नीति में ग्राहक को संतुष्ट नहीं होने पर सीधे प्रबंध निदेशक को पत्र प्रेषित करने का अधिकार प्राप्त है?
बैंक की घोषित नीति में प्रबंध निदेशक एवम् कार्यकारी अधिकारी सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त है किन्तु अन्य निचले अधिकारियों द्वारा ही अपने स्तर पर विषय को बन्द करने की सूचना प्रदान कर देना अपने प्राप्त अधिकारों का अतिक्रमण नहीं है?
उच्च अधिकारियों को प्रेषित पत्राचार का जवाब उनके द्वारा प्रदान करने के स्थान पर दोषी अधिकारी या उनके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ही बारबार प्रदान कर विषय को बन्द करने की सूचना प्रदान कर देना सरकार द्वारा स्थापित नियमों की अवहेलना की श्रेणी में नहीं आता है?।
ग्राहक शिकायत का निराकरण विकेंद्रित किये जानें की सूचना बारबार प्रदान कर अपनी व्यक्तिगत जवाबदेही से बचने का प्रयास करना क्या प्रधानमंत्री जी की घोषित नीति के प्रति गम्भीरता में कमी नहीं है?
प्रधानमंत्री जी द्वारा घोषित पारदर्शिता और व्यक्तिगत जवाबदेही नीति के तहत यदि लोकतंत्र में स्वयं प्रधानमंत्री जी को ही सम्बोधित शिकायत पर त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित नहीं होती है तो है तो ऐसी नीतियों की घोषणाओं का क्या औचित्य है?
क्या यही हमारे बदलते भारत की नई तस्वीर है?