जनप्रतिनिधि करें भारत की सेना के शहीदों का सम्मान


जनप्रतिनिधि करें भारत की सेना के शहीदों का सम्मान
समस्या
भारत के शहीदों को एक ट्वीट कर के याद किया जाता है और फिर हमेशा के लिए भुला दिया जाता है!
मेरा नाम रिटायर्ड ब्रिगेडियर सीके सूद है, मैं शहीद मेजर अनुज सूद का पिता हूँ, जिसने 30 साल की कम उम्र में भारत के लिए अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। मैं ये पेटीशन केवल अपने बेटे के लिए नहीं, बल्कि भारत के हर उस बेटे/बेटी के लिए लिख रहा हूँ जो देश के लिए अपनी जान कुर्बान करते हैं। कृपया साइन करें और मेरी पेटीशन को सपोर्ट करें।
मेरे बेटे ने हमेशा खुद से पहले देश को रखा, किसने सोचा था कि जो बचपन से ही फौजी बनने का सपना देखते आया था वो 30 साल की उम्र में कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए भारत की लिए कुर्बान हो जाएगा।
मेरा बेटा मेजर अनुज और 4 और बहादुर सैनिक, कर्नल आशुतोष शर्मा, नायक राजेश कुमार, लांस नायक दिनेश कुमार, सब इंस्पेक्टर शकील काज़ी मई, 2020 में कश्मीर के हंदवारा में 4 आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए, इन आतंकियों ने आम लोगों को बंधक बनाकर रखा था।
दुखद बात ये है कि जब इनके परिवार वालों को 3 मई की सुबह 8 बजे शहादत की सूचना दी गई, उससे पहले ही वॉट्सऐप और मीडिया के कुछ हिस्सों में ये सूचना आ चुकी थी। जब सेनाएं कोरोना योद्धाओं के लिए फ्लाईपास्ट कर सकती हैं तो देश के शहीदों के लिए क्यों नहीं, ना उनके लिए झंडे को आधा मोड़ा जाता है, ना राष्ट्रीय शोक, ना कोई टेलिकास्ट जो उन बहादुरों को सलामी दे।
क्या आप जानते हैं कि सरकार ने कैसे उनकी शहादत को सम्मानित किया? उन्होंने एक ट्वीट किया। जी हाँ, 140 अक्षरों का ट्वीट। बताया गया कि देश के 5 बहादुर जवान आतंकियों का सामना करते हुए शहीद हो गए, पर उनका नाम नहीं लिया गया।
ये विडंबना है कि जिस देश में जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा राजनीति होती है, उसके कारण शहीद हो जाने वाले जवानों के लिए नेताओं के पास झूठी सांत्वना भी नहीं होती। साल दर साल देश के जवान शहीद होते हैं, उनके परिवारों को उनके शरीर के टुकड़े बंटोरने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है। उन्हें एकबार सम्मान मिलता है और फिर हमेशा के लिए भुला दिया जाता है। मैं इस प्रथा को अपनी पेटीशन से बदलना चाहता हूँ और मुझे आपका समर्थन चाहिए।
एक ट्वीट पर्याप्त नहीं होता। शहीदों का नाम लें। उनके बलिदान को सम्मानित करें। उनके परिवार के साथ खड़े हों। हमारे शहीदों के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं!
चलिए एक शुरुआत करें। मेरी पेटीशन साइन करें ताकि शहीद जवानों के परिवार को प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति कार्यालय से आधिकारिक पत्र आए जो उनके बलिदान को सम्मानित करे।
इन परिवारों के पास उनके बेटों की बहादुरी की कहानियों के अलावा कुछ नहीं बचता,जिसे थामकर वो ज़िंदगी गुज़ारें। ऐसे में उनके बेटों की शहादत को नमन करते हुए देश के सर्वोच्च कार्यालय से एक पत्र मिलना बहुत सकारात्मक होगा। इस पत्र/मेमेंटो को एकमात्र सबूत के रूप में मान्यता दी जाए कि उन्होंने देश के लिए अपनी जान दी। उन्हें अन्य प्रकार की कागजी कार्यवाही में ना उलझाया जाए।
लेकिन ये केवल शुरुआत है, सरकार को और कदम उठाने होंगे। एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल होना चाहिए जो ना केवल शहादत के ठीक बाद बल्कि आने वाले हर साल शहीदों का सम्मान करे।
हमें देश के शहीदों के लिए राष्ट्रीय सम्मान एकत्रित करना चाहिए और सरकार की ओर से एक मज़बूत प्रतिक्रिया होनी चाहिए जब भी कोई देश के लिए अपनी जान देता है। देश के सैनिकों के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं?
मैं आशा करता हूँ मेरी इस पेटीशन के बाद सरकार ज़रूरी कदम उठाएगी।
मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ कि मेरी पेटीशन साइन/शेयर करें और सरकार से गुहार लगाएं कि वो देश के शहीदों, उनके परिवार को इस प्रकार सम्मानित करें, जो उनके बलिदान के अनुकूल हो।
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भारत के शहीदों को एक ट्वीट कर के याद किया जाता है और फिर हमेशा के लिए भुला दिया जाता है!
मेरा नाम रिटायर्ड ब्रिगेडियर सीके सूद है, मैं शहीद मेजर अनुज सूद का पिता हूँ, जिसने 30 साल की कम उम्र में भारत के लिए अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। मैं ये पेटीशन केवल अपने बेटे के लिए नहीं, बल्कि भारत के हर उस बेटे/बेटी के लिए लिख रहा हूँ जो देश के लिए अपनी जान कुर्बान करते हैं। कृपया साइन करें और मेरी पेटीशन को सपोर्ट करें।
मेरे बेटे ने हमेशा खुद से पहले देश को रखा, किसने सोचा था कि जो बचपन से ही फौजी बनने का सपना देखते आया था वो 30 साल की उम्र में कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए भारत की लिए कुर्बान हो जाएगा।
मेरा बेटा मेजर अनुज और 4 और बहादुर सैनिक, कर्नल आशुतोष शर्मा, नायक राजेश कुमार, लांस नायक दिनेश कुमार, सब इंस्पेक्टर शकील काज़ी मई, 2020 में कश्मीर के हंदवारा में 4 आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए, इन आतंकियों ने आम लोगों को बंधक बनाकर रखा था।
दुखद बात ये है कि जब इनके परिवार वालों को 3 मई की सुबह 8 बजे शहादत की सूचना दी गई, उससे पहले ही वॉट्सऐप और मीडिया के कुछ हिस्सों में ये सूचना आ चुकी थी। जब सेनाएं कोरोना योद्धाओं के लिए फ्लाईपास्ट कर सकती हैं तो देश के शहीदों के लिए क्यों नहीं, ना उनके लिए झंडे को आधा मोड़ा जाता है, ना राष्ट्रीय शोक, ना कोई टेलिकास्ट जो उन बहादुरों को सलामी दे।
क्या आप जानते हैं कि सरकार ने कैसे उनकी शहादत को सम्मानित किया? उन्होंने एक ट्वीट किया। जी हाँ, 140 अक्षरों का ट्वीट। बताया गया कि देश के 5 बहादुर जवान आतंकियों का सामना करते हुए शहीद हो गए, पर उनका नाम नहीं लिया गया।
ये विडंबना है कि जिस देश में जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा राजनीति होती है, उसके कारण शहीद हो जाने वाले जवानों के लिए नेताओं के पास झूठी सांत्वना भी नहीं होती। साल दर साल देश के जवान शहीद होते हैं, उनके परिवारों को उनके शरीर के टुकड़े बंटोरने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है। उन्हें एकबार सम्मान मिलता है और फिर हमेशा के लिए भुला दिया जाता है। मैं इस प्रथा को अपनी पेटीशन से बदलना चाहता हूँ और मुझे आपका समर्थन चाहिए।
एक ट्वीट पर्याप्त नहीं होता। शहीदों का नाम लें। उनके बलिदान को सम्मानित करें। उनके परिवार के साथ खड़े हों। हमारे शहीदों के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं!
चलिए एक शुरुआत करें। मेरी पेटीशन साइन करें ताकि शहीद जवानों के परिवार को प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति कार्यालय से आधिकारिक पत्र आए जो उनके बलिदान को सम्मानित करे।
इन परिवारों के पास उनके बेटों की बहादुरी की कहानियों के अलावा कुछ नहीं बचता,जिसे थामकर वो ज़िंदगी गुज़ारें। ऐसे में उनके बेटों की शहादत को नमन करते हुए देश के सर्वोच्च कार्यालय से एक पत्र मिलना बहुत सकारात्मक होगा। इस पत्र/मेमेंटो को एकमात्र सबूत के रूप में मान्यता दी जाए कि उन्होंने देश के लिए अपनी जान दी। उन्हें अन्य प्रकार की कागजी कार्यवाही में ना उलझाया जाए।
लेकिन ये केवल शुरुआत है, सरकार को और कदम उठाने होंगे। एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल होना चाहिए जो ना केवल शहादत के ठीक बाद बल्कि आने वाले हर साल शहीदों का सम्मान करे।
हमें देश के शहीदों के लिए राष्ट्रीय सम्मान एकत्रित करना चाहिए और सरकार की ओर से एक मज़बूत प्रतिक्रिया होनी चाहिए जब भी कोई देश के लिए अपनी जान देता है। देश के सैनिकों के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं?
मैं आशा करता हूँ मेरी इस पेटीशन के बाद सरकार ज़रूरी कदम उठाएगी।
मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ कि मेरी पेटीशन साइन/शेयर करें और सरकार से गुहार लगाएं कि वो देश के शहीदों, उनके परिवार को इस प्रकार सम्मानित करें, जो उनके बलिदान के अनुकूल हो।
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फैसला लेने वाले

29 मई 2020 पर पेटीशन बनाई गई