Aggiornamento sulla petizioneNO DISCRIMINATORY ONLINE EXAMS using pretext of COVID 19 Crisis!Petition now translated into Hindi: almost 500 signatures recieved
COLLECTIVE
21 apr 2020

After NDTV's positive coverage, a supporter has translated our petition into Hindi. Almost 500 signatures have come in so far. Please circulate this translation so that we can ensure No Discriminatory Online Exams are pushed in during COVID 19 Crisis!

स्वास्थ्य आपातकाल के आड़ में ऑनलाइन परीक्षा लागू करना नही सहेंगे!
UGC और MHRD तक अपनी आवाज़ पहुँचायें: change.org/NoOnlineExams

कोविड- 19 जैसी महामारी के आने के पश्चात सभी गतिविधियों के साथ - साथ शैक्षणिक गतिविधि भी पूरी तरह रुक गई। जिसने छात्रों के बीच चिंता और अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। Amity और जिंदल जैसे निजी विश्वविधालयो ने इस परेशानी को कम करने के लिए ऑनलाइन क्लास और परीक्षा की और कदम बढ़ा दिया है। साथ ही इसने विभिन्न सरकारी विनियामक निकायों को एक ऑनलाइन शिक्षा मंच के निर्माण की लंबी परियोजना को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित भी किया है। UGC के चुप्पी में, मोतिहारी के महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय ने व्हात्सप्प पर परीक्षा लेने का निर्णय लिया है। लेकिन हमें इसे आलोचनात्मक दृष्टि से देखने को मजबूर करती है कि निकट भविष्य में इसके परिणाम क्या होंगे? यह छात्रों के एक बड़े समुदाय पर क्या प्रभाव डालेगा और यह किस तरह के समाज का सृजन करेगा।

समानता के अधिकार को नकारती ऑनलाइन परीक्षा

तमाम फी वृद्धि के बावजूद अलग-अलग तबके के लोग सार्वजनिक संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए पहुंचते है। इसलिए हम कह सकते हैं कि इस कोविड-19 के कारण हुए लॉक डॉउन का प्रभाव अलग-अलग विद्यार्थियों पर अनिवार्यतः अलग-अलग होगा। यह बात किसी के पास केवल इंटरनेट की पहुंच के आधार पर नहीं कही जा रही (जो कि NSSO के एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट मात्र 12% भारतीय छात्रों तक ही उपलब्ध है) बल्कि इसके अलावा अन्य और कई कारण और आयाम भी है।

लाइब्रेरी, रीडिंग रूम और हॉस्टल बंद किया जाने के कारण, छात्रों का एक बड़ा समूह ऐसा है जिसे अपने- अपने घरों में एक ऐसे स्थान की तलाश करने में मुश्किल आएगी जहां वह शांति पूर्वक बैठ के पढ़ सके। एक महिला छात्रा के लिए घर में बैठ के पढ़ना, ऑनलाइन क्लास करना और अपना शोध पत्र लिखने में कहीं ज्यादा कठिनाई है क्योंकि उसे घरेलु कामों में पुरुषों से ज्यादा समय देना पड़ता है। या यूं कहे कि ये परंपरा है, जिससे घर में रहते उन्हें बार बार घर के काम के लिए घर वालो के द्वारा बुलाया जाना लाज़मी है। वहीं अगर हम दलित और मुसलमानों की और देखे तो उनकी परेशानी अलग है। कई इलाकों में उन्हें अपने रोजमर्रा के समान को जुटाने के लिए ही काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। क्योंकि समाज के द्वारा अपनाए गए ‘social distancing’ खत्म नहीं हो पाई है, बल्कि और अलग-अलग सरकारी नीतियों और राजनीति से इन्हें लॉकडाउन में बढ़ावा ही दिया गया है।

किसी भी परीक्षा की पहली शर्त होती है कि सभी छात्रों को समान मंच और समान तैयारी का मौका मिले। इंटरनेट और डिजिटल माध्यम का प्रयोग समानता लाने के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह समानता लाने की सोच के साथ किया जाए। परन्तु इसके बिना, ऑनलाइन परीक्षा, कंप्यूटर पर MCQ परीक्षण और इस तरह के अन्य विकल्प केवल असमानता को बढ़ावा देंगे।

किसको डिजिटल/डिस्टेंस शिक्षा के ओर धकेला जा रहा है?

NSSO 2014 का एक आंकड़ा यह बताता है कि भारत में 10% से भी कम उच्च शिक्षा में जाते है (खासकर जिसमे ग्रामीण भारत, महिला और पिछड़े जाति/जनजाति की संख्या ज्यादा है)। हाल ही में सरकार ने कुछ कदम ऐसे उठाए है जिससे गुणवत्तपूर्ण शिक्षा के दायरे को बढ़ाने के बजाए, शिक्षा में असामनता को पाटने के बजाए, उसे बढ़ने की और पहल की है। हाल ही में आए नई शिक्षा नीति 2019 को देखे तो हमे पता चलता है कि कैसे इसके द्वारा धीरे- धीरे और बड़े स्तर पर सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों को निजी हाथों में दिया जा रहा है, खास कर ‘वित्त स्वायत्ता’ के नाम पर। यह मुहिम सरकार के द्वारा शुरू की जा चुकी है। नई शिक्षा नीति 2019 के तहत् एक पदानुक्रमित शिक्षा संरचना बनाने, जिसमे कार्यबल दो शिविरों में विभाजित होगा- उच्च कुशल और विशिष्ट कर्मियों का एक समूह और कम कौशल वाले कर्मियों का एक विशाल समूह। इसी नीति की निरंतरता में एक व्यवसायिक परिशिक्षण की शुरुआत की गई और महाविधालय और विश्वविधालय के लिए स्व-अध्ययन सामग्री तैयार की गई। गत वर्ष वित्त मंत्री श्रीमती सीतारमन ने टॉप-100 NIRF रैंकिंग के संस्थाओं को ऑनलाइन कोर्स की तरफ बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया।

इस तरह के सभी क़दमों के लिए घोषित लक्ष्य उन सभी छात्रों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराना या शिक्षा तक उन विद्यार्थियों की पहुंच को निश्चित करना रहा है, जो अलग-अलग कोर्स के बढ़ते लागतों के कारण संसाधन से वंचित रह जाते है। लेकिन असलियत यह रहा है की इस आड़ में जनता के पैसे को सरकार ने कॉरपोरेट जगत के लिए निम्न कौशल के प्रशिक्षण के कार्यक्रम में खर्च किया है। तो अगर इस तरह के लक्ष्य को लेकर अधिकारी ऑनलाइन मोड में शिक्षा को ले जाने का प्रयास कर रहे हैं तो इसका जोरदार विरोध करना चाहिए।

नवउदारवाद के आक्रमण और तीव्रता के कारण हमने छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न अन्य हितधारकों को सड़कों पर देखा है। हाल ही में JNU, IIMC, IIT, AIIMS, TISS, NLUऔर उत्तराखंड में आयुर्वेदिक कॉलेजों ने इस तरह के संघर्षों को देखा है और पूरे देश में छात्र इन संघर्षों के प्रति एकजुटता से सामने आए हैं। चल रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट हमें उन कार्यक्रमों को त्यागने के लिए मजबूर करते हैं जो हमें विफल कर रही है और जो आवश्यक है, उसे लागू करने के लिए और मजबूर कर रही है। 'आपातकालीन उपायों' की आड़ में जनविरोधी नीतियों को वैध बनाने की किसी भी कोशिश को रोकने के लिए हमे अपनी पूरी ताकत से लड़ना होगा। इसलिए, हम इस तरह के सभी प्रयासों को अस्वीकार करते हैं और यूजीसी से वैकल्पिक तरीकों की सिफारिश करने के लिए मांग करते हैं, जिसमें शिक्षा संकट को इस मोड़ पर हल किया जा सकता है। बहुकांश आबादी के लिए ऑनलाइन/डिस्टेंस लर्निंग को बढ़ावा नही दिया जाना चाहिए अगर इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अधिक विशेषाधिकार प्राप्त लोगो तक ही सीमित कर दिया जाए।

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