@RedFMIndia : अपने प्राइमटाइम में एक हफ्ते के लिए #MeToo की कहानियों का प्रसारण करें


@RedFMIndia : अपने प्राइमटाइम में एक हफ्ते के लिए #MeToo की कहानियों का प्रसारण करें
समस्या
मैं आए दिन अपनी ट्विटर और फेसबुक टाइमलाइन पर #MeToo सी जुड़ी कहानियाँ पढ़ रही हूँ। एक तरफ तो मुझे बहुत दुख हो रहा है कि हमारे भारत देश में महिलाओं और पुरुषों को ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ा पर दूसरी तरफ उनकी निडरता और सामने आने की, बोलने की, अपनी बात रखने की उनकी हिम्मत को देखकर दिल भर आता है।
काश हम इस #MeToo आंदोलन को भारत के हर गाँव तक पहुँचा सकते ताकि वहाँ भी यौन शोषण के खिलाफ एक युद्ध छिड़ता जैसा कि शहरों में छिड़ा है। मैं जानती हूँ ये मुश्किल है पर आने वाले वक्त में ये होगा।
लेकिन फिलहाल मैं चाहती हूँ कि यौन शोषण के खिलाफ छिड़ा ये आंदोलन ऑनलाइन दुनिया से निकलर ऑफलाइन दुनिया में कदम रखे। मैं चाहती हूँ कि ये आंदोलन उन लोगों तक पहुँचे जिनके पास शायद स्मार्टफोन नहीं है, या जो ट्विटर या फेसबुक पर नहीं हैं।
इसको पूरा करने के लिए सबसे अच्छा माध्यम है रेडियो--रेडियो, जिसकी पहुँच लाखों-करोड़ों लोगों तक है--उन लोगों तक जो शायद ऑनलाइन दुनिया से उतना जुड़े नहीं हैं।
मुझे लगता है कि हर किसी के पास एक कहानी होती है, चाहे वो महिला हो या पुरुष--सबके पास एक कहानी है, जिसे पूरे देश को सुनना होगा ताकि सबको सबक मिले, हिम्मत मिले।
इसलिए मैंने 93.5 रेड एफएम के नाम ये पेटीशन शुरू की है--जिसकी पहुँच लाखों श्रोताओं तक है। रेड एफएम की टैगलाइन है--बजाते रहो! और मैं चाहती हूँ कि #MeToo से जुड़ी कहानियों को अपने रेडियो चैनल पर बजाएं, बजाते रहें।
अगर वो इस पहल का नेतृत्व करते हैं तो हम यौन शोषण के खिलाफ इस लड़ाई को देश के अन्य हिस्सों तक पहुँचा पाएंगे। मुझे उम्मीद है, पूरा भरोसा है कि रेड एफएम यौन शोषण का सामना कर चुके लोगों की इन कहानियों को बजाता रहेगा। #AbBajaanaHai
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर कर के 93.5 रेड एफएम से कहें कि वो शाम के अपने प्राइमटाइम में एक खास सेगमेंट #MeToo से जुड़ी कहानियों के लिए रखें, और श्रोताओं को अपनी कहानियाँ साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें।
मुझे पूरा यकीन है कि यौन शोषण की इन कहानियों को जितना सुना जाएगा, सुनाया जाएगा--हमारा समाज इसको लेकर उतना सजग और सचेत होगा। ये कहानियाँ यौन शोषण को गंभीरता से लेने में मदद करेंगी और ऐसी घटनाओं में कमी आएगी।
अभी का हाल तो ऐसा है कि कोई व्यक्ति, महिला हो या पुरुष--अगर वो अपने यौन शोषण के बारे में बोलता है तो उसका साथ देने के बजाए लोग उसी से सवाल करने लगते हैं। आखिर हमारी चेतना कहाँ चली गई है!
नीचे कुछ कमेंट संलग्न कर रही हूँ, जो यौन शोषण के मुद्दे पर बोलने वालों को मिलते हैं:
“उसे देखकर ही लगता है कि वो इसी तरह की लड़की है!”
“तब क्यों नहीं बोला जब ये सब हो रहा था, अब इतने साल बाद बोलकर क्या फायदा...जरूर कोई अजेंडा है इसका!”
“पहले सब रज़ामंदी से हुआ होगा और अब बदला लिया जा रहा है, ये तो बस फायदा उठा रही/रहा है!”
इन कमेंट से साफ ज़ाहिर है कि समस्या कितनी गंभीर है और यौन शोषण पर बोलने वालों को समाज किस तरह से देखता है। साथ देने वाले कम हैं, उंगली उठाने वाले बहुत!
यौन शोषण के खिलाफ एक-दो, दस-बीस या सौ को नहीं, पूरे समाज को खड़ा होना होगा, एक सभ्य समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि यहाँ सबको अपनी बात रखने की हिम्मत मिले--चाहे वो बात यौन शोषण की ही क्यों ना हो।
समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ साथ देने वाले ज़्यादा हों और उंगली उठाने वाले कम।
यौन शोषण का सामना करने वालों को हमारे सवालों की नहीं, हमारी करुणा और साथ की ज़रूरत है। कुछ ज़रूर अपनी लड़ाई अकेले लड़ सकते हैं पर अकेले कितनी लड़ाइयाँ लड़ेंगे और कहाँ तक लड़ेंगे। हम भी एक समाज के रूप में कब तक अपनी ज़िम्मेदारियों से भागेंगे और क्यों भागेंगे--क्योंकि हमारे साथ, हमारे परिवार के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अपने आसपास देखिए, क्या सच में हम सुरक्षित हैं?
इसलिए ज़रूरी है कि इस समस्या के खिलाफ सब मिलकर एक साथ खड़े हों, महिलाएं, पुरुष-- सब साथ मिलकर यौन शोषण के खिलाफ बोलें।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और 93.5 रेड एफएम को इस पहल में साथ देने के लिए कहें।
चलिए #MeToo से #WeStandTogether का सफर तय करें। #AbBajaanaHai

समस्या
मैं आए दिन अपनी ट्विटर और फेसबुक टाइमलाइन पर #MeToo सी जुड़ी कहानियाँ पढ़ रही हूँ। एक तरफ तो मुझे बहुत दुख हो रहा है कि हमारे भारत देश में महिलाओं और पुरुषों को ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ा पर दूसरी तरफ उनकी निडरता और सामने आने की, बोलने की, अपनी बात रखने की उनकी हिम्मत को देखकर दिल भर आता है।
काश हम इस #MeToo आंदोलन को भारत के हर गाँव तक पहुँचा सकते ताकि वहाँ भी यौन शोषण के खिलाफ एक युद्ध छिड़ता जैसा कि शहरों में छिड़ा है। मैं जानती हूँ ये मुश्किल है पर आने वाले वक्त में ये होगा।
लेकिन फिलहाल मैं चाहती हूँ कि यौन शोषण के खिलाफ छिड़ा ये आंदोलन ऑनलाइन दुनिया से निकलर ऑफलाइन दुनिया में कदम रखे। मैं चाहती हूँ कि ये आंदोलन उन लोगों तक पहुँचे जिनके पास शायद स्मार्टफोन नहीं है, या जो ट्विटर या फेसबुक पर नहीं हैं।
इसको पूरा करने के लिए सबसे अच्छा माध्यम है रेडियो--रेडियो, जिसकी पहुँच लाखों-करोड़ों लोगों तक है--उन लोगों तक जो शायद ऑनलाइन दुनिया से उतना जुड़े नहीं हैं।
मुझे लगता है कि हर किसी के पास एक कहानी होती है, चाहे वो महिला हो या पुरुष--सबके पास एक कहानी है, जिसे पूरे देश को सुनना होगा ताकि सबको सबक मिले, हिम्मत मिले।
इसलिए मैंने 93.5 रेड एफएम के नाम ये पेटीशन शुरू की है--जिसकी पहुँच लाखों श्रोताओं तक है। रेड एफएम की टैगलाइन है--बजाते रहो! और मैं चाहती हूँ कि #MeToo से जुड़ी कहानियों को अपने रेडियो चैनल पर बजाएं, बजाते रहें।
अगर वो इस पहल का नेतृत्व करते हैं तो हम यौन शोषण के खिलाफ इस लड़ाई को देश के अन्य हिस्सों तक पहुँचा पाएंगे। मुझे उम्मीद है, पूरा भरोसा है कि रेड एफएम यौन शोषण का सामना कर चुके लोगों की इन कहानियों को बजाता रहेगा। #AbBajaanaHai
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर कर के 93.5 रेड एफएम से कहें कि वो शाम के अपने प्राइमटाइम में एक खास सेगमेंट #MeToo से जुड़ी कहानियों के लिए रखें, और श्रोताओं को अपनी कहानियाँ साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें।
मुझे पूरा यकीन है कि यौन शोषण की इन कहानियों को जितना सुना जाएगा, सुनाया जाएगा--हमारा समाज इसको लेकर उतना सजग और सचेत होगा। ये कहानियाँ यौन शोषण को गंभीरता से लेने में मदद करेंगी और ऐसी घटनाओं में कमी आएगी।
अभी का हाल तो ऐसा है कि कोई व्यक्ति, महिला हो या पुरुष--अगर वो अपने यौन शोषण के बारे में बोलता है तो उसका साथ देने के बजाए लोग उसी से सवाल करने लगते हैं। आखिर हमारी चेतना कहाँ चली गई है!
नीचे कुछ कमेंट संलग्न कर रही हूँ, जो यौन शोषण के मुद्दे पर बोलने वालों को मिलते हैं:
“उसे देखकर ही लगता है कि वो इसी तरह की लड़की है!”
“तब क्यों नहीं बोला जब ये सब हो रहा था, अब इतने साल बाद बोलकर क्या फायदा...जरूर कोई अजेंडा है इसका!”
“पहले सब रज़ामंदी से हुआ होगा और अब बदला लिया जा रहा है, ये तो बस फायदा उठा रही/रहा है!”
इन कमेंट से साफ ज़ाहिर है कि समस्या कितनी गंभीर है और यौन शोषण पर बोलने वालों को समाज किस तरह से देखता है। साथ देने वाले कम हैं, उंगली उठाने वाले बहुत!
यौन शोषण के खिलाफ एक-दो, दस-बीस या सौ को नहीं, पूरे समाज को खड़ा होना होगा, एक सभ्य समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि यहाँ सबको अपनी बात रखने की हिम्मत मिले--चाहे वो बात यौन शोषण की ही क्यों ना हो।
समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ साथ देने वाले ज़्यादा हों और उंगली उठाने वाले कम।
यौन शोषण का सामना करने वालों को हमारे सवालों की नहीं, हमारी करुणा और साथ की ज़रूरत है। कुछ ज़रूर अपनी लड़ाई अकेले लड़ सकते हैं पर अकेले कितनी लड़ाइयाँ लड़ेंगे और कहाँ तक लड़ेंगे। हम भी एक समाज के रूप में कब तक अपनी ज़िम्मेदारियों से भागेंगे और क्यों भागेंगे--क्योंकि हमारे साथ, हमारे परिवार के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।
अपने आसपास देखिए, क्या सच में हम सुरक्षित हैं?
इसलिए ज़रूरी है कि इस समस्या के खिलाफ सब मिलकर एक साथ खड़े हों, महिलाएं, पुरुष-- सब साथ मिलकर यौन शोषण के खिलाफ बोलें।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और 93.5 रेड एफएम को इस पहल में साथ देने के लिए कहें।
चलिए #MeToo से #WeStandTogether का सफर तय करें। #AbBajaanaHai

कामयाबी
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फैसला लेने वाले

10 अक्टूबर 2018 पर पेटीशन बनाई गई