स्वामी अड़गड़ानंद महाराज द्वारा रचित यथार्थ गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने हेतु

The Issue

21वी सदी के धार्मिक सामाजिक सुुुधारआंदोलन के प्रवर्तक हैं यथार्थ गीता के प्रणेता स्वामीअड़गड़ानंदजी

भारतीय इतिहास में आज तक तीन धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन हो चुके हैं ।प्रथम छठी शताब्दी ईसापूर्व में महात्मा बुद्ध के नेतृत्व में बौद्ध धर्म एवं महावीर स्वामी के नेतृत्व में जैन धर्म ,इन दोनों महापुरुषों के नेतृत्व में जैन एवं बौद्ध धर्म विश्व के कई देशों में जैसी चीन, ताइवान ,उत्तरी कोरिया और दक्षिण कोरिया ,जापान ,श्रीलंका, आदि देशों में भारत ने अपनी पहचान बनाई ।

किसी भी संस्कृति एवं धर्म का उत्थान एवं पतन दोनों होता है इसी तारतम्य में जैन, बौद्ध धर्म में आपसी फूट आदि कारणो से वैदिक ऋषियो का ज्ञान तत्व, धर्म ,सत्य ,अहिंसा, आदि अंधकार में नजर आने लगा। विश्व गुरु बनने वाला भारत धर्म ,ज्ञान ,सत्य ,अहिंसा ,अस्तेय, आदि धार्मिक पाठ पढ़ाने के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य के नेतृत्व में दुनिया को सबसे श्रेष्ठ एवं वृहद प्रशासनिक प्रणाली दी। और आगे चलकर कुषाण वंश , गुप्त वंश तक यह व्यवस्था लगभग बनी रही ।

वहीं धीरे-धीर राजाओं मेआपसी फूट, धर्मावलंबियों में आपसी सहमति का अभाव राजाओं के बीच आपसी वैमनस्यता की वजह से मुस्लिम आक्रमण का दंश झेलने के लिए भारत मजबूर हो गया। भारत के ऊपर इस्लाम धर्म मुस्लिमों द्वारा थोप दिया गया। पुनः इस्लाम धर्म के प्रभाव के खतरे से बचने के लिए 15वीं शताब्दी के धार्मिक सुधार आंदोलन रामानंद एवं उनके शिष्य जैसे संत रविदास ,कबीर दास, धन्ना ,सेन ,सधना ,पीपा ,एवं सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक, तुलसीदास ,चैतन्य महाप्रभु, नामदेव ,तुकाराम ,शिवाजी के गुरु रामदास, संत ज्ञानेश्वर ,आदि के नेतृत्व में भारत ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए सामाजिक ,धार्मिक सुधार आंदोलन इन महापुरुषों के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ ।

जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय जनमानस को सैद्धांतिक विश्वासों ,कर्मकांडों, जातिवाद तथा संप्रदायिक घृणा जैसी तमाम बुराइयों से मुक्त कराया ।19वीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागरण की शुरुआत 18वीं शताब्दी में यूरोप में "जागरण के युग "की शुरुआत हुई और भारत में मुस्लिम शासकों का पतन हो चुका था। अंग्रेजीयत भारतीय समाज पर हावी हो चुकी थी। भारत अपने अंधविश्वास एवं कुरीतियों के कारण एक निश्चल निष्प्राण और गिरते हुए समाज को चित्रित कर रहा था ।

इसी बीच राजा राममोहन राय ब्रह्म समाज के संस्थापक ,स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक ,एवं स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण मिशन के संस्थापक, अपने इन माध्यमों से पाश्चात्य संस्कृत का अध्ययन करते हुए उनके बुद्धिवादी एवं प्रजातांत्रिक सिद्धांतों ,धारणाओ और भावनाओं को भारतीय समाज को आत्मसात कराया और इन्हीं महापुरुषों की प्रेरणा स्वरुप यूरोप की "जागरण क्रांति "से प्रेरित होकर महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल ,नेताजी सुभाष चंद्र बोस ,आदि राष्ट्रवादी क्रांतिकारी विचारधारा के देशभक्तों के माध्यम से भारत अंग्रेजी शासन एवं शासक से मुक्ति हुआ। आज भारत पुनः अपनी खोई हुई पहचान" विश्व गुरु की उपाधि" से विभूषित "वसुधैव कुटुंबकम ," "जियो और जीने दो ",के हिमायती हमारे बैदिक ऋषियों की थाती वापस आ जाए आज पूरा भारत अपने आप में घुटन महसूस कर रहा है ।

जहां पर एक समय 18 93 ईसवी में अमेरिका के शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानंद भारतीय मनीषियों के संदेशों को विश्व के चारों ओर प्रसारित करने की जिम्मेदारी ली और अंततः वे सफल भी रहे। स्वामी विवेकानंद जी का भाषण सुनने के बाद "न्यूयॉर्क हेराल्ड "----ने लिखा कि "उनको सुनने के बाद हम यह अनुभव करते हैं कि ऐसे ज्ञान संपन्न देश में अपने धर्म प्रचारक को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण कार्य है "इस सम्मेलन ने भारत को विश्व के समस्त देशों पर भारतीय संस्कृति एवं धर्म की जो अमिट छाप छोड़ी थी आज भारत पुनः वही समय लाने के लिए लालायित है ।

लेकिन 21वीं सदी का भारत आज अंधकार में डूबा हुआ है चारों तरफ धर्म के ठेकेदार भारतीय मनीषियों के विचारधारा को अपने मनोगत भाओ से परिभाषित कर भारत की एकता एवं अखंडता को खतरे में डाले पड़े हुए है। चारों तरफ अंधकार की अमावस्या छाई हुई है विश्व पटल पर सभी ज्ञान एवं धर्म का एकमात्र प्रतिनिधित्व करने वाला भारत आज गिने चुने धर्म के ठेकेदारों के इर्द गिर्द नाच रहा है। भारतीय संविधान के तहत उनको इसका दंड भी मिल रहा है काफी धर्म के ठेकेदार जेल की सलाखों के अंदर अपने कुकृत्य का प्रायश्चित कर रहे हैं ।

धार्मिक अमावस्या की रात में तीनों सामाजिक धार्मिक आंदोलन के बाद चौथी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जो धार्मिक उपदेश दिया उसका संकलन महाभारत के खंड काव्य "गीता" के रूप में प्रचलित हुआ । जो हिंदुओं का धर्म शास्त्र माना जाता है ।चिरकाल से गीता का उपदेश भारतीय जनमानस के दिमागी पटल से विस्मृत हो गया था पुनः उसी गीता का पुनः परिभाषित "यथार्थ गीता "के रूप में परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद द्वारा रचित" यथार्थ गीता "आज विश्व में "विश्व गुरु "की उपाधि को धारण करने की चिरस्थाई उपाधि भारत को प्राप्त होते दिखाई दे रहा है ।धर्म ,संप्रदाय ,क्षेत्र ,आदि के नाम पर विश्व युद्ध के कगार पर खड़ा है विश्व।

स्वामी अड़गड़ानंद जी की "यर्थाथ गीता" पूरे विश्व को एक धागे में पिरोकर "वसुधैव कुटुंबकम," जियो और जीने दो ", विश्व गुरु की उपाधि," भारतीयों के सिद्धांत को चरितार्थ कर रही है ,।स्वामी जी की यथार्थ गीता के अनुसार जाति मात्र दो हैं "देवता" और" असुर "जिसके अंतकरण में दैवीय संपद कार्य करती हैं उसे देवता और जिसके अंतकरण में आसुरी संपद कार्य करती है उसे असुर कहते हैं। विश्व की समस्त जातियों को यह संदेश दिया कि अपने अंतकरण को शुद्ध करके देवता बनने का प्रयास करें ।

उन की गीता में एकमात्र ईश्वर की अवधारणा ईश्वर का निवास स्थान भूत प्राणियों के हृदय में बता कर यह चरितार्थ किया कि भगवान को मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजाघर, आदि मे ढूंढने की जरूरत नहीं है और दुनिया को मंदिर ,मस्जिद के नाम पर ना तो लड़ने की जरूरत है। ज्ञान और यज्ञ के नाम पर तमाम कर्मकांडी धर्म के ठेकेदार दुनिया को बांटकर केवल अपनी रोजी रोटी का व्यापार चालू कर समाज को तोड़-मरोड़ रहे हैं और वही स्वामी जी के अनुसार 'ज्ञान' ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही "ज्ञान "है अर्थात आत्मा के आधिपत्य में आचरण तत्व में अर्थ स्वरुप परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही "ज्ञान "है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है वह अज्ञान है ।

स्वामी जी के अनुसार संपूर्ण इंद्रियों के व्यापार को मन की चेष्टाओं को ज्ञान से प्रकाशित हुई आत्मा में संयम रूपी योगाग्नी में हवन करते हैं यही "यज्ञ"है ।"कर्म "के नाम पर जहां पूरा विश्व अपनी विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार समाज को बांटने में लगे हैं और दुनिया को लड़ा रहे है वही स्वामी अड़गड़ानंद महाराज जी के अनुसार यथार्थ गीता को पढ़ने के बाद मानव जाति को कहीं भी किसी भी प्रकार की धर्म अर्थ ,यज्ञ ,जाति आदि के नाम पर कोई शंका नहीं रह जाता ।पूरा विश्व पढ़कर "एकेश्वरवाद" की विचारधारा एक धर्म अर्थात धार्मिक उथल-पुथल को छोड़कर एकमात्र मेरी अर्थात ईश्वर के सरण हो जाओ।

ठीक इसी प्रकार कर्मकांडी ब्राह्मणों ने चारों वर्णों ब्राम्हण, क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र को कर्म के स्थान पर जन्म को मान लिया और विदेशी आक्रांताओं को भारत में आक्रमण करने का भरपूर अवसर दे दिया जिससे विदेशी आक्रांता इन चारों वर्णों की आपसी फूट का फायदा उठाकर भारतीय संस्कृत को तार तार करने का प्रयास किया ।स्वामी जी के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। साधक भजन करते-करते शुद्र से वैश्य श्रेणी ,और वैष्य से क्षत्रिय श्रेणी और क्षत्रिय से ब्राह्मण श्रेणी की अवस्था को पार करता है।

और एक ऐसी अवस्था आती है कि ब्राह्मण से भी ऊंचा जब आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाता है । और साधक मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है ।स्वामी जी द्वारा दी गई यह परिभाषा पूरे विश्व को एक सूत्र में बांध कर शांतिपूर्वक भौतिक जीवन जीने के साथ-साथ अपनी आत्मिक उन्नति करके मानव अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और अपने आने वाली पीढ़ियों को जातीय संघर्ष, सांप्रदायिक संघर्ष, धार्मिक संघर्ष ,की आग से बचा सकता है।
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21वी सदी के धार्मिक सामाजिक सुुुधारआंदोलन के प्रवर्तक हैं यथार्थ गीता के प्रणेता स्वामीअड़गड़ानंदजी

भारतीय इतिहास में आज तक तीन धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन हो चुके हैं ।प्रथम छठी शताब्दी ईसापूर्व में महात्मा बुद्ध के नेतृत्व में बौद्ध धर्म एवं महावीर स्वामी के नेतृत्व में जैन धर्म ,इन दोनों महापुरुषों के नेतृत्व में जैन एवं बौद्ध धर्म विश्व के कई देशों में जैसी चीन, ताइवान ,उत्तरी कोरिया और दक्षिण कोरिया ,जापान ,श्रीलंका, आदि देशों में भारत ने अपनी पहचान बनाई ।

किसी भी संस्कृति एवं धर्म का उत्थान एवं पतन दोनों होता है इसी तारतम्य में जैन, बौद्ध धर्म में आपसी फूट आदि कारणो से वैदिक ऋषियो का ज्ञान तत्व, धर्म ,सत्य ,अहिंसा, आदि अंधकार में नजर आने लगा। विश्व गुरु बनने वाला भारत धर्म ,ज्ञान ,सत्य ,अहिंसा ,अस्तेय, आदि धार्मिक पाठ पढ़ाने के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य के नेतृत्व में दुनिया को सबसे श्रेष्ठ एवं वृहद प्रशासनिक प्रणाली दी। और आगे चलकर कुषाण वंश , गुप्त वंश तक यह व्यवस्था लगभग बनी रही ।

वहीं धीरे-धीर राजाओं मेआपसी फूट, धर्मावलंबियों में आपसी सहमति का अभाव राजाओं के बीच आपसी वैमनस्यता की वजह से मुस्लिम आक्रमण का दंश झेलने के लिए भारत मजबूर हो गया। भारत के ऊपर इस्लाम धर्म मुस्लिमों द्वारा थोप दिया गया। पुनः इस्लाम धर्म के प्रभाव के खतरे से बचने के लिए 15वीं शताब्दी के धार्मिक सुधार आंदोलन रामानंद एवं उनके शिष्य जैसे संत रविदास ,कबीर दास, धन्ना ,सेन ,सधना ,पीपा ,एवं सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक, तुलसीदास ,चैतन्य महाप्रभु, नामदेव ,तुकाराम ,शिवाजी के गुरु रामदास, संत ज्ञानेश्वर ,आदि के नेतृत्व में भारत ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए सामाजिक ,धार्मिक सुधार आंदोलन इन महापुरुषों के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ ।

जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय जनमानस को सैद्धांतिक विश्वासों ,कर्मकांडों, जातिवाद तथा संप्रदायिक घृणा जैसी तमाम बुराइयों से मुक्त कराया ।19वीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागरण की शुरुआत 18वीं शताब्दी में यूरोप में "जागरण के युग "की शुरुआत हुई और भारत में मुस्लिम शासकों का पतन हो चुका था। अंग्रेजीयत भारतीय समाज पर हावी हो चुकी थी। भारत अपने अंधविश्वास एवं कुरीतियों के कारण एक निश्चल निष्प्राण और गिरते हुए समाज को चित्रित कर रहा था ।

इसी बीच राजा राममोहन राय ब्रह्म समाज के संस्थापक ,स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक ,एवं स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण मिशन के संस्थापक, अपने इन माध्यमों से पाश्चात्य संस्कृत का अध्ययन करते हुए उनके बुद्धिवादी एवं प्रजातांत्रिक सिद्धांतों ,धारणाओ और भावनाओं को भारतीय समाज को आत्मसात कराया और इन्हीं महापुरुषों की प्रेरणा स्वरुप यूरोप की "जागरण क्रांति "से प्रेरित होकर महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल ,नेताजी सुभाष चंद्र बोस ,आदि राष्ट्रवादी क्रांतिकारी विचारधारा के देशभक्तों के माध्यम से भारत अंग्रेजी शासन एवं शासक से मुक्ति हुआ। आज भारत पुनः अपनी खोई हुई पहचान" विश्व गुरु की उपाधि" से विभूषित "वसुधैव कुटुंबकम ," "जियो और जीने दो ",के हिमायती हमारे बैदिक ऋषियों की थाती वापस आ जाए आज पूरा भारत अपने आप में घुटन महसूस कर रहा है ।

जहां पर एक समय 18 93 ईसवी में अमेरिका के शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानंद भारतीय मनीषियों के संदेशों को विश्व के चारों ओर प्रसारित करने की जिम्मेदारी ली और अंततः वे सफल भी रहे। स्वामी विवेकानंद जी का भाषण सुनने के बाद "न्यूयॉर्क हेराल्ड "----ने लिखा कि "उनको सुनने के बाद हम यह अनुभव करते हैं कि ऐसे ज्ञान संपन्न देश में अपने धर्म प्रचारक को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण कार्य है "इस सम्मेलन ने भारत को विश्व के समस्त देशों पर भारतीय संस्कृति एवं धर्म की जो अमिट छाप छोड़ी थी आज भारत पुनः वही समय लाने के लिए लालायित है ।

लेकिन 21वीं सदी का भारत आज अंधकार में डूबा हुआ है चारों तरफ धर्म के ठेकेदार भारतीय मनीषियों के विचारधारा को अपने मनोगत भाओ से परिभाषित कर भारत की एकता एवं अखंडता को खतरे में डाले पड़े हुए है। चारों तरफ अंधकार की अमावस्या छाई हुई है विश्व पटल पर सभी ज्ञान एवं धर्म का एकमात्र प्रतिनिधित्व करने वाला भारत आज गिने चुने धर्म के ठेकेदारों के इर्द गिर्द नाच रहा है। भारतीय संविधान के तहत उनको इसका दंड भी मिल रहा है काफी धर्म के ठेकेदार जेल की सलाखों के अंदर अपने कुकृत्य का प्रायश्चित कर रहे हैं ।

धार्मिक अमावस्या की रात में तीनों सामाजिक धार्मिक आंदोलन के बाद चौथी शताब्दी ईसापूर्व में भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जो धार्मिक उपदेश दिया उसका संकलन महाभारत के खंड काव्य "गीता" के रूप में प्रचलित हुआ । जो हिंदुओं का धर्म शास्त्र माना जाता है ।चिरकाल से गीता का उपदेश भारतीय जनमानस के दिमागी पटल से विस्मृत हो गया था पुनः उसी गीता का पुनः परिभाषित "यथार्थ गीता "के रूप में परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद द्वारा रचित" यथार्थ गीता "आज विश्व में "विश्व गुरु "की उपाधि को धारण करने की चिरस्थाई उपाधि भारत को प्राप्त होते दिखाई दे रहा है ।धर्म ,संप्रदाय ,क्षेत्र ,आदि के नाम पर विश्व युद्ध के कगार पर खड़ा है विश्व।

स्वामी अड़गड़ानंद जी की "यर्थाथ गीता" पूरे विश्व को एक धागे में पिरोकर "वसुधैव कुटुंबकम," जियो और जीने दो ", विश्व गुरु की उपाधि," भारतीयों के सिद्धांत को चरितार्थ कर रही है ,।स्वामी जी की यथार्थ गीता के अनुसार जाति मात्र दो हैं "देवता" और" असुर "जिसके अंतकरण में दैवीय संपद कार्य करती हैं उसे देवता और जिसके अंतकरण में आसुरी संपद कार्य करती है उसे असुर कहते हैं। विश्व की समस्त जातियों को यह संदेश दिया कि अपने अंतकरण को शुद्ध करके देवता बनने का प्रयास करें ।

उन की गीता में एकमात्र ईश्वर की अवधारणा ईश्वर का निवास स्थान भूत प्राणियों के हृदय में बता कर यह चरितार्थ किया कि भगवान को मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजाघर, आदि मे ढूंढने की जरूरत नहीं है और दुनिया को मंदिर ,मस्जिद के नाम पर ना तो लड़ने की जरूरत है। ज्ञान और यज्ञ के नाम पर तमाम कर्मकांडी धर्म के ठेकेदार दुनिया को बांटकर केवल अपनी रोजी रोटी का व्यापार चालू कर समाज को तोड़-मरोड़ रहे हैं और वही स्वामी जी के अनुसार 'ज्ञान' ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही "ज्ञान "है अर्थात आत्मा के आधिपत्य में आचरण तत्व में अर्थ स्वरुप परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही "ज्ञान "है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है वह अज्ञान है ।

स्वामी जी के अनुसार संपूर्ण इंद्रियों के व्यापार को मन की चेष्टाओं को ज्ञान से प्रकाशित हुई आत्मा में संयम रूपी योगाग्नी में हवन करते हैं यही "यज्ञ"है ।"कर्म "के नाम पर जहां पूरा विश्व अपनी विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार समाज को बांटने में लगे हैं और दुनिया को लड़ा रहे है वही स्वामी अड़गड़ानंद महाराज जी के अनुसार यथार्थ गीता को पढ़ने के बाद मानव जाति को कहीं भी किसी भी प्रकार की धर्म अर्थ ,यज्ञ ,जाति आदि के नाम पर कोई शंका नहीं रह जाता ।पूरा विश्व पढ़कर "एकेश्वरवाद" की विचारधारा एक धर्म अर्थात धार्मिक उथल-पुथल को छोड़कर एकमात्र मेरी अर्थात ईश्वर के सरण हो जाओ।

ठीक इसी प्रकार कर्मकांडी ब्राह्मणों ने चारों वर्णों ब्राम्हण, क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र को कर्म के स्थान पर जन्म को मान लिया और विदेशी आक्रांताओं को भारत में आक्रमण करने का भरपूर अवसर दे दिया जिससे विदेशी आक्रांता इन चारों वर्णों की आपसी फूट का फायदा उठाकर भारतीय संस्कृत को तार तार करने का प्रयास किया ।स्वामी जी के अनुसार चार वर्ण ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। साधक भजन करते-करते शुद्र से वैश्य श्रेणी ,और वैष्य से क्षत्रिय श्रेणी और क्षत्रिय से ब्राह्मण श्रेणी की अवस्था को पार करता है।

और एक ऐसी अवस्था आती है कि ब्राह्मण से भी ऊंचा जब आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाता है । और साधक मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है ।स्वामी जी द्वारा दी गई यह परिभाषा पूरे विश्व को एक सूत्र में बांध कर शांतिपूर्वक भौतिक जीवन जीने के साथ-साथ अपनी आत्मिक उन्नति करके मानव अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और अपने आने वाली पीढ़ियों को जातीय संघर्ष, सांप्रदायिक संघर्ष, धार्मिक संघर्ष ,की आग से बचा सकता है।
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