
लोक तंत्र में आम नागरिक के अधिकारों की रक्षार्थ केवल मात्र नई नई नीतियाँ या घोषणाएं करने की आवश्यकता नहीं होती है। बल्कि प्रचलित और स्थापित नीतियों की ईमानदारी से पालना की आवश्यकता है।
प्रस्तुत प्रकरण में आज तक की गई कार्रवाई का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि हम आम उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिये बनाई गई नीतियों का लाभ भी ईमानदारी से उन्हें प्रदान नही कर रहे है।
मेरे द्वारा दिनांक 30 जून 2018 को देश के सर्वोच्च लोक सेवक को उन्हीं के द्वारा 2014 मे घोषित पारदर्शिता और व्यक्तिगत जवाबदेही नीति के तहत बैंक आँफ इंडिया में ग्राहक शिकायत निराकरण व्यवस्था की जांच हेतु प्रार्थना की गई थी। किन्तु सरकार द्वारा आज तक जांचकर न्याय प्रदान करने के स्थान बैंक के उच्च अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
सरकारी अधिकारियों/ कर्मचारियों की यह कार्रवाई सरकार की इच्छाशक्ति पर संदेह उत्पन्न करता है।
वर्तमान स्थिति में मुझे गालिब की निम्नलिखित पंक्तियाँ याद आ रही है:--
" उम्र भर गालिब हम यही करते रहे,
धूल चहरे पर थी और हम आईना साफ करते रहे।।"
आशा करता हूँ कि आप मेरी प्रार्थना पर सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए शीध्र एक निष्पक्ष जांच के आदेश प्रदान करने की व्यवस्था करने की कृपा करेंगे ताकि घोषित नीति की सार्थकता सिध्द हो सके।