
Vimlesh Chandra JoshiJaipur, India

7 abr 2019
वर्तमान परिदृश्य में मुझे राष्ट्र कवि श्री मैथिली शरण गुप्त जी कविता के निम्न अंश याद आते है:---
" अधिकार खोकर बैठ रहना यह महा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बंधूँ को भी दंड देना धर्म है।
इस तत्व पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ
जो भव्य भारत वर्ष के कल्पांत का कारण हुआ।"
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