हमारे देश में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ता को व्यापक अधिकार प्राप्त है किन्तु सार्वजनिक श्रेत्र में कार्यरत संस्थाओं द्वारा सरकारी निर्देशों की पालना नहीं करने के परिणाम स्वरूप आम उपभोक्ता को समुचित लाभ नहीं मिल रहा है।
आम उपभोक्ता की जागरूकता की कमी और शिकायत निराकरण प्रक्रिया में सरकारी सक्षम अधिकारियों की संवेदन हीनता के कारण ही आज तक सरकारी प्रयासों का वास्तवित लाभ आम उपभोक्ताओं को प्राप्त नहीं हो पा रहा है।
उपभोक्ता के शिकायत करने पर सार्वजनिक श्रेत्र में कार्यरत सक्षम अधिकारियों द्वारा सुनियोजित रुप से संगठित श्रेत्र में होने के कारण त्वरित कार्यवाही करने के स्थान पर दोषी अधिकारियों / कर्मचारियों को बचाने का प्रयास किया जाता है और आम उपभोक्ता चूकि आज तक असंगठित है अपने अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है।
उपरोक्त विषय की सच्चाई प्रमाणित करने के उदेश्य से ही मेरे द्वारा यह पिटीशन प्रस्तुत की गई है ताकि वास्तवित स्थिति का मूल्यांकन करते हुये शीघ्र आवश्यक सुधारात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जा सके।
वर्तमान परिदृश्य में मुझे बारबार राष्ट्र कवि श्री रामधारी जी दिनकर जी कविता के निम्न अंश याद आते है --
" समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याल,
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध।"

