#JaanSastiNahin : यमुना एक्सप्रेस-वे को सुरक्षित बनाने के लिए उठाएं ठोस कदम


#JaanSastiNahin : यमुना एक्सप्रेस-वे को सुरक्षित बनाने के लिए उठाएं ठोस कदम
समस्या
वो दिल्ली में नौकरी करता था और अकेले घर चलाता था। सालों पहले उसके पिता गुजर चुके थे, घर पर केवल माँ थी और एक बहन। सफर पर निकलने से पहले उसने बहन से वादा किया था कि रक्षाबंधन पर ज़रूर आएगा, वो नहीं आया, उसकी मौत की खबर आई।
अब वो बहन किसकी कलाई पर राखी बांधेगी? अब वो परिवार कैसे चलेगा?
यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुए ताज़ा हादसे ने ना जाने कितने परिवारों से ऐसे बेटे और बेटियों को छीना है।
हादसे में 29 लोगों की मौत हुई थी। इसमें किसी के घर का इकलौता चिराग बुझ गया तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया। पहली नौकरी के लिए निकलने वालों के लिए ये आखिरी सफर बन गया।
हादसे बताकर नहीं आते पर जब एक ही जगह ये हादसे बार-बार हों तो वो हादसे नहीं लापरवाही कहलाते हैं।
2019 में, न्यूज़18 में प्रकाशित हुई एक कहानी की हेड्लाइन ये थी: “किलर स्ट्रेच: यमुना एक्सप्रेस-वे ने 2012 से 5,000 से अधिक दुर्घटनाओं में 900 लोगों की जानें ली“। 13 मई 2022 को, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रीपोर्ट में यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) से प्राप्त जानकारी के अनुसार: “इस साल के पहले चार महीनों में, यमुना एक्सप्रेसवे, 93 दुर्घटनाओं में 33 लोगों की मौत हुई है। 153 लोग घायल हुए हैं। 2021 में 420 दुर्घटनाएं हुईं जिनमें से 135 लोगों ने अपनी जान गँवाई और 949 लोग घायल हुए। 2020 में 509 दुर्घटनाएं और 128 मौतें हुईं।”
जहां एक तरफ़ सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में थोड़ी सी कमी आई है, वहीं मौतों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
अगर सरकार सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) की सिफारिशों पर काम करती है तो एक्सप्रेस-वे और राजमार्गों पर हो रही दुर्घटनाओं को कम किया जा सकता है। CRRI की 2015 की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है - क्रैश बैरियर की स्थापना, प्रत्येक पांच किलोमीटर पर ट्रैन्स्वर्स बार मार्किंग या TBMs के दो सेट के बीच स्पीड अर्रेस्टोर (गति अवरोधकों) की स्थापना, 100 किमी की गति सीमा के सख्त प्रवर्तन की अनुमति, नंबर प्लेट रीडर सिस्टम समेत स्पीड कैमरा की स्थापना और पूरे यमुना एक्सप्रेस-वे का पारंपरिक सड़क सुरक्षा ऑडिट (RSA)।
अगर हम अब भी चुप रहे तो आज नहीं तो कल हम और हमारे अपने इस "मौत के हाईवे" के शिकार हो सकते हैं।
इसलिए मैंने उत्तर प्रदेश सरकार के नाम ये पेटीशन शुरू की है ताकि यमुना एक्सप्रेस-वे पर तुरंत क्रैश बैरियर लगाए जाएं और एक्सप्रेस-वे पर हादसों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज्यादा ये ज्यादा शेयर करें ताकि फिर किसी परिवार का अकेला कमाने वाला अपनी जान ना खोए, ताकि फिर बच्चों से माता-पिता का साया ना उठे।
आपको बता दूँ कि सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) की टीम का भी सुझाव था कि यमुना एक्सप्रेस-वे पर क्रैश बैरियर लगाए जाएं ताकि हादसों में कोई वाहन सड़क के दूसरी तरफ न जा सके।
अभी उसकी जगह कटीली तार का प्रयोग होता है, जो कि बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि क्रैश बैरियर लग जाने से बसों के हादसों पर लगाम लगेगी।
मैंने खुद यमुना एक्सप्रेस-वे से गुजरते हुए कुछ हादसों को करीब से देखा है। ऐसे हादसों में जान केवल एक व्यक्ति की नहीं जाती, उसके साथ एक तरह से उसके परिवार की भी जान चली जाती है।
मैं जानती हूँ कि लोगों की एक मानसिकता बन गई है कि ऐसे हादसों का कुछ किया नहीं जा सकता। पर सच कहूँ तो ये टाले जा सकते हैं, जानें बचाई जा सकती हैं। ज़रूरत है तो बस मिलकर आवाज़ उठाने की।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और सरकार से कहें कि हम भारतीयों की जान इतनी सस्ती नहीं। हमें "मौत का हाईवे" नहीं "ज़िंदगी का हाईवे" चाहिए।
#JaanSastiNahin

समस्या
वो दिल्ली में नौकरी करता था और अकेले घर चलाता था। सालों पहले उसके पिता गुजर चुके थे, घर पर केवल माँ थी और एक बहन। सफर पर निकलने से पहले उसने बहन से वादा किया था कि रक्षाबंधन पर ज़रूर आएगा, वो नहीं आया, उसकी मौत की खबर आई।
अब वो बहन किसकी कलाई पर राखी बांधेगी? अब वो परिवार कैसे चलेगा?
यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुए ताज़ा हादसे ने ना जाने कितने परिवारों से ऐसे बेटे और बेटियों को छीना है।
हादसे में 29 लोगों की मौत हुई थी। इसमें किसी के घर का इकलौता चिराग बुझ गया तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया। पहली नौकरी के लिए निकलने वालों के लिए ये आखिरी सफर बन गया।
हादसे बताकर नहीं आते पर जब एक ही जगह ये हादसे बार-बार हों तो वो हादसे नहीं लापरवाही कहलाते हैं।
2019 में, न्यूज़18 में प्रकाशित हुई एक कहानी की हेड्लाइन ये थी: “किलर स्ट्रेच: यमुना एक्सप्रेस-वे ने 2012 से 5,000 से अधिक दुर्घटनाओं में 900 लोगों की जानें ली“। 13 मई 2022 को, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रीपोर्ट में यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) से प्राप्त जानकारी के अनुसार: “इस साल के पहले चार महीनों में, यमुना एक्सप्रेसवे, 93 दुर्घटनाओं में 33 लोगों की मौत हुई है। 153 लोग घायल हुए हैं। 2021 में 420 दुर्घटनाएं हुईं जिनमें से 135 लोगों ने अपनी जान गँवाई और 949 लोग घायल हुए। 2020 में 509 दुर्घटनाएं और 128 मौतें हुईं।”
जहां एक तरफ़ सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में थोड़ी सी कमी आई है, वहीं मौतों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
अगर सरकार सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) की सिफारिशों पर काम करती है तो एक्सप्रेस-वे और राजमार्गों पर हो रही दुर्घटनाओं को कम किया जा सकता है। CRRI की 2015 की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है - क्रैश बैरियर की स्थापना, प्रत्येक पांच किलोमीटर पर ट्रैन्स्वर्स बार मार्किंग या TBMs के दो सेट के बीच स्पीड अर्रेस्टोर (गति अवरोधकों) की स्थापना, 100 किमी की गति सीमा के सख्त प्रवर्तन की अनुमति, नंबर प्लेट रीडर सिस्टम समेत स्पीड कैमरा की स्थापना और पूरे यमुना एक्सप्रेस-वे का पारंपरिक सड़क सुरक्षा ऑडिट (RSA)।
अगर हम अब भी चुप रहे तो आज नहीं तो कल हम और हमारे अपने इस "मौत के हाईवे" के शिकार हो सकते हैं।
इसलिए मैंने उत्तर प्रदेश सरकार के नाम ये पेटीशन शुरू की है ताकि यमुना एक्सप्रेस-वे पर तुरंत क्रैश बैरियर लगाए जाएं और एक्सप्रेस-वे पर हादसों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज्यादा ये ज्यादा शेयर करें ताकि फिर किसी परिवार का अकेला कमाने वाला अपनी जान ना खोए, ताकि फिर बच्चों से माता-पिता का साया ना उठे।
आपको बता दूँ कि सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) की टीम का भी सुझाव था कि यमुना एक्सप्रेस-वे पर क्रैश बैरियर लगाए जाएं ताकि हादसों में कोई वाहन सड़क के दूसरी तरफ न जा सके।
अभी उसकी जगह कटीली तार का प्रयोग होता है, जो कि बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि क्रैश बैरियर लग जाने से बसों के हादसों पर लगाम लगेगी।
मैंने खुद यमुना एक्सप्रेस-वे से गुजरते हुए कुछ हादसों को करीब से देखा है। ऐसे हादसों में जान केवल एक व्यक्ति की नहीं जाती, उसके साथ एक तरह से उसके परिवार की भी जान चली जाती है।
मैं जानती हूँ कि लोगों की एक मानसिकता बन गई है कि ऐसे हादसों का कुछ किया नहीं जा सकता। पर सच कहूँ तो ये टाले जा सकते हैं, जानें बचाई जा सकती हैं। ज़रूरत है तो बस मिलकर आवाज़ उठाने की।
मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और सरकार से कहें कि हम भारतीयों की जान इतनी सस्ती नहीं। हमें "मौत का हाईवे" नहीं "ज़िंदगी का हाईवे" चाहिए।
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