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Prof. Ganesh Ramakrishnan, Department of Computer Science and Engineering, IIT Bombay
Mar 15, 2016
राजीव जी ने इस अत्यंत सारगर्भित एवं विद्वतापूर्ण भाषण में संस्कृत भाषा के सामने चुनौतियों को उजागर किया है. उन्होंने अपनी आने वाली पुस्तक "Battle For Sanskrit" के मुख्या बिंदूओं पर चर्चा की है.
सबसे पहले उन्होंने दो विचारधाराओं में अंतर समझाया है: इनसाइडर (अन्दर से अध्ययन करने वाले) और आउटसाइडर (बाहरी अध्ययन करने वाले).
राजीव जी कहते हैं कि इनसाइडर और आउटसाइडर के विचार का जातीयता या राष्ट्रीयता से कुछ लेना देना नहीं है। यह विचार जुड़ा हुआ है “दृष्टि” से, पर्सपेक्टिव (perspective) से। राजीव कहते हैं कि उनके कई पश्चिमी मित्र “इनसाइडर” हैं क्योंकि उनका दृष्टिकोण आंतरिक है। दूसरी तरफ एक बहुत बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय हैं जो आउटसाइडर दृष्टिकोण (perspective) रखते हैं, क्योंकि या तो वे पश्चिम से बहुत प्रभावित हो गए (westernized हो गए) या अपने को पंथ-निरपेक्ष मानने लगे।
आंतरिक (इनसाइडर) दृष्टिकोण, संस्कृत को सिर्फ एक भाषा नहीं समझता बल्कि उसको सभ्यता व संस्कृति के मूलभूत आधार की तरह देखता है। आंतरिक (इनसाइडर) दृष्टिकोण संस्कृत को एक जीवित परंपरा मानता है.
इनसाइडर लोग काव्य, नाट्य को संस्कृत का एक अभिन्न अंग मानते हैं, क्योंकि इनके द्वारा संस्कृत भाषा के आध्यात्मिक स्वरुप को व्यक्त किया जा सकता है।
जबकि आउटसाइडर लोग इन्हें उत्पीड़न का एक साधन मानते हैं.
आउटसाइडर विचार वाले संस्कृत को मुख्यतः एक भाषा के तौर पर लेते हैं, न कि एक जीवन पद्दति के रूप में। दूसरी बात, आउटसाइडर में श्रद्धा भी नहीं मिलेगी।
राजीवजी ने अपनी पुस्तक में एक विशेष आउटसाइडर विचारधारा पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है : अमेरिकन ओरिएण्टलिस्म (American Orientalism).
राजीवजी के अनुसार, परम्परागत विचारकों की एक आंतरिक टीम (Home Team) होनी चाहिए जिसके सदस्य इस अमेरिकन ओरिएण्टलिस्म का पूर्व-पक्ष करें और फिर उसका उत्तर-पक्ष करें (प्रत्युत्तर दें)।
https://www.youtube.com/watch?v=fxmH858g6EQ
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