Inviting Government of India to deliver promises of distribution of land to the landless

0 व्यक्ति ने साइन किए। 10,000 हस्ताक्षर जुटाएं!

(याचिका का हिंदी अनुवाद अंग्रेजी के पश्चात है I )

Jai Jagat!

69% of India's population resides in villages and is largely dependent on land and other natural resources for its survival. But a majority of them lack access to and /or secure legal rights to land.  Here are some key statistics to put things in perspective.

  • About 7% of the population holds 47% of the land, while 93% of the population has access to only 53% of the land holdings.
  • 56% of rural families (101.4 million families) do not own any land, and about half of them are landless laborers living in extreme poverty and deprivation.
  • 18 million rural families are completely landless – lacking even a house site. Another estimated 60 million families use land but do not have secure rights to it.
  • Around 1 million urban dwellers come under the definition of homeless. Despite the existence of land reform legislation, most states have failed to redistribute land to the landless poor.

Challenges faced by the rural and urban landless and the homeless

  • India has the world’s highest number of people (over 70 million) that have been displaced forcibly from developmental projects since Independence.
  • Schedule Castes (Dalits) especially women, repeatedly face discrimination and violence while trying to access land
  • A large percentage of small farm owners do not have secure legal rights to land, and hence cannot access Government services.
  • Many revenue officials lack specific knowledge about land legislation and land records, and are thus unable to adequately implement and enforce pro-poor land laws and policies.
  • Land disputes are common and cases take a long time to be solved. In spite of owning land, these people become unable to use it for any purpose.
  • Land laws in most states are numerous and confusing and hence cannot be properly followed.
  • Registration and stamp fees for land transactions, and for adding women’s names to land is high. This precludes many people from registering land/including women’s name.
  • The Forest Rights Act (2006) was expected to rectify historical injustice meted out to Adivasis and other forest dwellers. But only less than 40% of the claimants of forest rights (individual and community) filed across the country have been admitted.

Ekta Parishad, a people's movement, has been continuously working for land reform in India over the past 30 years. During Jan Aadesh 2007 (when 25,000 people walked from Gwalior to Delhi) and Jan Satyagraha 2012 (when 1 lakh people walked from Gwalior to Delhi), some of the key concerns were negotiated with the Central Government in Agra on the 11th of October 2012. However, the impacts of the campaigns and negotiations have not led to the desired change for marginalized communities.

To continue this unfinished agenda, Ekta Parishad is undertaking another mass action named JAN ANDOLAN (People’s Action) on 2nd October 2018. 25,000 adivasis and dalit people shall march from Gwalior to Delhi with the following demands.

1.         Introduce and execute -National Homestead Land Rights Act

A draft Homestead Bill has been developed by GOI as an outcome of the 2012 Agra agreement that needs to be introduced in the parliament. This is a model bill that ensures about 500 sq yards of land to a rural homeless person which is the bare minimum in the rural context for a home, a kitchen garden and maintenance of cattle.

2. Introduce and execute - National Land Reforms Policy

A draft National Land Reforms Policy was prepared by GOI as an outcome of the 2012 Agra Agreement and needs to be approved by the cabinet. The Land-Reforms policy brings concrete suggestions on addressing the issue of land-distribution

3. Introduce and execute - Women Farmer Entitlement Act

The Women Farmer Entitlement Acti s a private member bill introduce by Shri. M.S Swaminathan that ensures the recognition of women farmers as farmers and includes several progressive provisions for “gender-specific needs of women farmers, protect their entitlements, and empower them with rights over agricultural land and water resources, and also access to credit, among other things.”

4. Introduce &  execute  -  Land  Tribunals  and  Fast  Track  Courts  for  resolving  land disputes/cases

5. Set  up  new  'execution  and  monitoring'  structures  on  Panchayat  (extension  in  the Scheduled Area) Act-1996 and Forest Rights Act-2006.

6. Set up and operationalize - National Land Reforms Council & National Task Force on Land Reforms

The Council and the Task Force were formed by GOI in 2007 as an outcome of Janadesh with the Honourable Prime Minister as the Chair of the COunil and Rural Development Minister as the Chair of the task force. Ekta Parishad is a member on both these bodies.

We believe that access to land and shelter is a basic human right, especially to those whose lives and livelihoods have been intimately connected with their land over thousands of years. We extend our heartfelt solidarity with our brothers and sisters who have been rendered landless and homeless by our collective negligence. We appeal to the Government to deliver on the promise made to them in Agra in 2012 and implement the 6-point agenda of the Andolan.

Thank you!

Concerned citizens of India

भारत सरकार से भारत के समस्त भूमिहीनों के भूमि अधिकार सुनिश्चित करने की अपील


जय जगत!

यह सर्वविदित है कि ग्रामीण भारत में रहने वाली देश की 69 प्रतिशत जनसंख्या पूर्णरूपेण भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हैं। लेकिन एक कटुसत्य यह भी है कि इस बड़ी जनसंख्या में से अधिकांश या तो भूमिहीन हैं या फिर भूमि पर अपने कानूनी अधिकार से वंचित हैं। नीचे प्रस्तुत कुछ आंकड़ों के माध्यम से हम देश में भूमिहीनों की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सकते हैंः

·         देश की कुल भूमि में से 47 फिसदी का स्वामित्व कुल जनसंख्या के महज 7 फिसदी लोगों के पास है। शेष 93 फिसदी जनसंख्या के हिस्से में कुल 53 फिसदी भूमि ही है।

·         गांवों में रहने वाले 56 फिसदी परिवारों (10 करोड़ 14 लाख लोगों) के पास किसी प्रकार की भूमि नहीं है। इनमें से आधी से अधिक आबादी भूमिहीन श्रमिकों की है जो बेहद अभाव और गरीबी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

·         1 करोड़ 80 लाख ग्रामीण परिवार बिल्कुल ही भूमिहीन हैं, यहां तक कि उनके सिर पर छत भी मयस्सर नहीं है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 6 करोड़ परिवार किसी न किसी प्रकार से आजीविका के लिए भूमि का उपयोग करते हैं लेकिन उनके पास इस भूमि का कानूनी स्वामित्व नहीं है।

·         लगभग 10 लाख शहरी जनसंख्या भी भूमिहीन की परिभाषा के अंतर्गत चिन्हित है। दुर्भाग्यवश भूमि सुधार कानूनों की घोषणा के बावजूद अधिकतर राज्य भूमिहीनों को भूमि का पुनर्वितरण करने में नाकाम रहे हैं।

ग्रामीण और शहरी भूमिहीनों एवं आवासहीनों के समक्ष आ रही कुछ चुनौतियांः

·         भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है जहां विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम सबसे अधिक जनसंख्या को उनके मूलनिवास से बेदखल किया गया है। आजादी के बाद से लेकर अब तक करीब 7 करोड़ लोगों की भूमि और उनसे आवास विकास की भेंट चढ़े हैं।

·         अनुसूचित जाति (दलित) और विशेषकर महिलाओं ने भूमि अधिकारों के संदर्भ में लगातार सबसे ज्यादा भेदभाव, शोषण और अत्याचार का सामना किया है।

·         देश में ऐसे छोटे किसान भी बड़ी तादाद में हैं जिनके पास उनके द्वारा जोती जा रही भूमि का वैधानिक अधिकार नहीं है। इस कारण वो किसी भी प्रकार की शासकीय सेवा और सहायता से वंचित रह जाते हैं।

·         अनेक राजस्व कार्मिकों को भूमि अधिकार और भू-कानूनों की पूरी समझ नहीं हैं। इस वजह से भी नियमों और सुधारों का क्रियान्वयन प्रभावित होता है और भूमिहीनों को उनका अधिकार नहीं मिल पाता है।

·         जमीन से जुड़े मुकद्दमें और विवादों के निपटारे में लंबा समय लग जाता है। न्यायालयों में मामला लंबित रहने के कारण भूमि मालिक अपनी ही भूमि का किसी भी प्रकार से उपयोग नहीं कर पाता है।

·         विभिन्न राज्यों में भूमि कानूनों की संख्या और सूची बेहद विस्तृत और उलझी हुई है। इस वजह से भी नियमों के अनुपालन में बाधा पहुंचती है।

·         विभिन्न राज्यों में भूमि हस्तांतरण और लेन-देन के लिए पंजीयन और स्टाम्प शुल्क की दरें अधिक हैं। भूमि के स्वामित्व में महिलाओं का नाम जोड़ना एक खर्चीला विषय है। इस वजह से अक्सर बहुत से लोग और महिलाएं भूमि के स्वामित्व से वंचित रह जाती हैं।

·         वन अधिकार अधिनियम (2006) के माध्यम से आदिवासियों, वनवासियों और मूलवासियों के साथ हो रहे ऐतिहासिक अन्याय के खत्म होने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन पूरे देश में दायर किए गए वनअधिकारों (व्यक्तिगत और सामुदायिक) की दावेदारियों में से सिर्फ 40 फिसदी ही स्वीकार किये गए।


अपनी स्थापना के समय से ही जन अधिकारों के लिए समर्पित संगठन के तौर पर कार्य कर रही एकता परिषद के कदम पिछले 30 वर्षों में कभी नहीं थमे हैं। एकता परिषद देश में भूमि सुधारों के लिए पिछले तीन दशकों से निरंतर कार्य कर रहा है। वर्ष 2007 में जन आदेश के दौरान जब 25000 लोगों ने ग्वालियर से नई दिल्ली तक की पदयात्रा की और वर्ष 2012 में जन सत्याग्रह के दौरान जब 100000 लोगों ने ग्वालियर से नई दिल्ली के लिए कूच किया था। हालांकि 11 अक्टूबर 2012 को आगरा में केंद्र सरकार के साथ कुछ प्रमुख विषयों पर समझौता हुआ लेकिन इन अभियानों और वार्ताओं के बावजूद वंचितों और भूमिहीनों की समस्याओं का संपूर्ण हल नहीं निकला।

वंचितों के अधूरे उद्देश्यों को पूर्ण करने की इसी श्रृंखला में एकता परिषद पुनः जनआंदोलन के नाम से एक और जन यात्रा की घोषणा कर चुका है। राष्ट्र्पिता की जयंती पर 2 अक्टूबर 2018 को 25000 आदिवासी और दलित पुनः निम्नलिखित मांगों को लेकर ग्वालियर से नई दिल्ली के लिए कूच करेंगे।

v  राष्ट्रीय आवासीय भूमि अधिकार कानून की घोषणा एवं क्रियान्वयन

2012 के आगरा समझौते के परिणामस्वरुप भारत सरकार के द्वारा एक आवास विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था जिसे संसद में प्रस्तुत करने की जरुरत है। यह एक आदर्श मसौदा है जिसमें ग्रामीण बेघरों के लिए 500 वर्ग भूमि की व्यवस्था की बात कही गई है। जिसमें आवास के साथ एक किचन गार्डन और पशुओं के रहने की जगह होगी।

v  महिला कृषक हकदारी कानून की घोषणा एवं क्रियान्वयन

महिला कृषक हकदारी कानून निजी विधेयक के तौर पर श्री एमएस स्वामिनाथन के द्वारा प्रस्तुत किया गया था। यह महिला कृषकों की पहचान सुनिश्चित करता है। इसके प्रगतिशील प्रावधानों के द्वारा महिला कृषकों की विशेष आवश्यकताओं और उनके अधिकारों की रक्षा का ध्यान रखा गया है।  कृषि भूमि और जल संसाधनों तक उनकी पहुंच और कृषक के तौर पर अंतिम लाभ का श्रेय महिलाओं को देने की व्यवस्था की गई है।

v  राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति की घोषणा एवं क्रियान्वयन

2012 के आगरा समझौता के परिणाम के रूप में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति तैयार की गई थी जिसे कैबिनेट द्वारा अनुमोदित करने की जरुरत है। भूमि वितरण के विषय पर भूमि सुधार नीति में ठोस उपायों की चर्चा की गई है।

v  भारत सरकार द्वारा पूर्व में गठित राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद और राष्ट्रीय भूमि सुधार कार्यबल को सक्रिय करना

2007 में जनादेश यात्रा के परिणामस्वरुप राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद और राष्ट्रीय भूमि सुधार कार्यबल का गठन भारत सरकार के द्वारा किया गया था। राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद के अध्यक्ष के तौर पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय भूमि सुधार कार्यबल के प्रमुख के तौर पर केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने उत्तरदायित्व स्वीकार किया था। एकता परिषद इन दोनों निकायों का एक सदस्य है।

v  वनाधिकार कानून-2006 और पंचायत विस्तार उपबंध अधिनियम-1996 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर निगरानी तंत्र की स्थापना

v  भूमि संबंधी विवादों के शीघ्र समाधान के लिए त्वरित न्यायालयों का संचालन

हमारा मानना है कि भोजन और आवास आधारभूत मानव अधिकार हैं। विशेषकर उन नागरिकों के लिए जिनका जीवन और जिनकी आजीविका हजारों वर्षों से सिर्फ और सिर्फ भूमि पर निर्भर है। हम अपने उन भाईयों और बहनों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करते हैं जो कहीं न कहीं हमारी लापरवाही और अकर्मण्यता के कारण आज भूमिहीन और आवासहीन हैं। हम केन्द्र सरकार से वर्ष 2012 में किए गए वादों और जन आंदोलन के छह सूत्रीय मांगों को पूरा करने का आग्रह करते हैं।



भारत के समस्त संबंधित नागरिक