A petition to restore the quality of medical education


A petition to restore the quality of medical education
The Issue
भारत की चिकित्सा शिक्षा में सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1980 के दशक में एक के बाद एक लगातार लिए गए कुछ निर्णयों के कारण भारत में चिकित्सा शिक्षा का क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. इन निर्णयों को बदले बिना, चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में कोई भी सुधार संभव नहीं है. यह बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाने के लिए, यह ऑनलाइन याचिका डाली जा रही है.
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में मूलभूत सुधार की जरूरत है
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में कुछ मूलभूल सुधार लाने की जरूरत है. या कह सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय को अपनी दिशा बदलने की जरूरत है. यह बात केवल दो माह पहले निर्णय से स्पष्ट हो जाती है.
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 25 जुलाई 2025 को लिए गए एक निर्णय का सारांश यह निकाला जा सकता है: (1) उच्च शिक्षा में कुछ मूलभूत खराबियाँ हैं. (2) विद्यार्थियों को उन खराबियों से समझौता करना होगा. इसके अतिरिक्त कोई और विकल्प हमारे पास नहीं है. (3) जो विद्यार्थी उन खराबियों से समझौता नहीं कर पा रहे हैं, उन विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य सुधारने की जरूरत है. (4) कोचिंग और उच्च शिक्षण संस्थाओं को हमारे आदेश के पार्ट B में दिए गए पंद्रह आदेशों को लागू करना होगा, जिससे विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रह सके और वे आत्महत्या न करें. (5) शिक्षा में मूलभूत सुधार के लिए कोई आदेश नहीं दिया गया है. (देखें: Sukdeb Saha v. the State of Andhra Pradesh, 2025, SC arising out of SLP (Crl) No (s) 6378 of 2024) इस याचिका का उद्देश्य उच्चतम न्यायालय को नीचा दिखाना नहीं है. इस याचिका का उद्देश्य एक रास्ता निकालना है, जिस रास्ते पर चलकर हम अपनी चिकित्सा शिक्षा में सुधार ला सकें. अफसोस इस बात का है कि यह कोई अकेला आदेश नहीं है, जिसमें दृष्टी का आभाव दिखलाई देता है. इस प्रकार के आदेशों की एक लंबी परंपरा रही है.
क्या पूर्व में भी इसी प्रकार के दृष्टी-हीन निर्णय लिए गए हैं?
दृष्टीहीनता के कारण पूर्व में उच्चतम न्यायालय इस प्रकार के आदेश देता रहा है, जिन आदेशों के कारण भारत की चिकित्सा शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित हुई है. चिकित्सा शिक्षा की दुर्दशा को समझने से पहले, हमें चिकित्सा शिक्षा को समझ लेना पड़ेगा. एम बी बी एस की पढाई साड़े चार साल की होती है, और उस दौरान सैकड़ों की संख्या में परीक्षाएं होती हैं. इन परीक्षाओं में आधे अंक प्रैक्टिकल और क्लिनिकल परीक्षाओं के होते हैं, यानी मरीजों की जांच-पड़ताल करना सीखने को विशेष महत्व दिया जाता है. एम बी बी एस के बाद, एक साल की इंटर्नशिप होती है, जिस दौरान मरीजों की देखभाल पर ही पूरा ध्यान देना होता है.
एम बी बी एस के दौरान विद्यार्थी अपनी पढाई पर पूरा ध्यान दिया करते थे, क्योंकि एम बी बी एस की परीक्षाओं में पाप्त कुल अंकों के आधार पर ही एम डी और एम एस में दाखिला दिया जाता था. लेकिन 1980 के दशक में उच्चतम न्यायालय द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के बाद यह स्थिति बदल गई. इन निर्णयों के बाद एम डी और एम एस में दाखिला एक तीन घंटे के MCQ टेस्ट के आधार पर किया जाने लगा है. अब कल्पना करिए कहाँ पूरे एम बी बी एस के दौरान पाए गए अंक और कहना केवल तीन घंटे के MCQ टेस्ट के दौरान पाए गए अंक. किस आधार पर एम डी, एम एस में दाखिला देना बेहतर माना जाना चाहिए? लेकिन उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश अपने निर्णय पर कायम रहे, और 1990 के दशक से एम डी, एम एस इत्यादि में दाखिला केवल तीन घंटे के MCQ के आधार पर होता है.
एम डी, एम एस, इत्यादि में दाखिले के लिए केवल तीन घंटे का MCQ टेस्ट और उसके परिणाम
एम डी, एम एस इत्यादि में दाखिला तीन घंटे के MCQ टेस्ट के आधार पर होने लगा है. इसका अर्थ है कि एम बी बी एस की परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का कोई महत्व नहीं रह गया है, और एम बी बी एस की पढ़ाई पर से विद्यार्थियों का ध्यान हट गया है. इतना ही नहीं उनका पूरा ध्यान तीन घंटे के MCQ टेस्ट में अच्छे अंक लाने पर केन्द्रित हो गया है, जिससे उनको एम डी या एम एस की एक अच्छी सीट पर दाखिला मिल सके. यहाँ तक कि इंटर्नशिप के दौरान भी पूरा ध्यान तीन घंटे के MCQ टेस्ट की पढ़ाई पर ही केन्द्रित रहता है, जिसे आजकल NEET-PG कहा जाता है. NEET-PG की तैयारी में व्यस्त रहने के कारण, यह भी देखा गया है की विद्यार्थी इंटर्नशिप के दौरान अपनी ड्यूटी अटेंड ही नहीं करते हैं, और अटेंडेंस रिपोर्ट पर फर्जी हस्ताक्षर के मामले भी सामने आए हैं. रिश्वत लेकर अटेंडेंस देने के मामले भी सामने आए हैं. अखबारों में भी इस प्रकार के समाचार प्रकाशित हुए हैं, लेकिन किसी भी मामले में कोई ठोस कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकी है.
विद्यार्थियों की सोच बदलने के लिए एम डी, एम एस में दाखिले का आधार बदलना जरूरी है
एम बी बी एस के विद्यार्थी कक्षाओं में जाने के बदले कोचिंग क्लास में हाजिरी देते हैं, और इंटर्नशिप के दौरान भी गायब रहते हैं. इस बात के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं. इस सच्चाई से इनकार कर पाना मुश्किल है कि विद्यार्थियों का मन एम बी बी एस की पढ़ाई में है ही नहीं. उनका ध्यान केवल तीन घंटे के MCQ टेस्ट की तरफ है, जिससे उनके भविष्य का फैसला होने वाला है. अगर एम बी बी एस की पढ़ाई उनके भविष्य का फैसला करेगी, तभी उनका मन पढ़ाई में लगने वाला है. इसलिए एम बी बी एस की पढ़ाई को ही एम डी और एम एस में प्रवेश के लिए आधार बनाना जरूरी हो जाता है. इसके लिए उच्चतम न्यायालय के 1980 के दशक में लिए गए निर्णयों को पलटना जरूरी है. इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह याचिका डाली जा रही है.
इस विषय पर विस्तृत जानकारी इस लिंक पर दी गई है
इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए, इस PDF को डाउनलोड करें.
इस याचिका पर अपने हस्ताक्षर करें और इस मुद्दे को आगे बढ़ाएं
अधिक से अधिक लोगों को इस याचिका पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित करें.

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The Issue
भारत की चिकित्सा शिक्षा में सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1980 के दशक में एक के बाद एक लगातार लिए गए कुछ निर्णयों के कारण भारत में चिकित्सा शिक्षा का क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. इन निर्णयों को बदले बिना, चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में कोई भी सुधार संभव नहीं है. यह बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाने के लिए, यह ऑनलाइन याचिका डाली जा रही है.
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में मूलभूत सुधार की जरूरत है
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में कुछ मूलभूल सुधार लाने की जरूरत है. या कह सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय को अपनी दिशा बदलने की जरूरत है. यह बात केवल दो माह पहले निर्णय से स्पष्ट हो जाती है.
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 25 जुलाई 2025 को लिए गए एक निर्णय का सारांश यह निकाला जा सकता है: (1) उच्च शिक्षा में कुछ मूलभूत खराबियाँ हैं. (2) विद्यार्थियों को उन खराबियों से समझौता करना होगा. इसके अतिरिक्त कोई और विकल्प हमारे पास नहीं है. (3) जो विद्यार्थी उन खराबियों से समझौता नहीं कर पा रहे हैं, उन विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य सुधारने की जरूरत है. (4) कोचिंग और उच्च शिक्षण संस्थाओं को हमारे आदेश के पार्ट B में दिए गए पंद्रह आदेशों को लागू करना होगा, जिससे विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रह सके और वे आत्महत्या न करें. (5) शिक्षा में मूलभूत सुधार के लिए कोई आदेश नहीं दिया गया है. (देखें: Sukdeb Saha v. the State of Andhra Pradesh, 2025, SC arising out of SLP (Crl) No (s) 6378 of 2024) इस याचिका का उद्देश्य उच्चतम न्यायालय को नीचा दिखाना नहीं है. इस याचिका का उद्देश्य एक रास्ता निकालना है, जिस रास्ते पर चलकर हम अपनी चिकित्सा शिक्षा में सुधार ला सकें. अफसोस इस बात का है कि यह कोई अकेला आदेश नहीं है, जिसमें दृष्टी का आभाव दिखलाई देता है. इस प्रकार के आदेशों की एक लंबी परंपरा रही है.
क्या पूर्व में भी इसी प्रकार के दृष्टी-हीन निर्णय लिए गए हैं?
दृष्टीहीनता के कारण पूर्व में उच्चतम न्यायालय इस प्रकार के आदेश देता रहा है, जिन आदेशों के कारण भारत की चिकित्सा शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित हुई है. चिकित्सा शिक्षा की दुर्दशा को समझने से पहले, हमें चिकित्सा शिक्षा को समझ लेना पड़ेगा. एम बी बी एस की पढाई साड़े चार साल की होती है, और उस दौरान सैकड़ों की संख्या में परीक्षाएं होती हैं. इन परीक्षाओं में आधे अंक प्रैक्टिकल और क्लिनिकल परीक्षाओं के होते हैं, यानी मरीजों की जांच-पड़ताल करना सीखने को विशेष महत्व दिया जाता है. एम बी बी एस के बाद, एक साल की इंटर्नशिप होती है, जिस दौरान मरीजों की देखभाल पर ही पूरा ध्यान देना होता है.
एम बी बी एस के दौरान विद्यार्थी अपनी पढाई पर पूरा ध्यान दिया करते थे, क्योंकि एम बी बी एस की परीक्षाओं में पाप्त कुल अंकों के आधार पर ही एम डी और एम एस में दाखिला दिया जाता था. लेकिन 1980 के दशक में उच्चतम न्यायालय द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के बाद यह स्थिति बदल गई. इन निर्णयों के बाद एम डी और एम एस में दाखिला एक तीन घंटे के MCQ टेस्ट के आधार पर किया जाने लगा है. अब कल्पना करिए कहाँ पूरे एम बी बी एस के दौरान पाए गए अंक और कहना केवल तीन घंटे के MCQ टेस्ट के दौरान पाए गए अंक. किस आधार पर एम डी, एम एस में दाखिला देना बेहतर माना जाना चाहिए? लेकिन उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश अपने निर्णय पर कायम रहे, और 1990 के दशक से एम डी, एम एस इत्यादि में दाखिला केवल तीन घंटे के MCQ के आधार पर होता है.
एम डी, एम एस, इत्यादि में दाखिले के लिए केवल तीन घंटे का MCQ टेस्ट और उसके परिणाम
एम डी, एम एस इत्यादि में दाखिला तीन घंटे के MCQ टेस्ट के आधार पर होने लगा है. इसका अर्थ है कि एम बी बी एस की परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने का कोई महत्व नहीं रह गया है, और एम बी बी एस की पढ़ाई पर से विद्यार्थियों का ध्यान हट गया है. इतना ही नहीं उनका पूरा ध्यान तीन घंटे के MCQ टेस्ट में अच्छे अंक लाने पर केन्द्रित हो गया है, जिससे उनको एम डी या एम एस की एक अच्छी सीट पर दाखिला मिल सके. यहाँ तक कि इंटर्नशिप के दौरान भी पूरा ध्यान तीन घंटे के MCQ टेस्ट की पढ़ाई पर ही केन्द्रित रहता है, जिसे आजकल NEET-PG कहा जाता है. NEET-PG की तैयारी में व्यस्त रहने के कारण, यह भी देखा गया है की विद्यार्थी इंटर्नशिप के दौरान अपनी ड्यूटी अटेंड ही नहीं करते हैं, और अटेंडेंस रिपोर्ट पर फर्जी हस्ताक्षर के मामले भी सामने आए हैं. रिश्वत लेकर अटेंडेंस देने के मामले भी सामने आए हैं. अखबारों में भी इस प्रकार के समाचार प्रकाशित हुए हैं, लेकिन किसी भी मामले में कोई ठोस कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकी है.
विद्यार्थियों की सोच बदलने के लिए एम डी, एम एस में दाखिले का आधार बदलना जरूरी है
एम बी बी एस के विद्यार्थी कक्षाओं में जाने के बदले कोचिंग क्लास में हाजिरी देते हैं, और इंटर्नशिप के दौरान भी गायब रहते हैं. इस बात के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं. इस सच्चाई से इनकार कर पाना मुश्किल है कि विद्यार्थियों का मन एम बी बी एस की पढ़ाई में है ही नहीं. उनका ध्यान केवल तीन घंटे के MCQ टेस्ट की तरफ है, जिससे उनके भविष्य का फैसला होने वाला है. अगर एम बी बी एस की पढ़ाई उनके भविष्य का फैसला करेगी, तभी उनका मन पढ़ाई में लगने वाला है. इसलिए एम बी बी एस की पढ़ाई को ही एम डी और एम एस में प्रवेश के लिए आधार बनाना जरूरी हो जाता है. इसके लिए उच्चतम न्यायालय के 1980 के दशक में लिए गए निर्णयों को पलटना जरूरी है. इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह याचिका डाली जा रही है.
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Petition created on 15 September 2025