हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियों के अवैध ध्वस्तीकरण के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाइए।

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The Issue

हम भारत के लोग अपने स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को गहराई से मानते हैं और उनके सम्मान और स्मृति को सहेजकर रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता और न ही किसी भी परिस्थिति में उनका अपमान स्वीकार्य है।

सोमवार, 23 मार्च 2026 को, जब पूरा देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव थापर जैसे शहीदों को याद कर रहा था, उसी पवित्र अवसर की पूर्व संध्या पर शाहजहांपुर में एक बेहद दुखद और अपमानजनक घटना घटी।

राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला ख़ान और रोशन सिंह की मूर्तियों को सम्मानपूर्वक हटाने के बजाय, फ्लाई इन्फ्राटेक कंपनी के कर्मचारियों ने बुलडोजर का इस्तेमाल किया। इससे मूर्तियाँ सड़क पर गिर गईं, उनके सिर और धड़ अलग हो गए, और टूटे हुए हिस्से मलबे में पड़े रहे। जब लोगों ने इसका विरोध किया, तो नगर प्रशासन की ओर से कोई साफ़ जवाब नहीं मिला।

नगर निगम परिसर में काकोरी के इन शहीदों—पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला ख़ान, रोशन सिंह और प्रेम कृष्ण खन्ना—की मूर्तियाँ वर्षों से साहस और बलिदान का प्रतीक थीं। ये स्मारक स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर विशेष महत्व रखते थे।

नगर निगम ने सौंदर्यीकरण के लिए लखनऊ की एक कंपनी को ठेका दिया था, जिसमें योजना थी कि मूर्तियों को सावधानी से हटाकर फिर से स्थापित किया जाएगा। लेकिन इसके बजाय बुलडोजर का उपयोग किया गया, जिससे अपूरणीय क्षति हुई। बताया जाता है कि इन मूर्तियों के अवशेष कचरे के साथ डंपिंग ग्राउंड में फेंक दिए गए, जिससे लोगों की पीड़ा और बढ़ गई।

स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने इसका कड़ा विरोध किया। पार्षद दिवाकर मिश्रा ने कहा कि मूर्तियों को सम्मान के साथ हटाया जाना चाहिए था, वहीं मेयर अर्चना वर्मा ने कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बावजूद नगर आयुक्त की ओर से जवाबदेही स्पष्ट नहीं दिखी।

ये मूर्तियाँ 50 से अधिक वर्षों से स्थापित थीं और उनका ऐतिहासिक व भावनात्मक महत्व बहुत गहरा था। प्रेम कृष्ण खन्ना ने स्वयं इनके निर्माण में योगदान दिया था, इसलिए उनका इस तरह नष्ट होना और भी दुखद है।

इन शहीदों के बलिदान को याद करना हमारा कर्तव्य है—

राम प्रसाद बिस्मिल — 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई; कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहे।
अशफाक़ उल्ला ख़ान — 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी दी गई; अत्याचार सहकर भी साथियों के प्रति निष्ठावान रहे।
रोशन सिंह — 19 दिसंबर 1927 को नैनी जेल में फांसी दी गई; सीमित भूमिका के बावजूद साहस से मृत्यु का सामना किया।
प्रेम कृष्ण खन्ना — फांसी नहीं हुई, लेकिन कठोर कारावास झेला।

ऐसी घटनाएँ सिर्फ लापरवाही नहीं हैं, बल्कि उन महान बलिदानों का अपमान हैं जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

हमारा कर्तव्य है कि इन शहीदों के सम्मान में उनके स्मारकों को गरिमा के साथ सुरक्षित रखा जाए और उनकी रक्षा के लिए सख्त कदम उठाए जाएँ।

इस अवसर पर मैं देश के सभी नागरिकों और संबंधित अधिकारियों से निवेदन करता हूँ—

इन मूर्तियों को तुरंत सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित किया जाए।
पूरी घटना की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएँ।
आने वाली पीढ़ियों को इन क्रांतिकारियों के बलिदान के बारे में जागरूक किया जाए।

यह केवल मूर्तियों का मुद्दा नहीं है, यह हमारे इतिहास के सम्मान और हमारी आज़ादी की आत्मा का प्रश्न है।

मैं सभी नागरिकों से अपील करता हूँ कि इस मुद्दे पर एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।

“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है।”
— राम प्रसाद बिस्मिल

The Decision Makers

Yogi Adityanath
Chief Minister of Uttar Pradesh
Dharmendra Pratap Singh
Dharmendra Pratap Singh
The District Magistrate (DM) of Shahjahanpur
Dr. Bipin Kumar Mishra,
Dr. Bipin Kumar Mishra,
Municipal Commissioner of Nagar Nigam Shahjahanpur,
Archana Verma (Mayor, Shahjahanpur)
Archana Verma (Mayor, Shahjahanpur)
Mayor of Shahjahanpur

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