राजनीतिक आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करें | Review Political Reservation System in India

The Issue

भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी मूल भावना समान अवसर, स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा एवं जनाधिकार आधारित प्रतिनिधित्व पर आधारित है। चुनाव एक विशुद्ध राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को समान रूप से नेतृत्व प्रदान करने और चुनने का अवसर देना है।

वर्तमान में संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण निर्धारित है। यह व्यवस्था ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लागू की गई थी, जिससे वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके।

किन्तु वर्तमान समय में यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस व्यवस्था के प्रभावों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। जब किसी क्षेत्र को आरक्षित घोषित किया जाता है, तब उस क्षेत्र के अन्य नागरिक—जो संबंधित आरक्षित वर्ग में नहीं आते—चुनाव लड़ने के अवसर से वंचित हो जाते हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक समानता एवं स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत के संदर्भ में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 334 के अंतर्गत इस प्रकार की व्यवस्था को प्रारंभ में केवल अस्थायी (10 वर्ष) के लिए लागू किया गया था, जिससे स्पष्ट होता है कि इसे स्थायी समाधान के रूप में नहीं देखा गया था, बल्कि समय-समय पर इसकी समीक्षा अपेक्षित थी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधित्व का आधार जनसमर्थन, योग्यता एवं नेतृत्व क्षमता होना चाहिए। अतः यह आवश्यक है कि वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक आरक्षण की निरंतरता का पुनः मूल्यांकन किया जाए।

हमारी प्रमुख मांगें:

अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत राजनीतिक आरक्षण व्यवस्था की व्यापक एवं निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
अनुच्छेद 334 की मूल भावना (अस्थायी व्यवस्था) को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर समयबद्ध पुनर्विचार किया जाए।
लोकतंत्र को पूर्णतः समान अवसर आधारित बनाने हेतु आवश्यक संवैधानिक सुधारों पर विचार किया जाए।
आपका एक हस्ताक्षर इस महत्वपूर्ण मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में मदद कर सकता है। कृपया इस याचिका का समर्थन करें और इसे अधिक से अधिक लोगों तक साझा करें।

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UTTAM KUMARPetition StarterA CREATIVE THINKER

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भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी मूल भावना समान अवसर, स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा एवं जनाधिकार आधारित प्रतिनिधित्व पर आधारित है। चुनाव एक विशुद्ध राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को समान रूप से नेतृत्व प्रदान करने और चुनने का अवसर देना है।

वर्तमान में संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण निर्धारित है। यह व्यवस्था ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लागू की गई थी, जिससे वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके।

किन्तु वर्तमान समय में यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस व्यवस्था के प्रभावों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। जब किसी क्षेत्र को आरक्षित घोषित किया जाता है, तब उस क्षेत्र के अन्य नागरिक—जो संबंधित आरक्षित वर्ग में नहीं आते—चुनाव लड़ने के अवसर से वंचित हो जाते हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक समानता एवं स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत के संदर्भ में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 334 के अंतर्गत इस प्रकार की व्यवस्था को प्रारंभ में केवल अस्थायी (10 वर्ष) के लिए लागू किया गया था, जिससे स्पष्ट होता है कि इसे स्थायी समाधान के रूप में नहीं देखा गया था, बल्कि समय-समय पर इसकी समीक्षा अपेक्षित थी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधित्व का आधार जनसमर्थन, योग्यता एवं नेतृत्व क्षमता होना चाहिए। अतः यह आवश्यक है कि वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक आरक्षण की निरंतरता का पुनः मूल्यांकन किया जाए।

हमारी प्रमुख मांगें:

अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत राजनीतिक आरक्षण व्यवस्था की व्यापक एवं निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
अनुच्छेद 334 की मूल भावना (अस्थायी व्यवस्था) को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर समयबद्ध पुनर्विचार किया जाए।
लोकतंत्र को पूर्णतः समान अवसर आधारित बनाने हेतु आवश्यक संवैधानिक सुधारों पर विचार किया जाए।
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