हमारी न्यायिक प्रक्रिया का आरम्भ ही अन्याय से होता है।
"न्यायिक प्रक्रिया और वकालतनामा"
“यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि न्यायिक प्रक्रिया का आरम्भ ही अन्याय से होता है।”
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न्यायालय में किसी वाद की न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ होने के लिये, सामान्यत: वादी और प्रतिवादी (उभयपक्ष) को किसी अधिवक्ता को नियुक्त (appoint) करना होता है, और उभयपक्षों को एक वकालतनामा के माध्यम से अपने-अपने अधिवक्ता को न्यायालय में उसकी ओर से पैरवी करने के लिये अधिकृत करना होता है। वकालतनामा एक विधिक प्रलेख है। वकालतनामा का कोई सर्वमान्य प्रारूप नहीं है । प्रत्येक न्यायालय में वकालतनामा के भिन्न भिन्न प्रारूप प्रचलन में हैं परंतु सभी प्रारूपों में एक बात सामान्य होती है कि सभी वकालतनामा एकतरफा (one sided) होते हैं, इसमें मुवक्किल के हित की कोई बात निहित नहीं होती है और यही अधिवक्ताओं को मुवक्किलों का शोषण करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता हैI
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि न्यायिक प्रक्रिया का आरम्भ ही अन्याय से होता है।
अधिवक्ता, अभियंता, वास्तुकार, सलाहकार आदि की तरह, एक पेशेवर (professional) होता है और व्यापारी/कारोबारी/व्यवसायी (businessman) की श्रेणी में नहीं आता है। किसी भी पेशे में दो पक्ष होते हैं पेशेवर (professional) और मुवक्किल (client) और दोनों को हम उभयपक्ष से संबोधित करते हैं। उभयपक्षों के बीच किसी विशेष परियोजना (project) के लिये सुनिश्चित नियम एवं शर्तो के अनुसार एक लिखित अनुबंध होता है जिसमें उभयपक्षों के हितों को ध्यान में रख कर उनके अधिकार, दायित्व, अप्रत्याशित परिस्थितियाँ, परियोजना पारश्रमिक और अन्य वित्तीय (financial), विवरण निहित होते हैं, स्पष्ट परिभाषित होते है।
हम किसी पेशेवर को किसी परियोजना के लिये नियुक्त करके एक अनुबंध करते हैं न कि उसे परियोजना के लिये अधिकृत (authorize) करते हैं।
प्रत्येक वाद एक न्यायिक परियोजना है।
प्रत्येक वकालतनामा में, उसका प्रारूप कुछ भी हो, अधिवक्ता को नियुक्त (appoint) करने की बात कही जाती है और उसमें मुवक्किल (वादी/प्रतिवादी) द्वारा भुगतान की जाने वाली अधिवक्ता के पारश्रमिक (fee) का असपष्ट उल्लेख होता है। और इस प्रकार वकालतनामा एक प्रकार का प्राधिकार पत्र (authorization letter) होता है न कि अनुबंध प्रलेख (contract document), क्यों? जबकि वास्तविकता में वादी/ प्रतिवादी और उसके अधिवक्ता के मध्य में एक प्रकार का अनुबंध (contract) होता है और इसलिए वकालतनामा एक अनुबंध प्रलेख होना चाहिए न कि प्राधिकार पत्र। अनुबंध हमेशा द्विपक्षीय होता है और इसलिये वकालतनामा में अधिवक्ता के दायित्वों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये।
यहाँ यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि सभी प्राधिकार पत्र (authorization letter) में कुछ सीमाओं का उल्लेख अवश्य होता है परंतु वकालतनामा में ऐसा कुछ नहीं होता है।
अधिवक्ताओं द्वारा वादी/ प्रतिवादी के शोषण होने और वादों के लंबे अंतराल तक जारी रहने का प्रमुख कारण वकालतनामा का अनुबंध प्रलेख न होना है। अधिवक्ता मुवक्किल से अपनी फीस एवं अन्य खर्चे तो अग्रिम ले लेता है और समय-समय पर विविध खर्चे, खर्चे विधि मान्य हों अथवा न हों, भी लेता रहता है और बदले में वादी/ प्रतिवादी को वाद की प्रगति की कोई जानकारी नहीं देता है, न्यायालय में दाखिल किसी भी प्रलेख की कोई प्रतिलिपि साझा नहीं करता है, कभी भी स्वत: अपने मुवक्किल को संपर्क करके कोई सूचना नहीं देता है, परिणाम स्वरूप वादी/ प्रतिवादी के हाथ हमेशा खाली कि खाली रहते हैं, वह हमेशा अंधेरे में रहता है और अधिवक्ता के पीछे वाद कि प्रगति जानने के लिये भागता रहता है और फिर भी अधिवक्ता कोई उत्तर नहीं देता है। उसे सिर्फ इतना बताया जाता है कि उसके वाद में एक और तारीख पड़ गई, वह भी मुवक्किल के पूछने पर, तारीख पड़ने का कभी कोई और कभी कोई अन्य कारण बता दिया जाता है और यह तारीख पर तारीख का सिलसिला चलता रहता है।
बहुधा ऐसा भी होता है कि अधिवक्ता, मुवक्किल द्वारा दिये प्रलेखों में निहित तथ्य से परे, कुछ भी न्यायालय में दाखिल कर देता है जिसका वाद के निर्णय पर बड़ा असर पड़ता है और इसका परिणाम वादी/ प्रतिवादी को ही भुगतना पड़ता है, अधिवक्ता की न तो कोई जवाबदेही होती है और न ही कोई दायित्व होता है।
माननीय न्यायाधीशों के पास वाद में दाखिल प्रलेखों को पढ़ने समझने का समय ही नहीं होता है। प्रचलन इस बात का बन गया है कि प्रत्येक तारीख पर लंबे-लंबे स्पष्टीकरण, उत्तर-प्रत्युत्तर, लच्छेदार भाषा में एक ही बात की पुनरावृत्ति करते हुये दाखिल करके न्यायालय की फाइल का पेट भरो। संक्षेप में स्पष्ट बात कहने में तो अधिवक्ता की शान पर आंच आती है। ज़्यादातर वादों का निस्तारण बहस के आधार पर होता है, इस आधार पर होता है कि किसका अधिवक्ता अपनी बात कितने प्रभावी ढंग से कह पाया, वह कितना सच को झूठ और झूठ को सच बना सकता है, उसने कानून की किस धारा की विवेचना किस प्रकार से की, न कि तथ्यों की गुणवत्ता के आधार पर। इसी का लाभ उठा कर अधिवक्ता मोटी फीस वसूलते हैं, नाम और शोहरत कमाते हैं और वादी/ प्रतिवादी लुटते रहते हैं।
वास्तव में अधिकतर वाद एक लघु परियोजना होते हैं परंतु सभी वाद एक अति दीर्घकालीन परियोजना बना दिये जाते हैं।
यक्ष प्रश्न: क्या यही जन सामान्य के न्याय का मौलिक अधिकार है? क्या इसी न्याय व्यवस्था की परिकल्पना हमारे संविधान में है कि न्यायिक प्रक्रिया का आरंभ ही अन्याय से होता है। क्या वकालतनामा एक विस्तृत अनुबंध प्रलेख नहीं होना चाहिये? माननीय उच्चतम न्यायालय इस दिशा में कब कारगर कदम उठाएंगे?
कृष्ण मोहन अग्रवाल
गौड़ सिटी, गौतम बुद्ध नगर
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