गहरी चाल
मंजिल उसी को मिलती है जो चलते जाता है । थक कर बैठ जाना एक तरह का आत्मसमर्पण ही तो है । यदि विषय ज्वलंत और पिड़ादायक है तो उसके निदान के लिए प्रयास भी गम्भिर होने चाहिए । अदालतें तो हैं पर वहां गुहार लगानी ही पड़ती है तो हमें मिल कर गंभीरता के साथ इस पिटिशन के माध्यम से घोर गर्जना करना ही पड़ेगा ताकि नियामक जाग जाए और विषय की गंभीरता को समझते हुए उस पर ध्यान केंद्रित करें लेकिन इसके पहले हमें भी जागना पड़ेगा और अपने तमाम मित्रों एवं साथियों को भी जगाना पड़ेगा यह किसी एक के हित का काम नहीं है यह केवल आज का और कुछ एक के रोके गए कमिशन का ही मामला नहीं है हमें इस पिटिशन के माध्यम से नियामकों को सचेत करना पड़ेगा कि भविष्य में होने वाले तमाम सुधारों और नियम कानूनों के निर्माण में भुतकाल की परिस्थितियों और कानूनों का समुचित ख्याल रखा जाए। दोस्तों इस दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं होता दुष्यंत जी ने कहा है "कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता , जरा तबियत से कोई पत्थर उछालो तो यारों!"