क्या आप समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हैं?


क्या आप समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हैं?
The Issue
गोआ व उत्तराखंड जैसे राज्यों में लागू सभी निवासियों के लिए एक समान कानून मध्यप्रदेश में भी लागू हो ।
चैतन्य भारत मध्यप्रदेश के इस महाअभियान में लिंक पर जाकर आप sign in क्लिक करें और लिंक में सिर्फ
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भेजकर इस महा अभियान का हिस्सा बने । भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित बनाये।
भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड क्यों जरूरी है?
अलग-अलग जाति और धर्मों में शादी और तलाक को लेकर अलग-अलग नियम हैं। वहीं, लोग शादी और तलाक को लेकर पर्सलनल लॉ बोर्ड ही जाते हैं।ऐसे में इन नियमों की वजह से कानून प्रणाली भी प्रभावित होती है। यूनिफॉर्म सिविल कोड बनने के बाद इस तरह के सभी चीजें एक ही कानून के दायरे में आ जाएंगी। इस कोड के बन जाने से हिंदू कोड बिल और शरीयत कानून को सरल बनाने में मदद मिलेगी।
समान नागरिक संहिता हमारे संविधान के मूल नीति निर्धारक प्रावधानों में है, किंतु निहित स्वार्थ की वजह से पिछले 75 वर्षों में इसे राजनीतिक दलों द्वारा लागू नहीं किया गया हैl
“अगर एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून होगा तो क्या घर चल सकता है? देश दोहरी व्यवस्था से कैसे चलेगा? हमें याद रखना चाहिए भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकारों की बात कही गई है. सुप्रीम कोर्ट भी कई मौकों पर कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) लागू करने के लिए कह चुका है.”
14 जून को 22वें विधि आयोग (Law Commission) ने आम जनता और मान्यता प्राप्त धर्मिक संगठनों से UCC पर एक महीने के भीतर राय देने के लिए कहा था. अदालतें भी कई मौकों पर UCC लागू करने की सिफारिश करती रही हैं.
UCC के मसले पर देश के प्रणेताओं ने क्या कहा था. भारत का संविधान UCC के विषय में क्या कहता है, संविधान सभा पर इस मसले पर क्या बहस हुई थी और उसमें किसने क्या और कैसे कहा ?
संविधान में UCC
संविधान के भाग 4 में आर्टिकल 36 से 51 तक नीति निदेशक तत्व (Directive Principle of State Policy:DPSP) दिए गए हैं. इन्हीं नीति निदेशक तत्वों में आर्टिकल 44 यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात करता है. इसके अनुसार देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून की व्यवस्था की जानी चाहिए. यहां नीति निदेशक तत्वों के बारे में जानना जरूरी है. ये आदर्श सिद्धांत हैं. इन्हें ध्यान में रख कर सरकारों को नियम-कानून और नीतियां बनाने के निर्देश हैं. सरकार या कोई भी नागरिक इनका पालन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
इसके लिए कहा गया है अगर राज्य नीति निदेशक तत्वों का पालन करता है तो लोक कल्याण और सामाजिक सद्भाव बढ़ेगा. नीति निदेशक सिद्धांतों को कोर्ट ऑफ लॉ में “इंर्फोर्सेबल” बनाने के लिए इसके अनुच्छेदों पर अलग से कानून बनाने की आवश्यकता होती है. उसके पहले ये आर्टिकल सरकार और नागरिकों को सलाह मात्र माने जाते हैं.
संविधान सभा में UCC
संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर जोरदार बहस हुई थी. देश उस समय बंटवारे की त्रासदी से गुजर रहा था. अविश्वास और कौमी हिंसा का माहौल था. देश में समान नागरिक संहिता लागू करना एक चुनौती थी. मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग पहले ही कहते थे कि 'कांग्रेस के हिंदुओं की सरकार' मुस्लमानों को इस्लाम के हिसाब से जीने नहीं देगी. उनके लिए भारत में धर्म के आधार पर भेदभाव होगा. ऐसी स्थिति में यूनिफॉर्म सिविल कोड को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया कि कभी भविष्य में उस पर कानून बना कर लागू किया जा सकेगा. उसके बाद UCC हमेशा से सियासी बहसों और चुनावी राजनीति के केंद्र में रहा है.
23 नवंबर, 1948 को पहली बार संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसला उठा. इसे बंबई (अब मुंबई) से संविधान सभा के सदस्य कांग्रेसी मीनू मसानी ने प्रस्तावित किया. आर्टिकल 35 में UCC की बात कही गई और इस मुद्दे पर संविधान सभा में जोरदार बहस छिड़ गई. मुद्दा उठने के अगले दिन 24 नवंबर, 1948 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने संविधान सभा की इन बहसों को “a series of full-blooded speeches” (जोरदार बहसों की श्रंखला) कहकर छापा.
किसने समर्थन किया?
यूनिफॉर्म सिविल कोड को सबसे पहले महिला सदस्यों से समर्थन मिला. संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थीं. इनमें हंसा मेहता शामिल थीं. उन्होंने मौलिक आधिकार उप-समिति के सदस्य के तौर पर UCC की पैरवी की. उनके अलावा राजकुमारी अमृतकौर, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मीनू मसानी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का मुखर समर्थन किया और इसके पक्ष में जोरदार बहस की. जवाहरलाल नेहरू समेत लगभग पूरी कांग्रेस भी UCC लागू किए जाने के समर्थन में थी. हालांकि आज कांग्रेस इसके विरोध में तर्क दे रही है.
किसने किया विरोध?
संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध सबसे पहले मद्रास के सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने किया. वो पांच मुस्लिम सदस्यों (मोहम्मद इस्माइल, नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग, बी पोकर साहब, अहमद इब्राहिम) के समूह में शामिल थे जो UCC के खिलाफ संशोधन लेकर आए थे. इसके अलावा 'इन्किलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले उर्दू शायर मौलाना हसरत मोहानी ने भी बहस में हिस्सा लिया था. उन्होंने भी UCC का विरोध किया था.
विरोध करने वाले ज्यादातर लोग ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) के सदस्य थे. इस समूह का तर्क था कि समान नागरिक संहिता लागू करना अन्यायपूर्ण होगा. सरकार को किसी समुदाय के नागरिक कानूनों (Personal Laws) में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. उनका कहना था कि भारत विविधताओं से भरा देश है. अंग्रेजों ने भी यहां की जनता के धार्मिक कानूनों को नहीं छुआ तो फिर आजाद भारत की सरकार ऐसा क्यों करना चाहती है.
मोहम्मद इस्माइल ने अपनी बहस में यूरोपीय देशों और उनके कानूनों के उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा के प्रावधान हैं. उनका कहना था कि उन्होंने जो संशोधन पेश किया है वह सिर्फ अल्पसंख्यकों के हितों के लिए नहीं, बल्कि बहुसंख्यकों के हितों के लिए भी है, क्योंकि संशोधन में “किसी समूह, वर्ग और समुदाय” की बात कही गई है. इस संशोधन से सभी के धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों के हितों की रक्षा हो सकेगी.
दूसरा संशोधन पश्चिम बंगाल के सदस्य नज़ीरुद्दीन अहमद ने पेश किया. उनका सुझाव था कि संघ (केंद्र सरकार) को उस धार्मिक समूहों की स्वीकृति लेनी चाहिए जिसके सामुदायिक कानून नए कानूनों से प्रभावित होंगे. उन्होंने बहस ये कहते हुए खत्म की,
“अभी सही समय नहीं है. इन मामलों में समय के साथ धीरे-धीरे हस्तक्षेप होना चाहिए. मुझे इस बात का कोई संदेह नहीं है कि एक समय ऐसा आएगा जब देश में समान नागरिक कानून होंगे.”
महबूब बेग के संशोधन में ये सुनिश्चित करने को कहा कि अनुच्छेद 35 के चलते नागरिकों के सामुदायिक कानून प्रभावित नहीं होने चाहिए. उन्होंने कहा,
"जहां तक मैं समझता हूं, सिविल कोड संपत्ति के कानून, संपत्ति के हस्तांतरण का कानून, अनुबंध और साक्ष्यों के कानून आदि से ही संबंधित होगा. किसी धार्मिक समुदाय के निजी धार्मिक कानून आर्टिकल 35 में नहीं आएंगे.”
उन्होंने आगे कहा,
“सिविल कोड पर स्थिति स्पष्ठ करने के लिए ही मैंने संशोधन का नोटिस दिया है. अब इस आर्टिकल (article 35) को बनाने वाले इसका अर्थ स्पष्ठ करें. ये लोग बहुत ज़रूरी तथ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. पर्सनल लॉ कुछ धार्मिक समूहों के लिए दिल के बहुत करीब है. जहां तक मुसलमानों का सवाल है, उनके अपने इस्लाम आधारित उत्तराधिकार, विरासत, विवाह और तलाक के कानून हैं.”
UCC के समर्थन में तर्क
यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में सबसे जोरदार बहस डॉ भीमराव अंबेडकर, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (केएम मुंशी) की तरफ से की गई.
केएम मुंशी ने तर्क दिया,
“यूनिफॉर्म सिविल कोड देश की एकता को कायम रखने और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए जरूरी है. अभी तक की बहस मुसलमानों की भावना को केंद्र में रख कर हुई है, पर हिंदू भी समान नागरिक संहिता से असुरक्षित हैं. मैं इस संविधान सभा के सदस्यों से पूछता हूं कि हिंदू समाज में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड के बिना सुधार कैसे संभव होगा, खास तौर पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हुए मसलों में इसकी जरूरत है."
केएम मुंशी ने मुस्लिम सदस्यों से सवाल किया,
"विरासत, विवाह आदि का पर्सनल लॉ से भला क्या लेना देना है. इस कानून से जितना मुस्लिम प्रभावित होंगे उतना ही ये हिंदुओं को भी प्रभावित करेगा. ये प्रावधान मौलिक अधिकारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि ये संविधान में प्रस्तावित मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है, खास तौर पर इससे लैंगिक समानता आएगी."
केएम मुंशी ने बहस में भारत में मुस्लिम सल्तनत की नींव रखने वाले अलाउद्दीन खिलजी का उदाहरण देते हुए कहा
“खिलजी ने भी शरीयत के खिलाफ कई परिवर्तन किए थे. और जब दिल्ली के काजी-मौलवी शरीयत का खुला उल्लंघन करने के लिए उससे नाराज़ हुए तब उसने सीधा जवाब दिया था कि उसने देश की भलाई के लिए ऐसा किया है और सर्वशक्तिमान अल्लाह उसे माफ करेगा.”
वहीं अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में बहस करते हुए मुस्लिम सदस्यों के तर्कों का जवाब दिया,
“मुस्लिम सदस्य कहते हैं कि समान नागरिक संहिता मुसलमान नागरिकों के बीच अविश्वास और कटुता लाएगी. मैं कहता हूं इसके विपरीत होगा. समान नागरिक संहिता समुदायों के बीच एकता का कारण बन सकती है."
कृष्णास्वामी अय्यर ने मुसलमान सदस्यों से सवाल किया
उस समय क्यों कोई विरोध नहीं किया गया जब अंग्रेजों ने उनके धार्मिक मान्याताओं में हस्तक्षेप करते हुए यूनिफॉर्म क्रिमिनल कोड बनाया था. उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए या फिर हमेशा ही प्रतिस्पर्धा करने वाले समुदायों में ही बंटे रहने देना चाहिए.
इनके अलावा संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर ने इस बहस के निष्कर्ष पर बोलते हुए 2 दिसंबर 1948 को कहा,
"इसमें कोई नई बात नहीं है. देश में विवाह, विरासत आदि मसलों को छोड़ कर पहले ही कई समान नागरिक संहिताएं हैं."
आंबेडकर ने तर्क दिया कि मुसलमानों में शरीयत का पालन पूरे देश में एक जैसा नहीं है. उन्होंने नार्थ-वेस्ट फ्रांटियर प्रोविंस का उदाहरण देते हुए कहा कि इस इलाके में उत्तराधिकार के मामले में हिंदू कानूनों का पालन 1939 तक किया जाता रहा. उसके बाद वहां के विधान मंडल ने कानून बना कर मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में शरीयत को अनिवार्य कर दिया. उत्तराधिकार के मामले में यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश), सेंट्रल प्रोविंस (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) और बॉम्बे (मुंबई) में मुस्लिम कहीं हद तक हिंदू कानूनों से ही संचालित होते हैं.
आंबेडकर ने मुसलमान सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा,
"मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि धर्म कैसे इतनी जगह घेर सकता है कि सारा जीवन ही ढंक ले और विधायी नियमों को धरातल पर उतरने से रोके. आखिर हमें ये आजादी किस लिए मिली है? हमें ये आजादी हमारी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली है."
उन्होंने बहस समाप्त करते हुए निष्कर्ष में कहा
“यूनिफॉर्म सिविल कोड वैकल्पिक व्यवस्था है. ये अपने चरित्र के आधार पर नीति निदेशक सिद्धांत होगा. राज्य जब उचित समझें तब इसे लागू कर सकता है. शुरुआती संशोधनों का जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा कि भविष्य में समुदायों की सहमति के आधार पर ही इस प्रावधान पर कानून बनाए जा सकते हैं और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू किया जा सकता है.”
आंबेडकर का भाषण इस बहस पर आखिरी भाषण था. इसके बाद आर्टिकल 35 का ड्राफ्ट संविधान सभा में वोटिंग के लिए रखा गया. वोटिंग के बाद आर्टिकल 35 को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया और इसकी संख्या बदल कर आर्टिकल 44 कर दी गई.
संविधान सभा की कार्यवाही पढ़ते हुए साफ लगता है कि उस समय संविधान निर्माताओं की मंशा इस यूनिफॉर्म सिविल कोड को मौलिक अधिकारों में रखने की थी, न कि नीति निदेशक सिद्धांतों में जगह देने की. विरोध करने वालों और समर्थन करने वालों के बीच समझौते के चलते यूनिफॉर्म सिविल कोड नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा बन कर रह गया.
हम मध्य प्रदेश के माननीय राज्यपाल,मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश विधानसभा से निवेदन करते हैं कि वह अतिश्चित्र प्रदेश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए उचित कदम उठाए !

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भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड क्यों जरूरी है?
अलग-अलग जाति और धर्मों में शादी और तलाक को लेकर अलग-अलग नियम हैं। वहीं, लोग शादी और तलाक को लेकर पर्सलनल लॉ बोर्ड ही जाते हैं।ऐसे में इन नियमों की वजह से कानून प्रणाली भी प्रभावित होती है। यूनिफॉर्म सिविल कोड बनने के बाद इस तरह के सभी चीजें एक ही कानून के दायरे में आ जाएंगी। इस कोड के बन जाने से हिंदू कोड बिल और शरीयत कानून को सरल बनाने में मदद मिलेगी।
समान नागरिक संहिता हमारे संविधान के मूल नीति निर्धारक प्रावधानों में है, किंतु निहित स्वार्थ की वजह से पिछले 75 वर्षों में इसे राजनीतिक दलों द्वारा लागू नहीं किया गया हैl
“अगर एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून होगा तो क्या घर चल सकता है? देश दोहरी व्यवस्था से कैसे चलेगा? हमें याद रखना चाहिए भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकारों की बात कही गई है. सुप्रीम कोर्ट भी कई मौकों पर कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) लागू करने के लिए कह चुका है.”
14 जून को 22वें विधि आयोग (Law Commission) ने आम जनता और मान्यता प्राप्त धर्मिक संगठनों से UCC पर एक महीने के भीतर राय देने के लिए कहा था. अदालतें भी कई मौकों पर UCC लागू करने की सिफारिश करती रही हैं.
UCC के मसले पर देश के प्रणेताओं ने क्या कहा था. भारत का संविधान UCC के विषय में क्या कहता है, संविधान सभा पर इस मसले पर क्या बहस हुई थी और उसमें किसने क्या और कैसे कहा ?
संविधान में UCC
संविधान के भाग 4 में आर्टिकल 36 से 51 तक नीति निदेशक तत्व (Directive Principle of State Policy:DPSP) दिए गए हैं. इन्हीं नीति निदेशक तत्वों में आर्टिकल 44 यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात करता है. इसके अनुसार देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून की व्यवस्था की जानी चाहिए. यहां नीति निदेशक तत्वों के बारे में जानना जरूरी है. ये आदर्श सिद्धांत हैं. इन्हें ध्यान में रख कर सरकारों को नियम-कानून और नीतियां बनाने के निर्देश हैं. सरकार या कोई भी नागरिक इनका पालन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
इसके लिए कहा गया है अगर राज्य नीति निदेशक तत्वों का पालन करता है तो लोक कल्याण और सामाजिक सद्भाव बढ़ेगा. नीति निदेशक सिद्धांतों को कोर्ट ऑफ लॉ में “इंर्फोर्सेबल” बनाने के लिए इसके अनुच्छेदों पर अलग से कानून बनाने की आवश्यकता होती है. उसके पहले ये आर्टिकल सरकार और नागरिकों को सलाह मात्र माने जाते हैं.
संविधान सभा में UCC
संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर जोरदार बहस हुई थी. देश उस समय बंटवारे की त्रासदी से गुजर रहा था. अविश्वास और कौमी हिंसा का माहौल था. देश में समान नागरिक संहिता लागू करना एक चुनौती थी. मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग पहले ही कहते थे कि 'कांग्रेस के हिंदुओं की सरकार' मुस्लमानों को इस्लाम के हिसाब से जीने नहीं देगी. उनके लिए भारत में धर्म के आधार पर भेदभाव होगा. ऐसी स्थिति में यूनिफॉर्म सिविल कोड को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया कि कभी भविष्य में उस पर कानून बना कर लागू किया जा सकेगा. उसके बाद UCC हमेशा से सियासी बहसों और चुनावी राजनीति के केंद्र में रहा है.
23 नवंबर, 1948 को पहली बार संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसला उठा. इसे बंबई (अब मुंबई) से संविधान सभा के सदस्य कांग्रेसी मीनू मसानी ने प्रस्तावित किया. आर्टिकल 35 में UCC की बात कही गई और इस मुद्दे पर संविधान सभा में जोरदार बहस छिड़ गई. मुद्दा उठने के अगले दिन 24 नवंबर, 1948 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने संविधान सभा की इन बहसों को “a series of full-blooded speeches” (जोरदार बहसों की श्रंखला) कहकर छापा.
किसने समर्थन किया?
यूनिफॉर्म सिविल कोड को सबसे पहले महिला सदस्यों से समर्थन मिला. संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थीं. इनमें हंसा मेहता शामिल थीं. उन्होंने मौलिक आधिकार उप-समिति के सदस्य के तौर पर UCC की पैरवी की. उनके अलावा राजकुमारी अमृतकौर, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मीनू मसानी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का मुखर समर्थन किया और इसके पक्ष में जोरदार बहस की. जवाहरलाल नेहरू समेत लगभग पूरी कांग्रेस भी UCC लागू किए जाने के समर्थन में थी. हालांकि आज कांग्रेस इसके विरोध में तर्क दे रही है.
किसने किया विरोध?
संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध सबसे पहले मद्रास के सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने किया. वो पांच मुस्लिम सदस्यों (मोहम्मद इस्माइल, नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग, बी पोकर साहब, अहमद इब्राहिम) के समूह में शामिल थे जो UCC के खिलाफ संशोधन लेकर आए थे. इसके अलावा 'इन्किलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले उर्दू शायर मौलाना हसरत मोहानी ने भी बहस में हिस्सा लिया था. उन्होंने भी UCC का विरोध किया था.
विरोध करने वाले ज्यादातर लोग ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) के सदस्य थे. इस समूह का तर्क था कि समान नागरिक संहिता लागू करना अन्यायपूर्ण होगा. सरकार को किसी समुदाय के नागरिक कानूनों (Personal Laws) में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. उनका कहना था कि भारत विविधताओं से भरा देश है. अंग्रेजों ने भी यहां की जनता के धार्मिक कानूनों को नहीं छुआ तो फिर आजाद भारत की सरकार ऐसा क्यों करना चाहती है.
मोहम्मद इस्माइल ने अपनी बहस में यूरोपीय देशों और उनके कानूनों के उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा के प्रावधान हैं. उनका कहना था कि उन्होंने जो संशोधन पेश किया है वह सिर्फ अल्पसंख्यकों के हितों के लिए नहीं, बल्कि बहुसंख्यकों के हितों के लिए भी है, क्योंकि संशोधन में “किसी समूह, वर्ग और समुदाय” की बात कही गई है. इस संशोधन से सभी के धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों के हितों की रक्षा हो सकेगी.
दूसरा संशोधन पश्चिम बंगाल के सदस्य नज़ीरुद्दीन अहमद ने पेश किया. उनका सुझाव था कि संघ (केंद्र सरकार) को उस धार्मिक समूहों की स्वीकृति लेनी चाहिए जिसके सामुदायिक कानून नए कानूनों से प्रभावित होंगे. उन्होंने बहस ये कहते हुए खत्म की,
“अभी सही समय नहीं है. इन मामलों में समय के साथ धीरे-धीरे हस्तक्षेप होना चाहिए. मुझे इस बात का कोई संदेह नहीं है कि एक समय ऐसा आएगा जब देश में समान नागरिक कानून होंगे.”
महबूब बेग के संशोधन में ये सुनिश्चित करने को कहा कि अनुच्छेद 35 के चलते नागरिकों के सामुदायिक कानून प्रभावित नहीं होने चाहिए. उन्होंने कहा,
"जहां तक मैं समझता हूं, सिविल कोड संपत्ति के कानून, संपत्ति के हस्तांतरण का कानून, अनुबंध और साक्ष्यों के कानून आदि से ही संबंधित होगा. किसी धार्मिक समुदाय के निजी धार्मिक कानून आर्टिकल 35 में नहीं आएंगे.”
उन्होंने आगे कहा,
“सिविल कोड पर स्थिति स्पष्ठ करने के लिए ही मैंने संशोधन का नोटिस दिया है. अब इस आर्टिकल (article 35) को बनाने वाले इसका अर्थ स्पष्ठ करें. ये लोग बहुत ज़रूरी तथ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. पर्सनल लॉ कुछ धार्मिक समूहों के लिए दिल के बहुत करीब है. जहां तक मुसलमानों का सवाल है, उनके अपने इस्लाम आधारित उत्तराधिकार, विरासत, विवाह और तलाक के कानून हैं.”
UCC के समर्थन में तर्क
यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में सबसे जोरदार बहस डॉ भीमराव अंबेडकर, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (केएम मुंशी) की तरफ से की गई.
केएम मुंशी ने तर्क दिया,
“यूनिफॉर्म सिविल कोड देश की एकता को कायम रखने और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने के लिए जरूरी है. अभी तक की बहस मुसलमानों की भावना को केंद्र में रख कर हुई है, पर हिंदू भी समान नागरिक संहिता से असुरक्षित हैं. मैं इस संविधान सभा के सदस्यों से पूछता हूं कि हिंदू समाज में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड के बिना सुधार कैसे संभव होगा, खास तौर पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हुए मसलों में इसकी जरूरत है."
केएम मुंशी ने मुस्लिम सदस्यों से सवाल किया,
"विरासत, विवाह आदि का पर्सनल लॉ से भला क्या लेना देना है. इस कानून से जितना मुस्लिम प्रभावित होंगे उतना ही ये हिंदुओं को भी प्रभावित करेगा. ये प्रावधान मौलिक अधिकारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि ये संविधान में प्रस्तावित मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है, खास तौर पर इससे लैंगिक समानता आएगी."
केएम मुंशी ने बहस में भारत में मुस्लिम सल्तनत की नींव रखने वाले अलाउद्दीन खिलजी का उदाहरण देते हुए कहा
“खिलजी ने भी शरीयत के खिलाफ कई परिवर्तन किए थे. और जब दिल्ली के काजी-मौलवी शरीयत का खुला उल्लंघन करने के लिए उससे नाराज़ हुए तब उसने सीधा जवाब दिया था कि उसने देश की भलाई के लिए ऐसा किया है और सर्वशक्तिमान अल्लाह उसे माफ करेगा.”
वहीं अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में बहस करते हुए मुस्लिम सदस्यों के तर्कों का जवाब दिया,
“मुस्लिम सदस्य कहते हैं कि समान नागरिक संहिता मुसलमान नागरिकों के बीच अविश्वास और कटुता लाएगी. मैं कहता हूं इसके विपरीत होगा. समान नागरिक संहिता समुदायों के बीच एकता का कारण बन सकती है."
कृष्णास्वामी अय्यर ने मुसलमान सदस्यों से सवाल किया
उस समय क्यों कोई विरोध नहीं किया गया जब अंग्रेजों ने उनके धार्मिक मान्याताओं में हस्तक्षेप करते हुए यूनिफॉर्म क्रिमिनल कोड बनाया था. उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए या फिर हमेशा ही प्रतिस्पर्धा करने वाले समुदायों में ही बंटे रहने देना चाहिए.
इनके अलावा संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर ने इस बहस के निष्कर्ष पर बोलते हुए 2 दिसंबर 1948 को कहा,
"इसमें कोई नई बात नहीं है. देश में विवाह, विरासत आदि मसलों को छोड़ कर पहले ही कई समान नागरिक संहिताएं हैं."
आंबेडकर ने तर्क दिया कि मुसलमानों में शरीयत का पालन पूरे देश में एक जैसा नहीं है. उन्होंने नार्थ-वेस्ट फ्रांटियर प्रोविंस का उदाहरण देते हुए कहा कि इस इलाके में उत्तराधिकार के मामले में हिंदू कानूनों का पालन 1939 तक किया जाता रहा. उसके बाद वहां के विधान मंडल ने कानून बना कर मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में शरीयत को अनिवार्य कर दिया. उत्तराधिकार के मामले में यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश), सेंट्रल प्रोविंस (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) और बॉम्बे (मुंबई) में मुस्लिम कहीं हद तक हिंदू कानूनों से ही संचालित होते हैं.
आंबेडकर ने मुसलमान सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा,
"मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि धर्म कैसे इतनी जगह घेर सकता है कि सारा जीवन ही ढंक ले और विधायी नियमों को धरातल पर उतरने से रोके. आखिर हमें ये आजादी किस लिए मिली है? हमें ये आजादी हमारी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली है."
उन्होंने बहस समाप्त करते हुए निष्कर्ष में कहा
“यूनिफॉर्म सिविल कोड वैकल्पिक व्यवस्था है. ये अपने चरित्र के आधार पर नीति निदेशक सिद्धांत होगा. राज्य जब उचित समझें तब इसे लागू कर सकता है. शुरुआती संशोधनों का जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा कि भविष्य में समुदायों की सहमति के आधार पर ही इस प्रावधान पर कानून बनाए जा सकते हैं और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू किया जा सकता है.”
आंबेडकर का भाषण इस बहस पर आखिरी भाषण था. इसके बाद आर्टिकल 35 का ड्राफ्ट संविधान सभा में वोटिंग के लिए रखा गया. वोटिंग के बाद आर्टिकल 35 को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया और इसकी संख्या बदल कर आर्टिकल 44 कर दी गई.
संविधान सभा की कार्यवाही पढ़ते हुए साफ लगता है कि उस समय संविधान निर्माताओं की मंशा इस यूनिफॉर्म सिविल कोड को मौलिक अधिकारों में रखने की थी, न कि नीति निदेशक सिद्धांतों में जगह देने की. विरोध करने वालों और समर्थन करने वालों के बीच समझौते के चलते यूनिफॉर्म सिविल कोड नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा बन कर रह गया.
हम मध्य प्रदेश के माननीय राज्यपाल,मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश विधानसभा से निवेदन करते हैं कि वह अतिश्चित्र प्रदेश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए उचित कदम उठाए !

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Petition created on 2 April 2024