एग्रो पोंटिनो, इटली में भारतीयों को गुलामाी के लिए मजबूर करना बंद करें

समस्या

अभी-अभी मैंने इटली के एग्रो पोंटिनो क्षेत्र में भारतीयों, विशेषकर सिखों के साथ हो रहे शोषण के बारे में एक खबर पढ़ी।

सिंह कहते हैं, "मैं बिना किसी छुट्टी के, बिना किसी आराम के, संडे को भी दिन में 12-13 घंटे काम कर रहा था।” खेत के मालिक ने उन्हें एक महीने में 100 से 150 यूरो ($120 से $175) दिए, जो कि 50 सेंट प्रति घंटे से भी कम है। जबकि खेतिहर मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी 10 यूरो प्रति घंटा है।

वहाँ काम करने की स्थिति बिल्कुल अमानवीय है और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी जाती है। वो याद करते हैं, "जब मुझे मेरी मदद करने के लिए तैयार एक वकील मिला, (मालिक) ने मुझे धमकाया...'मैं तुम्हें मार दूंगा, एक गड्ढा खोदकर, उसमें तुम्हें फेंक दूंगा, और गड्ढे को वापिस भर दूँगा’... उसके पास एक बंदूक भी थी, मैंने अपनी आँखों से देखा”।

हैरानी की बात यह है कि इस क्षेत्र से मोज़ेरेला चीज़ का उत्पादन किया जाता है जो लगभग €15/ किलोग्राम तक बेचा जाता है और कृषि माफिया इन मज़दूरों की कड़ी मेहनत के बदले में और अधिक लाभ कमाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी ने 2018 में अनुमान लगाया था कि इटली में 400,000 से अधिक खेतिहर मज़दूरों पर शोषण का ख़तरा है और लगभग 100,000 को "अमानवीय परिस्थितियों" का सामना करना पड़ सकता है।

पिछले महीने, माली से आने वाले एक 27 साल के मज़दूर ने दक्षिण-पूर्व के अपूलिया इलाके में खेतों में पूरा दिन, 40 डिग्री की गर्मी में काम करने के बाद दम तोड़ दिया।

खेतिहर मज़दूरों के शोषण की समस्या पर संसद का भी ध्यान गया है। 2016 में पारित एक कैपोरली विरोधी कानून के तहत ही सिंह के नियोक्ता पर मुकदमा चलाया गया था।
 
लेकिन यूनियनों का कहना है कि कानून को ठीक से लागू करने के लिए अभी भी बहुत कम जाँच होती है, और जाँच करने के लिए श्रम निरीक्षक भी बेहद कम संख्या में हैं। यूरिस्पेज़ थिंक टैंक के साथ काम करने वाले सोशियोलॉजिस्ट ओमिज़ोलो ने लाटीना क्षेत्र में खेतिहर मज़दूरी के दुरुपयोग के मुद्दे पर कई सालों तक रिसर्च की- कुछ तो अंडरकवर रहकर की।

एक दूसरे देश में इतने सारे भारतीयों का शोषण हो रहा है और उस शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए कोई नहीं है। विरोध करने वाले भी छिपने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। बहुत सारी जिंदगियाँ दांव पर हैं। भारत के आम नागरिकों को अब बोलना होगा, अपनी आवाज़ उठानी होगी।

मेरी पेटिशन साइन करें ताकि इटली में कानूनी रूप से स्वीकृत कामकाजी परिस्थितियों को लागू किया जाए और भारतीय मज़दूरों का शोषण बंद हो।

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Nishchay Agarwalपेटीशन स्टार्टर
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समस्या

अभी-अभी मैंने इटली के एग्रो पोंटिनो क्षेत्र में भारतीयों, विशेषकर सिखों के साथ हो रहे शोषण के बारे में एक खबर पढ़ी।

सिंह कहते हैं, "मैं बिना किसी छुट्टी के, बिना किसी आराम के, संडे को भी दिन में 12-13 घंटे काम कर रहा था।” खेत के मालिक ने उन्हें एक महीने में 100 से 150 यूरो ($120 से $175) दिए, जो कि 50 सेंट प्रति घंटे से भी कम है। जबकि खेतिहर मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी 10 यूरो प्रति घंटा है।

वहाँ काम करने की स्थिति बिल्कुल अमानवीय है और उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी जाती है। वो याद करते हैं, "जब मुझे मेरी मदद करने के लिए तैयार एक वकील मिला, (मालिक) ने मुझे धमकाया...'मैं तुम्हें मार दूंगा, एक गड्ढा खोदकर, उसमें तुम्हें फेंक दूंगा, और गड्ढे को वापिस भर दूँगा’... उसके पास एक बंदूक भी थी, मैंने अपनी आँखों से देखा”।

हैरानी की बात यह है कि इस क्षेत्र से मोज़ेरेला चीज़ का उत्पादन किया जाता है जो लगभग €15/ किलोग्राम तक बेचा जाता है और कृषि माफिया इन मज़दूरों की कड़ी मेहनत के बदले में और अधिक लाभ कमाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी ने 2018 में अनुमान लगाया था कि इटली में 400,000 से अधिक खेतिहर मज़दूरों पर शोषण का ख़तरा है और लगभग 100,000 को "अमानवीय परिस्थितियों" का सामना करना पड़ सकता है।

पिछले महीने, माली से आने वाले एक 27 साल के मज़दूर ने दक्षिण-पूर्व के अपूलिया इलाके में खेतों में पूरा दिन, 40 डिग्री की गर्मी में काम करने के बाद दम तोड़ दिया।

खेतिहर मज़दूरों के शोषण की समस्या पर संसद का भी ध्यान गया है। 2016 में पारित एक कैपोरली विरोधी कानून के तहत ही सिंह के नियोक्ता पर मुकदमा चलाया गया था।
 
लेकिन यूनियनों का कहना है कि कानून को ठीक से लागू करने के लिए अभी भी बहुत कम जाँच होती है, और जाँच करने के लिए श्रम निरीक्षक भी बेहद कम संख्या में हैं। यूरिस्पेज़ थिंक टैंक के साथ काम करने वाले सोशियोलॉजिस्ट ओमिज़ोलो ने लाटीना क्षेत्र में खेतिहर मज़दूरी के दुरुपयोग के मुद्दे पर कई सालों तक रिसर्च की- कुछ तो अंडरकवर रहकर की।

एक दूसरे देश में इतने सारे भारतीयों का शोषण हो रहा है और उस शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए कोई नहीं है। विरोध करने वाले भी छिपने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। बहुत सारी जिंदगियाँ दांव पर हैं। भारत के आम नागरिकों को अब बोलना होगा, अपनी आवाज़ उठानी होगी।

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Nishchay Agarwalपेटीशन स्टार्टर

फैसला लेने वाले

Ministry of external affairs, India
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