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सरकारें उठाएँ प्रधान-पति व्यवस्था के खिलाफ ठोस कदम, पूर्ण रूप से हो बहिष्कार

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“प्रधान गाँव का मुखिया होता है, वो गाँव में विकास कार्यों का नेतृत्व करता है, वो गाँव के लोगों की समस्या सुनता है, समस्या का समाधान करता है…”

उपरोक्त वाक्यों को पढ़कर आपको लगेगा कि इसमें गलत क्या है, ऐसे देखा जाए तो कुछ गलत है भी नहीं। पर ये सबकुछ बदल जाता है जब उस गाँव की प्रधान एक महिला हो।

‘प्रधान-पति’ एक ऐसी व्यवस्था है, जहाँ गाँव की प्रधान तो महिला होती है पर सारे फैसले उसके पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों द्वारा लिए जाते हैं।

मैं उस व्यवस्था की बात कर रही हूँ जहाँ सीट तो महिला के नाम पर आरक्षित होती है, चुनाव भी महिला के नाम पर लड़ा जाता है और वो प्रधान बन भी जाती है। मगर सिर्फ कागज़ पर और कभी-कभी तो वो कागज़ पर भी प्रधान नहीं रहती।

मैं इस प्रधान-पति व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठा रही हूँ, मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि सरकारें इसके खिलाफ ठोस कदम उठाएं।

उत्तर प्रदेश में यूनीसेफ ने दस ज़िलों की एक फील्ड मॉनिटरिंग रिपोर्ट बनाई। जिसमें 10 महिला प्रधानों से बातचीत में सामने आया कि इन 10 में से 7 महिला प्रधानों को 73वें संविधान संशोधन के बारे में ही नहीं पता। 10 में से केवल 2 महिला प्रधानों को प्रधान की ताकत, उसकी ज़िम्मेदारियों के बारे में पता था।

मध्यप्रदेश का उदाहरण लीजिए, प्रधान बनने के बाद महज़ 5% महिलाएं ही बिना पति या घर के पुरुषों के दखल के, अपने दम पर गाँवों और नगरों को चला रही हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रधान का सारा काम उनके पति देखते हैं, बैठकों से लेकर जिला कार्यालय तक, हर जगह पति ही फाइल लेकर जाते हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तो बस उदाहरण हैं, हिंदीभाषी ज्यादातर प्रदेशों में ‘प्रधान-पति’ व्यवस्था फलफूल रही है और महिलाओं के सशक्तिकरण के रास्ते का रोड़ा बन गई है।

1993 में 73वें संविधान संशोधन के द्वारा देश की महिलाओं को ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों में 33 फीसदी आरक्षण दिया गया। बाद में कुछ राज्यों जैसे बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, इत्यादि में महिलाओं के लिए यह आरक्षण 50 फीसदी किया गया।

महिलाओं को 33% और 50% आरक्षण के ये आंकड़े सुनने में काफी अच्छे लगते हैं, इनको देने का मकसद भी अच्छा था पर ज़मीनी पर आते-आते ये आंकड़े 33 से 3% और 50 से 5% हो जाते हैं।

प्रधान-पति व्यवस्था ना केवल शर्मनाक है बल्कि ये हमारे देश के संविधान का भी अपमान करती है। पूरी तरह से गैर-कानूनी होने के बावजूद, ये व्यवस्था गाँवों और छोटे शहरों में धडल्ले से चलती है।

सरकारों ने इस समस्या पर काम करने की कोशिश की है पर सफलता नहीं मिल सकी और इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है नौकरशाही का इस व्यवस्था के प्रति नर्म रवैया। अगर गाँवों और ज़िलों के सरकारी कर्मचारी- पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी, इत्यादि इसका पूरी तरह बहिष्कार करें तो इस समस्या को सुलझाया जा सकता है।

इसलिए मैंने ये पेटीशन शुरू की है ताकि संविधान ने जो अधिकार महिलाओं को दिए हैं, वो कागज़ से निकलकर ज़मीन पर भी आएं। मेरी मांग है कि सरकारें :

1. नौकरशाही को प्रधान-पति व्यवस्था का पूर्ण रूप से बहिष्कार करने का आदेश जारी करें।
2. महिला प्रधान के पति या उसकी जगह काम करने वाले को ‘प्रधान’ या ‘मुखिया’ से संबोधित करना तुरंत बंद हो।
3. सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से लोगों को इस व्यवस्था के बारे में अवगत कराएं और इसके प्रति जागरुकता फैलाएं

मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि भारत की महिलाएं, पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मेरी पेटीशन को शेयर करें ताकि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो।

आइये मेरा साथ दीजिए और हम मिलकर ‘प्रधान-पति’ व्यवस्था के खिलाफ हल्ला बोलें।

चित्र- गाँव कनेक्शन