Immediate Action against SC Order Regarding Dogs Removal from Government Bodies

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The Issue

हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश में यह निर्देश दिया गया है कि सरकारी संस्थान, स्कूल, कॉलेज, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन आदि सार्वजनिक स्थलों से लावारिस जानवरों (विशेषकर कुत्तों) को उठाकर शेल्टर में डाल दिया जाए।

हम, इस निर्णय का विरोध करते हुए आपसे निवेदन करते हैं कि इस विषय में जिला प्रशासन के स्तर पर मानवीय, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण से पुनर्विचार हेतु अनुशंसा की जाए।

मानव–पशु सहअस्तित्व की परंपरा

काफी समय से मनुष्य और जानवर इस धरती पर सह-अस्तित्व में रह रहे हैं।

हमारे पूर्वजों ने हमेशा प्रकृति और पशुओं के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जिया है।

लेकिन आज की पीढ़ी की नासमझी और स्वार्थ के कारण मानव और पशु के बीच द्वंद बढ़ने लगा है।

वास्तव में, इंसानों को चाहिए कि वे जानवरों को भी सम्मान दें और उनसे सह-अस्तित्व का पाठ सीखें।

यह धरती केवल मनुष्यों की नहीं, बल्कि सभी जीवों का समान अधिकार है।

किसी एक की सुरक्षा के नाम पर दूसरे को कैद कर देना क्रूरता और अन्याय है।

हमारे तर्क और वैज्ञानिक आधार

1. पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर:

आवारा कुत्ते फूड चेन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे गली-मोहल्लों में पड़े खाद्य अवशेषों, कचरे व मरे हुए जीवों को खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी का कार्य करते हैं।

इनके न होने से सड़कों पर कचरा सड़ने, चूहों की आबादी बढ़ने, और संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ेगा।

2. फूड चेन (Food Chain) का असंतुलन:

कुत्ते छोटे जानवरों जैसे चूहे, बिल्ली, छिपकली, साँप आदि की संख्या नियंत्रित रखते हैं।

अगर कुत्तों को हटाया गया, तो ये जीव अत्यधिक बढ़ेंगे जिससे फसल नुकसान, बीमारियाँ (जैसे प्लेग, लेप्टोस्पायरोसिस) और मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा।

3. वायुमंडलीय और पर्यावरणीय प्रभाव:

पशु मृत देह को ये जानवर प्राकृतिक रूप से साफ करते हैं।

इनके न होने से सड़ांध, मच्छरों-मक्खियों की वृद्धि, और गैस उत्सर्जन (Methane, Ammonia) बढ़ेगा जिससे वायु प्रदूषण बढ़ेगा।

4. मानव सुरक्षा की दृष्टि से वास्तविक आंकड़े:

हर वर्ष जितने रेबीज़ के मामले दर्ज होते हैं, उनमें से अधिकांश “कुत्तों द्वारा काटे जाने” के नाम पर दर्ज किए जाते हैं, जबकि यह तथ्यात्मक रूप से अधूरा होता है।

बंदर, बिल्ली, चूहा या अन्य जानवर काटें तो भी सभी को रेबीज़ केस के रूप में दर्ज किया जाता है।

इससे यह आंकड़े कृत्रिम रूप से बढ़ जाते हैं जबकि वास्तविक पशु आक्रमण के मामले अत्यंत कम हैं।

5. सरकारी डेटा का भ्रामक उपयोग:

जब किसी व्यक्ति को कुत्ता काटता है, तो एक ही व्यक्ति के लिए 5 इंजेक्शन लगते हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे 5 केस के रूप में दर्ज किया जाता है।

इस तरह पशुओं के खिलाफ झूठी छवि बनती है।

6. मानव अपराधों से तुलना – असली खतरा कौन?

हमारे देश में नाबालिक बच्चों के साथ होने वाले अपराध — जैसे बलात्कार, अपहरण, भीख मंगवाना — ये सब इंसानों द्वारा इंसानों पर किए जाते हैं।

इनके मुकाबले जानवरों द्वारा होने वाली घटनाओं की संख्या नगण्य है।

यदि कानून सबके लिए समान है, तो फिर इस तर्क के अनुसार क्या हर अपराधी इंसान को भी “सुरक्षा के लिए कैद” कर देना चाहिए?

यदि यह इंसानों पर लागू नहीं होता, तो फिर जानवरों पर क्यों?

अतः इस आदेश का औचित्य न केवल नैतिक दृष्टि से बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी संदिग्ध है।

7. संवैधानिक और नैतिक दृष्टिकोण:

संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के अंतर्गत हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह “प्रकृति, वन्यजीवों और सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखे।”

भारतीय दंड संहिता की धारा 428, 429 एवं Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 के तहत पशुओं को अनावश्यक रूप से हानि पहुँचाना अपराध है।

8. वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान:

ABC (Animal Birth Control) कार्यक्रम को सशक्त बनाया जाए।

Sterilization और Vaccination को बढ़ावा दिया जाए।

स्थानीय NGOs व Animal Welfare Board के साथ तालमेल बनाकर मानवीय नीति बनाई जाए, न कि पकड़कर शेल्टरों में बंद करना।

कानूनी एवं प्रशासनिक स्पष्टीकरण हेतु निवेदन:

1. अप्रमाणित रिपोर्टों पर आधारित निर्णय:

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में “राज्यवार रिपोर्ट्स” के आधार पर निर्णय लिया है, जिनकी सत्यता और स्रोत स्पष्ट नहीं हैं.

कोई भी रिपोर्ट वेरिफाइड नहीं है और न ही उसमें ऑथेंटिक डेटा सोर्स (जैसे पशु विभाग, नगर निगम या स्वास्थ्य मंत्रालय) का हवाला दिया गया है।

अतः अप्रमाणित आंकड़ों के आधार पर देशव्यापी आदेश पारित करना न्यायिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है।

2. आदेश में व्यावहारिक अस्पष्टता (No defined procedure):

आदेश में केवल यह कहा गया है कि “बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, स्कूल-कॉलेज से डॉग्स हटाए जाएं”,

परंतु यह नहीं बताया गया कि —

उन्हें कहां ले जाया जाए?

कितने समय के लिए रखा जाए?

उनके भोजन, उपचार और पुनर्वास की क्या व्यवस्था होगी?

यह ABC (Animal Birth Control) Rules, 2023 का स्पष्ट उल्लंघन है क्योंकि इन नियमों में यह निर्धारित है कि

किसी भी संस्थान या क्षेत्र से पकड़े गए कुत्तों को उसी क्षेत्र में नसबंदी व टीकाकरण के बाद पुनः छोड़ा जाना अनिवार्य है।

3. ABC Rules का उल्लंघन स्वयं न्यायिक आदेश द्वारा:

ABC Rules, 2023 के Rule 3 और Rule 5 के अनुसार “Institutional Areas” (जैसे स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल, सरकारी दफ्तर आदि) भी इन नियमों के अंतर्गत आते हैं।

ऐसे में, बिना पुनर्वास या छोड़े जाने की व्यवस्था के “केवल हटाने” का आदेश देना तकनीकी रूप से अवैध (Legally Void) है।

4. मानवाधिकारों जैसी समानता की अवधारणा:

भारत के संविधान में Right to Equality (अनुच्छेद 14) और Right to Life (अनुच्छेद 21) केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों के अनुसार “जीवों के जीवन और स्वतंत्रता” पर भी लागू होते हैं।

इस आदेश में एक ही प्रकार के जीव (कुत्तों) को लक्षित कर पूरे भारत में एक जैसा व्यवहार करना न्यायसंगत नहीं है।

यह ऐसा ही है जैसे कहा जाए — “दिल्ली की हवा गुरुग्राम में न जाए।” — जो व्यवहारिक रूप से असंभव और विरोधाभासी है।

5. असंभव कार्यान्वयन (Impractical Execution):

आदेश में कहा गया है कि सभी संस्थान और सार्वजनिक स्थानों को फेंसिंग करके डॉग-प्रूफ बनाया जाए।

यह आदेश देश के रेलवे नेटवर्क (दुनिया का सबसे बड़ा ओपन सिस्टम) के संदर्भ में पूर्णतः अव्यवहारिक है।

ट्रेनों के खुले यार्ड, स्टेशन और ट्रैक हजारों किलोमीटर तक फैले हैं — ऐसी स्थिति में 8 सप्ताह में फेंसिंग संभव नहीं।

बस स्टैंड खुले हैं, स्कूल-कॉलेज संसाधनहीन हैं — वहां भी यह आदेश व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

6. संभावित दुर्घटनाएँ और अव्यवस्था:

रेलवे, नगर निगम या स्कूल अधिकारी यदि कुत्तों को पकड़ने के कार्य में लगेंगे, तो इससे मानव और पशु दोनों के लिए जोखिम बढ़ेगा।

भागदौड़ में दुर्घटनाएँ, चोटें, यहां तक कि मौतें भी हो सकती हैं।

यह आदेश सार्वजनिक सुरक्षा के बजाय नई अव्यवस्था पैदा करेगा।

7. प्रशासन द्वारा कोर्ट से स्पष्टीकरण की मांग:

जिला प्रशासन, रेलवे और नगर निकायों को यह अधिकार है कि वे स्पष्टीकरण हेतु आवेदन (Clarification Petition) दाखिल करें और पूछें:

> “देश के सबसे बड़े खुले नेटवर्क की फेंसिंग 8 हफ्तों में कैसे की जा सकती है?”

> “क्या केंद्र या राज्य सरकार इस हेतु कोई विशेष फंड / विशेषज्ञ नियुक्त करेगी?”

> “क्या किसी पैन-इंडिया एनिमल मैनेजमेंट एक्सपर्ट पैनल का गठन किया गया है?”

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट न हों, तब तक यह आदेश अमल योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

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हमारी मांगें:

1. सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के विरुद्ध, जिला प्रशासन की ओर से एक मानवीय, वैज्ञानिक रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जाए।

2. Anti-Rabies Vaccination (ARV) कार्यक्रम जोकि रेबीज को कंट्रोल करने के लिए सबसे ज्यादा प्रभावित है को तुरंत प्रभाव से सशक्त किया जाए।

3. स्थानीय स्तर पर पशु कल्याण समितियाँ बनें, जिनमें NGOs और Animal Activists को भी शामिल किया जाए।

4. किसी भी जानवर को अनावश्यक रूप से कैद या मारा न जाए।

5. जनजागरूकता अभियान चलाकर इंसानों में पशु सह-अस्तित्व का भाव जगाया जाए।

6. स्कूलों और कॉलेज में बच्चों को जानवरों और इंसानों के बीच सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाया जाए और जागरूकता के लिए कैंप लगाए जाएं।

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निष्कर्ष:

जानवर इस धरती के सह-निवासी हैं। वे हमारे प्रतिद्वंदी नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी के रक्षक हैं।

उन्हें हटाना या दंडित करना पर्यावरण, स्वास्थ्य और मानव समाज – तीनों के लिए हानिकारक है।

इस संबंध में जिला प्रशासन उचित संज्ञान लेकर आगे की कार्रवाई करे।

 

Piyush Soni

Animal Activist & Journalist 

Vice President Punjab – Intellectual Press Council

Member : People for Animals, Animal Welfare Board of India, PETA India

Contact : +91-9463439313

 

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Petition created on 11 November 2025