100 लाख लड़कियों पर दोबारा स्कूल का मुंह नहीं देख पाने का खतरा है! #100DaysOfAction

समस्या

मेरा भविष्य दांव पर है!

कोरोना की दूसरी लहर में लोग ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए संघर्ष करते नज़र आए। और आज भी लोग खाने के लिए भी लंबी लाइनों में खड़े नज़र आएंगे। परिवार जिनकी कमाई पर चलता था, बीमारी ने उन्हें अपना शिकार बना लिया। ना पेट में रोटी है, ना जेब में पैसा और ना आँखों में कोई उम्मीद।

आखिर इस सदमे से हम कैसे बाहर निकलेंगे?

मेरा नाम निशा (उम्र 18 साल) है और मुझे 9 साल की उम्र तक मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ी। ‘स्कूल’ शब्द क्या होता है ये मैंने तब जाना जब स्कूल जाने की आधी उम्र कट गई।

मैं पिछले कुछ सालों से सेव द चिल्ड्रेन वा अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर प्रयास करती रही कि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में रह रही मेरी बहनें स्कूल जा सकें। उन लड़कियों को भी किताबें मिलें और वो शिक्षा से जुड़ी रहें। पर अब लगता है कि यह प्रयास भी कोरोना की भेंट चढ़ जाएगा।

समाज का एक हिस्सा तो पहले ही लड़कियों को बोझ मानते आ रहा था। किताब-कॉपी छुड़ाकर कुदाल और फावड़ा सबसे पहले उन्हीं को पकड़ाया जाता है। काम नहीं करतीं तो बेच दी जाती हैं या ब्याह दी जाती हैं। ये सब मेरे लिए कहानियां नहीं,
मैंने ये सब अपनी आँखों से देखा है। मुझे डर है कि कोरोना के बाद हर दूसरी लड़की के पास ऐसी कहानी होगी।

हमारी सरकार को तुरंत इस खामोश महामारी पर ध्यान देना होगा, एक महामारी जो लाखों निर्दोष लड़कियों के सपनों को मार देगी। यदि लड़कियों के जीवन में शिक्षा नहीं होगी तो उनके पास अधिकार भी नहीं होंगे। मेरा सपना है कि देश की हर लड़की को अपने सपने पूरा करते हुए देखूँ। आशा करती हूँ ये केवल सपना बनकर ही ना रह जाए।

क्या आप मेरा साथ देंगे इसे पूरा करने में? क्या आप हमारे साथ मिलकर हमारी शिक्षा के अधिकार और सपने को बचाएंगे? #AllyUpForHer #SaveOurEducation

अनुमान लगाया जा रहा है कि कोरोना के बाद 100 लाख लड़कियां वापस स्कूल का मुंह नहीं देख पाएंगी। हालांकि स्कूलों को बंद करना का निर्णय कोरोना को रोकने में एक सहायक भूमिका निभाता है। पर स्कूलों को दुबारा खोलने में जितनी देरी होगी, कुछ बच्चों की स्कूल वापसी लगभग उतनी असंभव हो जाएगी। खतरा खासतौर पर लड़कियों के लिए बड़ा है या समाज के वंचित वर्ग से आने वाले बच्चों के लिए जैसे कि प्रवासी मज़दूर, इत्यादि।

हम भारत के माननीय शिक्षा मंत्री जी से विनम्र अनुरोध करते हैं कि वो सेव द चिल्ड्रेन संस्था की निम्नलिखित मांगों पर विचार करें ताकि सभी बच्चे, विशेषकर लड़कियां शिक्षा से वंचित ना रहें:

1. हर एक बच्चे की शिक्षा के लिए ज़रूरी सामान का इंतज़ाम करें। जिसमें लड़कियों पर विशेष ध्यान दिया जाएI जो बच्चे ऑनलाइन पढाई तक नहीं पहुंच पाए हैं उनके लिए समाधान ढूंढे जाएं।

2. बच्चों, उनके माता-पिता, और शैक्षिक कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध हो ताकि वह COVID-19 के प्रभाव का मुकाबला कर सकें।

3. स्कूल बंद होने के दौरान भी बच्चों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन (मिड-डे मील) मिलते रहना चाहिए।

4. कोरोना के कारण अपने माता-पिता या दोनों में से किसी एक को खो चुके बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करें और इसके लिए उनकी आर्थिक मदद की जाए।

5. शिक्षा बजट बढ़ाएं ताकि सभी बच्चों को एकसमान और अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले।

6. सुनिश्चित करें कि COVID-19 से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (AWWs) और सहियाओं को सपोर्ट मिले और उनकी भूमिका को शिक्षण / शैक्षणिक कार्यों तक ही सीमित रखा जाये। उनके टीकाकरण को प्राथमिकता दी जाये।

7. कोरोना को फैलने से रोकने के लिए किये इंतज़ाम जैसे कि चिकित्सा या COVID-19 टीकाकरण केंद्र के लिए स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग कम से कम करा जाये।

निशा के शब्दों और इस पेटीशन पर आए आप सबके समर्थन की ताकत से हम उसके सपनों को हकीकत में बदल सकते हैं। #AllyUpForHer. भारत को सुनिश्चित करना होगा कि लड़कियां वापस स्कूल जा सकें। यदि ऐसा नहीं होता है तो एक पूरी पीढ़ी पर शिक्षा से वंचित होने का खतरा बढ़ जाएगा।

हम #100DaysOfAction के लिए कैंपेन कर रहे हैं। आप भी इसका हिस्सा बनें। पेटीशन साइन और शेयर करें और देश के बच्चों, खासकर लड़कियों की स्कूल वापसी के लिए आवाज़ उठाएं।

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मेरा भविष्य दांव पर है!

कोरोना की दूसरी लहर में लोग ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए संघर्ष करते नज़र आए। और आज भी लोग खाने के लिए भी लंबी लाइनों में खड़े नज़र आएंगे। परिवार जिनकी कमाई पर चलता था, बीमारी ने उन्हें अपना शिकार बना लिया। ना पेट में रोटी है, ना जेब में पैसा और ना आँखों में कोई उम्मीद।

आखिर इस सदमे से हम कैसे बाहर निकलेंगे?

मेरा नाम निशा (उम्र 18 साल) है और मुझे 9 साल की उम्र तक मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ी। ‘स्कूल’ शब्द क्या होता है ये मैंने तब जाना जब स्कूल जाने की आधी उम्र कट गई।

मैं पिछले कुछ सालों से सेव द चिल्ड्रेन वा अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर प्रयास करती रही कि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में रह रही मेरी बहनें स्कूल जा सकें। उन लड़कियों को भी किताबें मिलें और वो शिक्षा से जुड़ी रहें। पर अब लगता है कि यह प्रयास भी कोरोना की भेंट चढ़ जाएगा।

समाज का एक हिस्सा तो पहले ही लड़कियों को बोझ मानते आ रहा था। किताब-कॉपी छुड़ाकर कुदाल और फावड़ा सबसे पहले उन्हीं को पकड़ाया जाता है। काम नहीं करतीं तो बेच दी जाती हैं या ब्याह दी जाती हैं। ये सब मेरे लिए कहानियां नहीं,
मैंने ये सब अपनी आँखों से देखा है। मुझे डर है कि कोरोना के बाद हर दूसरी लड़की के पास ऐसी कहानी होगी।

हमारी सरकार को तुरंत इस खामोश महामारी पर ध्यान देना होगा, एक महामारी जो लाखों निर्दोष लड़कियों के सपनों को मार देगी। यदि लड़कियों के जीवन में शिक्षा नहीं होगी तो उनके पास अधिकार भी नहीं होंगे। मेरा सपना है कि देश की हर लड़की को अपने सपने पूरा करते हुए देखूँ। आशा करती हूँ ये केवल सपना बनकर ही ना रह जाए।

क्या आप मेरा साथ देंगे इसे पूरा करने में? क्या आप हमारे साथ मिलकर हमारी शिक्षा के अधिकार और सपने को बचाएंगे? #AllyUpForHer #SaveOurEducation

अनुमान लगाया जा रहा है कि कोरोना के बाद 100 लाख लड़कियां वापस स्कूल का मुंह नहीं देख पाएंगी। हालांकि स्कूलों को बंद करना का निर्णय कोरोना को रोकने में एक सहायक भूमिका निभाता है। पर स्कूलों को दुबारा खोलने में जितनी देरी होगी, कुछ बच्चों की स्कूल वापसी लगभग उतनी असंभव हो जाएगी। खतरा खासतौर पर लड़कियों के लिए बड़ा है या समाज के वंचित वर्ग से आने वाले बच्चों के लिए जैसे कि प्रवासी मज़दूर, इत्यादि।

हम भारत के माननीय शिक्षा मंत्री जी से विनम्र अनुरोध करते हैं कि वो सेव द चिल्ड्रेन संस्था की निम्नलिखित मांगों पर विचार करें ताकि सभी बच्चे, विशेषकर लड़कियां शिक्षा से वंचित ना रहें:

1. हर एक बच्चे की शिक्षा के लिए ज़रूरी सामान का इंतज़ाम करें। जिसमें लड़कियों पर विशेष ध्यान दिया जाएI जो बच्चे ऑनलाइन पढाई तक नहीं पहुंच पाए हैं उनके लिए समाधान ढूंढे जाएं।

2. बच्चों, उनके माता-पिता, और शैक्षिक कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध हो ताकि वह COVID-19 के प्रभाव का मुकाबला कर सकें।

3. स्कूल बंद होने के दौरान भी बच्चों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन (मिड-डे मील) मिलते रहना चाहिए।

4. कोरोना के कारण अपने माता-पिता या दोनों में से किसी एक को खो चुके बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करें और इसके लिए उनकी आर्थिक मदद की जाए।

5. शिक्षा बजट बढ़ाएं ताकि सभी बच्चों को एकसमान और अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले।

6. सुनिश्चित करें कि COVID-19 से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (AWWs) और सहियाओं को सपोर्ट मिले और उनकी भूमिका को शिक्षण / शैक्षणिक कार्यों तक ही सीमित रखा जाये। उनके टीकाकरण को प्राथमिकता दी जाये।

7. कोरोना को फैलने से रोकने के लिए किये इंतज़ाम जैसे कि चिकित्सा या COVID-19 टीकाकरण केंद्र के लिए स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग कम से कम करा जाये।

निशा के शब्दों और इस पेटीशन पर आए आप सबके समर्थन की ताकत से हम उसके सपनों को हकीकत में बदल सकते हैं। #AllyUpForHer. भारत को सुनिश्चित करना होगा कि लड़कियां वापस स्कूल जा सकें। यदि ऐसा नहीं होता है तो एक पूरी पीढ़ी पर शिक्षा से वंचित होने का खतरा बढ़ जाएगा।

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