

महिलाओं के पूर्व नाम काे उपयोग ना करने की MoHUA की अधिसूचना तत्काल वापस लें!


महिलाओं के पूर्व नाम काे उपयोग ना करने की MoHUA की अधिसूचना तत्काल वापस लें!
समस्या
मेरे पास वोटर आईडी है, लेकिन उस पर मेरा उपनाम क्या होगा, यह तय करने का अधिकार मुझे क्यों नहीं है? मैं न सिर्फ एक नई जिंदगी इस दुनिया में ला सकती हूं बल्कि अकेले उसका पालन-पोषण भी कर सकती हूं, तो फिर मुझे यह तय करने के लिए किसी से अनुमति लेने की क्या जरूरत है कि मेरा उपनाम क्या होगा?
पति के सरनेम के बिना मुझे अधूरा क्यों समझा जाता है?मंत्रालय की नई अधिसूचना जो विवाहित महिला को अनिवार्य करती है,कि अगर वो अपना पहला उपनाम बरकरार रखना चाहती है या वापस पाना चाहती है, इसके लिए अपने पति से अनापत्ति प्रमाण पत्र(NOC) प्रदान करना होगा , यह भारत के संविधान के तहत मेरे अधिकारों का पूर्ण उल्लंघन है।
मैं भी इस समाज का उतना ही महत्वपूर्ण अंग हूं; मुझे समाज में एक समान व्यक्ति के रूप में स्वीकृति के लिए अपनी पहचान में किसी पुरुष का उपनाम जोड़ने की आवश्यकता क्यों है? कब तक मुझे पितृसत्तात्मक सोच का शिकार बनाया जाएगा?
मेरे कान यह सुनते-सुनते थक गए हैं कि मेरा अस्तित्व केवल एक पुरुष के कारण है; मूल्यों और परंपराओं के नाम पर कब तक मेरी पहचान दबाई जाती रहेगी?क्या महिलाओं की मदद से, हम चांद तक पहुंच नहीं गए हैं?
हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि भारत के भीतर किसी भी नागरिक
को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा
समानता भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में से एक है।
अनुच्छेद 14 निषेध करता है नस्ल, जाति, धर्म, जन्म स्थान या लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव।
अनुच्छेद 19 का कहना है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है।
अनुच्छेद 21 घोषणा करता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
कई देशों में अब महिलाओं को अपना पहला नाम बरकरार रखने के समर्थन में कानून हैं। 1970 और 80 के दशक में ग्रीस में लाए गए सुधारों ने महिलाओं के लिए शादी के बाद भी अपने माता-पिता द्वारा तय किया गया नाम रखना अनिवार्य कर दिया; यानी कि शादी के बाद पति का सरनेम अपने नाम के साथ जोड़ना गैरकानूनी है।
इसी प्रकार इटली में 1975 में कानून में एक बड़ा सुधार लाया गया जिसके द्वारा महिलाओं को शादी के बाद भी अपना विवाहपूर्व नाम रखने का अधिकार दिया गया।
बेल्जियम में भी शादी के बाद नाम नहीं बदला जाता. 2014 से पहले, एक कानून था कि बच्चे को पिता का नाम लेना होगा, लेकिन यह बदल गया है; बच्चों को अब माता या पिता में से किसी एक का उपनाम दिया जा सकता है।
नीदरलैंड में शादी के बाद पति को अपना नाम बदलने और पत्नी का उपनाम लेने का भी विकल्प दिया जाता है। बच्चे के पास भी मां या पिता का उपनाम लेने का विकल्प होता है।
भारत में, मुंबई उच्च न्यायालय ने 2012 में पारिवारिक न्यायालय नियमों में संशोधन किया, और एक प्रावधान जोड़ा कि पत्नी अपने मायके के नाम का उपयोग करना जारी रख सकती है और अपने पहले उपनाम के साथ तलाक के लिए भी आवेदन कर सकती है।
हालाँकि, क्या वास्तव में वांछित समानता हासिल की गई है? यदि हां, तो पुरुषों के लिए शादी के बाद अपना नाम बदलने का विकल्प क्यों नहीं है?
शादी.कॉम (shaadi.com) द्वारा कराए गए एक सर्वे में 40 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने कहा कि वे शादी के बाद अपना उपनाम नहीं बदलना चाहती। किसी व्यक्ति का नाम उसकी पहचान और अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू है।मुझे अपना उपनाम बदलने के लिए मजबूर करना लिंग भेदभाव को स्पष्ट मामला है और मेरी निजता का उल्लंघन भी है!
मैंने जीवन के कई आयाम और उपलब्धियां अपना मूल पहचान के आधार पर जिया ही नही हासिल भी किए हैं; मैं शादी के बाद इसे सिर्फ इसलिए क्यों छोड़ दूं क्योंकि मेरे पति का उपनाम अलग है? बदलते समय के साथ, महिलाएं उपनाम बदलने की इस परंपरा को शादी के एक तत्व के रूप में नहीं मानती हैं। मैं शादी के बाद अपना उपनाम बदलने में विश्वास नहीं करती हूं और इसे अपना मूल पहचान और समाज में समानता के अधिकार को मिटाने के रूप में देखती हूं!
#मेडननेमकाअधिकार
समस्या
मेरे पास वोटर आईडी है, लेकिन उस पर मेरा उपनाम क्या होगा, यह तय करने का अधिकार मुझे क्यों नहीं है? मैं न सिर्फ एक नई जिंदगी इस दुनिया में ला सकती हूं बल्कि अकेले उसका पालन-पोषण भी कर सकती हूं, तो फिर मुझे यह तय करने के लिए किसी से अनुमति लेने की क्या जरूरत है कि मेरा उपनाम क्या होगा?
पति के सरनेम के बिना मुझे अधूरा क्यों समझा जाता है?मंत्रालय की नई अधिसूचना जो विवाहित महिला को अनिवार्य करती है,कि अगर वो अपना पहला उपनाम बरकरार रखना चाहती है या वापस पाना चाहती है, इसके लिए अपने पति से अनापत्ति प्रमाण पत्र(NOC) प्रदान करना होगा , यह भारत के संविधान के तहत मेरे अधिकारों का पूर्ण उल्लंघन है।
मैं भी इस समाज का उतना ही महत्वपूर्ण अंग हूं; मुझे समाज में एक समान व्यक्ति के रूप में स्वीकृति के लिए अपनी पहचान में किसी पुरुष का उपनाम जोड़ने की आवश्यकता क्यों है? कब तक मुझे पितृसत्तात्मक सोच का शिकार बनाया जाएगा?
मेरे कान यह सुनते-सुनते थक गए हैं कि मेरा अस्तित्व केवल एक पुरुष के कारण है; मूल्यों और परंपराओं के नाम पर कब तक मेरी पहचान दबाई जाती रहेगी?क्या महिलाओं की मदद से, हम चांद तक पहुंच नहीं गए हैं?
हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि भारत के भीतर किसी भी नागरिक
को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा
समानता भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में से एक है।
अनुच्छेद 14 निषेध करता है नस्ल, जाति, धर्म, जन्म स्थान या लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव।
अनुच्छेद 19 का कहना है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है।
अनुच्छेद 21 घोषणा करता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
कई देशों में अब महिलाओं को अपना पहला नाम बरकरार रखने के समर्थन में कानून हैं। 1970 और 80 के दशक में ग्रीस में लाए गए सुधारों ने महिलाओं के लिए शादी के बाद भी अपने माता-पिता द्वारा तय किया गया नाम रखना अनिवार्य कर दिया; यानी कि शादी के बाद पति का सरनेम अपने नाम के साथ जोड़ना गैरकानूनी है।
इसी प्रकार इटली में 1975 में कानून में एक बड़ा सुधार लाया गया जिसके द्वारा महिलाओं को शादी के बाद भी अपना विवाहपूर्व नाम रखने का अधिकार दिया गया।
बेल्जियम में भी शादी के बाद नाम नहीं बदला जाता. 2014 से पहले, एक कानून था कि बच्चे को पिता का नाम लेना होगा, लेकिन यह बदल गया है; बच्चों को अब माता या पिता में से किसी एक का उपनाम दिया जा सकता है।
नीदरलैंड में शादी के बाद पति को अपना नाम बदलने और पत्नी का उपनाम लेने का भी विकल्प दिया जाता है। बच्चे के पास भी मां या पिता का उपनाम लेने का विकल्प होता है।
भारत में, मुंबई उच्च न्यायालय ने 2012 में पारिवारिक न्यायालय नियमों में संशोधन किया, और एक प्रावधान जोड़ा कि पत्नी अपने मायके के नाम का उपयोग करना जारी रख सकती है और अपने पहले उपनाम के साथ तलाक के लिए भी आवेदन कर सकती है।
हालाँकि, क्या वास्तव में वांछित समानता हासिल की गई है? यदि हां, तो पुरुषों के लिए शादी के बाद अपना नाम बदलने का विकल्प क्यों नहीं है?
शादी.कॉम (shaadi.com) द्वारा कराए गए एक सर्वे में 40 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने कहा कि वे शादी के बाद अपना उपनाम नहीं बदलना चाहती। किसी व्यक्ति का नाम उसकी पहचान और अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू है।मुझे अपना उपनाम बदलने के लिए मजबूर करना लिंग भेदभाव को स्पष्ट मामला है और मेरी निजता का उल्लंघन भी है!
मैंने जीवन के कई आयाम और उपलब्धियां अपना मूल पहचान के आधार पर जिया ही नही हासिल भी किए हैं; मैं शादी के बाद इसे सिर्फ इसलिए क्यों छोड़ दूं क्योंकि मेरे पति का उपनाम अलग है? बदलते समय के साथ, महिलाएं उपनाम बदलने की इस परंपरा को शादी के एक तत्व के रूप में नहीं मानती हैं। मैं शादी के बाद अपना उपनाम बदलने में विश्वास नहीं करती हूं और इसे अपना मूल पहचान और समाज में समानता के अधिकार को मिटाने के रूप में देखती हूं!
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