उपभोक्ता धोखाधड़ी की जंग : अगली लोक सभा में मजबूत उपभोक्ता कानून का समर्थन करें

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सरिता पाई-पाई जोड़कर अपने सपनों के घर के लिए समय पर किश्त भरती रहीं, इसके बाद भी उन्हें घर मिलने में देरी हुई और वो कंज्यूमर कोर्ट (उपभोक्ता अदालत) में केस लड़ रही हैं। राजेश एक नामी मोबाइल कंपनी के खिलाफ खराब मोबाइल फोन दिए जाने के खिलाफ कंज्यूमर कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं। मेडिकल लापरवाही के चलते मालिनी का बेटा अपंग हो गया, वो इसके खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं।

मालिनी, राजेश और सरिता की तरह सैकड़ों भारतीय हैं, जो अभी भी कंज्यूमर कोर्ट में इंसाफ पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि वो इंसाफ से अभी भी दूर हैं। हर साल कंज्यूमर कोर्ट में साधारण नागरिक न्याय पाने के लिए जाता है पर ऐसे केस में फैसला आने में बहुत देरी हो जाती है। देरी से इंसाफ मिलना, इंसाफ नहीं मिलने के बराबर ही है!

कुल मिलाकर, कंज्यूमर कोर्ट में लगभग 4.5 लाख मामले लंबित हैं। सरकारी कंपनियों, रेलवे और अन्य सरकारी विभागों के खिलाफ कई ऐसे मामले दर्ज हैं, जिन्हें जल्दी से निपटाया जा सकता है, पर वो आज भी लंबित हैं।

हम में से बहुत से लोग यह भी नहीं जानते हैं कि देश का हर नागरिक, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत संरक्षित है।

*उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 क्या है?*

बड़ी संख्या में उपभोक्ता अपने अधिकारों से अनजान हैं। उपभोक्ता कानून इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उपभोक्ताओं के अधिकारों को लागू करता है, और शिकायतों का निवारण प्रदान करता है। इस कानून के तहत, आप अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं जिसमें उत्पाद या सेवा की गुणवत्ता/ मात्रा के बारे में भ्रामक जानकारी प्रदान करना और भ्रामक विज्ञापन शामिल हैं। लेकिन इस अधिनियम में अब बदलाव की जरूरत है।

इसी कड़ी में 20 दिसंबर, 2018 को, कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों के साथ “उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2018’’ लोकसभा में पारित किया गया। हालाँकि, 13 फरवरी, 2019 को संसद स्थगित होने के चलते विधेयक का राज्यसभा में पारित होने का इंतजार बरकरार है। दरअसल, इस विधेयक को लोकसभा  के उस सत्र में पेश किया गया, जिसने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था। लिहाजा, संसदीय प्रक्रिया के अनुसार लोकसभा भंग होने के कारण, ये विधेयक राज्यसभा से पारित नहीं हो सका।

*विधेयक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?*
मौजूदा अधिनियम में कुछ खामियां, जैसे मध्यस्थता के लिए कोई प्रावधान न होना, अदालती बंदोबस्त से बाहर होने में देरी, अपील की लंबी प्रक्रिया, कई अपीलों के कारण कोरम की अनुपलब्धता आदि है।

ये कुछ सबसे बड़े कारण हैं कि कई पीड़ित उपभोक्ता शिकायत दर्ज करने से बचते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी उपभोक्ता की विवादित राशि रु. 10,000/ है, और उसका केस 6 महीने से ज्यादा कोर्ट में चलता है, तो ऐसे में कोई भी उपभोक्ता केस को आगे नहीं बढ़ाना चाहेगा, क्योंकि यह न्याय प्राप्त करने के पूरे उद्देश्य के विपरीत है।

इस विधेयक ने इस दिशा में कई सकारात्मक बदलाव पेश किए हैं, जिनमें (1) एक केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना, (2) उपभोक्ता न्यायालयों में मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना, (3) उपभोक्ता न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को बढ़ाना (4) अनुबंध की अनुचित शर्तें 5) झूठे और भ्रामक विज्ञापनों ,नकली उत्पादों की बिक्री और मिलावटी भोजन के लिए जेल, (6) उत्पाद देयता, जैसे विषय शामिल हैं। 

लिहाजा, इस विधेयक को पारित किया जाना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे इन मुद्दों पर अंकुश लगेगा और अधिक से अधिक उपभोक्ता अदालतों का दरवाजा खटखटाएंगे।

आइये साथ मिलकर उपभोक्ताओं की भलाई के लिए इस पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। आइए अपनी मेहनत की कमाई, समय और प्रयासों को बचाएं। 

इस पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सभी राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं और उनके उम्मीदवारों से अपील करें कि चुनाव के बाद नई लोकसभा में इस जरूरी बिल, “उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2018” को पास करें।