

कुपोषण हटाने के लिए मिड डे मिल में अंडा शामिल करें


कुपोषण हटाने के लिए मिड डे मिल में अंडा शामिल करें
समस्या
कुपोषण एक वैश्विक समस्या है और हमारा देश इससे अछूता नहीं है।एक सर्वे के अनुसार भारत के 80% लोग (लगभग 100 करोड़) कुपोषण के शिकार हैं। इसमें गरीब तबके से लेकर सभ्रांत परिवारों के लोग तक शामिल हैं।ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह है जहां कुपोषण से भी नीचे यानी अतिकुपोषण की स्थिति हो रही है।
हम भारतीयों का आहार कार्बोहाइड्रेट आधारित है जबकि इसे प्रोटीन आधारित होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एवं इंटरनेशनल एग काउंसिल (IEC) ने अंडे को कुपोषण से लड़ने का सबसे सशक्त माध्यम माना है, क्योंकि अंडा उच्च पोषक गुणवत्ता युक्त,सस्ता एवं सहज उपलब्ध पोषक आहार है।माँ के दूध के बाद अंडा ही प्रोटीन का सबसे बड़ा स्त्रोत है।
अत: जिन राज्यों में स्कूलों के मध्यान्ह भोजन (मिड डे मिल) में अंडा शामिल नहीं है उन्हें अौर साथ ही केंद्र सरकार को तुरंत कदम उठाकर अंडे को शामिल करना चाहिए। कई राज्यों, मसलन आंध्र प्रदेश,तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक,उड़ीसा इत्यादि में आंगनबाड़ी और प्राथमिक शालाओं के मध्यान्ह भोजन में प्रति सप्ताह, प्रति छात्र/छात्रा 3-5 अंडे दिए जाते हैं जिसके कारण वहां बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
जबकि छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,गुजरात इत्यादि प्रदेशों में मध्यान्ह भोजन में अंडा नहीं दिया जाता है इस कारण इन प्रदेशों में अब "अतिकुपोषित बच्चों" की स्थिति निर्मित हो रही है। अत्यंत पिछड़े बुंदेलखंड क्षेत्र में अकाल की स्थिति के कारण मध्यान्ह भोजन (मिड डे मिल) का वितरण प्रभावित होने की खबरें अा रहीं हैं। वहां अंडा बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा विकल्प होगा। अंडे के लाभों के लिए इन अांकड़ों को देखें :
प्रोटीन जैविक गुणांक ( Biological Value) -
मां का दूध- 100%
अंडा- 93.7%
गाय का दूध- 87%
भैंस का दूध- 78%
सभी दाल- 58%
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन हैदराबाद (जो कि एक शासकीय संस्थान है) की वर्ष 1999 में की गई अनुशंसा के अनुसार एक व्यक्ति को अपने दैनिक आहार में समस्त पोषक तत्वों की मात्रा को संतुलित करने के लिए एक वर्ष में 180 अंडों का सेवन करना चाहिए किन्तु आज तक यह आंकड़ा मात्र 61 अण्डों तक ही पहुँच पाया है।

समस्या
कुपोषण एक वैश्विक समस्या है और हमारा देश इससे अछूता नहीं है।एक सर्वे के अनुसार भारत के 80% लोग (लगभग 100 करोड़) कुपोषण के शिकार हैं। इसमें गरीब तबके से लेकर सभ्रांत परिवारों के लोग तक शामिल हैं।ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह है जहां कुपोषण से भी नीचे यानी अतिकुपोषण की स्थिति हो रही है।
हम भारतीयों का आहार कार्बोहाइड्रेट आधारित है जबकि इसे प्रोटीन आधारित होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एवं इंटरनेशनल एग काउंसिल (IEC) ने अंडे को कुपोषण से लड़ने का सबसे सशक्त माध्यम माना है, क्योंकि अंडा उच्च पोषक गुणवत्ता युक्त,सस्ता एवं सहज उपलब्ध पोषक आहार है।माँ के दूध के बाद अंडा ही प्रोटीन का सबसे बड़ा स्त्रोत है।
अत: जिन राज्यों में स्कूलों के मध्यान्ह भोजन (मिड डे मिल) में अंडा शामिल नहीं है उन्हें अौर साथ ही केंद्र सरकार को तुरंत कदम उठाकर अंडे को शामिल करना चाहिए। कई राज्यों, मसलन आंध्र प्रदेश,तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक,उड़ीसा इत्यादि में आंगनबाड़ी और प्राथमिक शालाओं के मध्यान्ह भोजन में प्रति सप्ताह, प्रति छात्र/छात्रा 3-5 अंडे दिए जाते हैं जिसके कारण वहां बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
जबकि छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,गुजरात इत्यादि प्रदेशों में मध्यान्ह भोजन में अंडा नहीं दिया जाता है इस कारण इन प्रदेशों में अब "अतिकुपोषित बच्चों" की स्थिति निर्मित हो रही है। अत्यंत पिछड़े बुंदेलखंड क्षेत्र में अकाल की स्थिति के कारण मध्यान्ह भोजन (मिड डे मिल) का वितरण प्रभावित होने की खबरें अा रहीं हैं। वहां अंडा बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा विकल्प होगा। अंडे के लाभों के लिए इन अांकड़ों को देखें :
प्रोटीन जैविक गुणांक ( Biological Value) -
मां का दूध- 100%
अंडा- 93.7%
गाय का दूध- 87%
भैंस का दूध- 78%
सभी दाल- 58%
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन हैदराबाद (जो कि एक शासकीय संस्थान है) की वर्ष 1999 में की गई अनुशंसा के अनुसार एक व्यक्ति को अपने दैनिक आहार में समस्त पोषक तत्वों की मात्रा को संतुलित करने के लिए एक वर्ष में 180 अंडों का सेवन करना चाहिए किन्तु आज तक यह आंकड़ा मात्र 61 अण्डों तक ही पहुँच पाया है।

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