

इससे पहले कि देर हो, झारखंड के आंगनवाड़ियों में माहवारी से जुड़ी सेवाएं अनिवार्य की जाएं
समस्या
14 साल की फूलमनी को लग रहा था कि उसके गुप्तांग में जोंक घुस गई है!! फूलमनी को उसकी पहली माहवारी(पीरियड्स) आई थी और उसने वो 5 दिन डर और परेशानी में गुज़ार दिए।
फूलमनी अकेली नहीं है, झारखंड की कई लड़कियां अपनी पहली माहवारी इसी तरह डर और परेशानी के साए में गुज़ारती हैं। उनके पास कोई नहीं होता, जो उन्हें माहवारी से जुड़ी बातें बता सके; उन्हें माहवारी के बारे में शिक्षित कर सके।
शिक्षा की कमी की वजह से समाज और स्वयं लड़कियों में माहवारी को लेकर कई सारे भ्रम होते हैं। माहवारी से जुड़े भ्रम और गलत जानकारियां, शारीरिक और भावनात्मक रूप से लड़कियों पर बुरा असर करती हैं।
मैं चाहती हूं कि झारखंड की हर लड़की के पास माहवारी को लेकर सही जानकारी हो। उन्हें ऐसी सेवाएं प्राप्त हों कि वो इससे जुड़ी हर बात को बिना संकोच के सामने रख सकें।
झारखंड में पहले ही आंगनवाड़ी कर्मचारियों का एक मजबूत नेटवर्क है, जो गांव की महिलाओं को स्वास्थ्य और पोषण के मुद्दे पर जागरुक करती हैं। पर अधिक्तर आंगनवाड़ी कर्मचारियों की माहवारी के मुद्दे को लेकर कोई ट्रेनिंग नहीं होती है, इनके पास कोई साधन भी नहीं होता कि ये झारखंड की लड़कियों को माहवारी के बारे में जागरुक कर सकें।
मेरे पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि राज्य का पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय और देश का महिला एव बाल विकास मंत्रालय झारखंड के सुदूर इलाकों में रह रही लड़कियों को भी माहवारी से जुड़ी जानकारी और सेवाएं मुहैय्या कराए।
इस पेटीशन के माध्यम से झारखंड सरकार से मेरी निम्नलिखित मांगें हैं-
1. दिसंबर 2018 से पहले झारखंड की हर आंगनवाड़ी को माहवारी स्वच्छता सेवाएं देने में सक्षम बनाएं। इन सेवाओं में माहवारी से जुड़ी जानकारी के पोस्टर, इत्यादि शामिल हैं। इसके साथ ही लड़कियों को पैड, आयरन की गोलियां और खून की कमी का चेकअप मुहैय्या कराएं।
2.आंगनवाड़ी कर्मचारियों को माहवारी के मुद्दे पर ट्रेनिंग दी जाए, इस ट्रेनिंग में स्वच्छता और सही जानकारी पर ज़ोर हो। राज्य की हर आंगनवाड़ी में माहवारी पर अनिवार्य मासिक सत्र हों।
3. माहवारी से जुड़े कार्यक्रमों के नतीजे और उनके प्रभाव पर पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट एक ऑडिट रिपोर्ट जारी करे।
4. एक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, जिसमें 2015-16 और 2016-17 में सरकारी स्कूलों में माहवारी सवच्छता से जुड़े कार्यक्रमों के लिए स्वास्थ्य विभाग को स्वीकृत 25 करोड़ के खर्चे और प्रभाव का लेखाजोखा हो।
5. ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जिससे कि आंगनवाड़ी द्वारा माहवारी पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों के प्रभाव को देखा जा सके।
2014 से स्वच्छ भारत अभियान के तहत केंद्र सरकार, ग्रामीण इलाके के लोगों को स्वच्छता का वादा कर रही है। पिछले 5 सालों से मैं आदिवासी और दलित बच्चियों के साथ काम कर रही हूं। मुझे ये जानकर हैरत होती है कि इन बच्चियों को माहवारी के बारे में कितनी कम जानकारी है।
सरकारी स्कूलों के अंदर छात्राओं में माहवारी से जुड़ी स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए, झारखंड सरकार ने 2016 से सैनेटरी नैपकिन के लिए स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से 25 करोड़ रुपये बांटने का कार्यक्रम शुरू किया। लेकिन, इन सैनेटरी नैपकिन का क्या फायदा अगर लडकियों को उनके इस्तेमाल का तरीका ही नहीं पता, ना ये कि उन्हें कब बदला जाता है। अगर लडकियों को माहवारी से जुड़ी जानकारी ही नहीं दी जा रही तो उन्हें सैनेटरी नैपकिन देने से समस्या का हल नहीं होगा।
लड़कियों के स्कूल छोड़ने की एक बड़ी वजह माहवारी है। स्कूल जाना छोड़ चुकी कितनी लड़कियों को ये तक नहीं पता कि उन्हें जानकारी के लिए किसके पास जाना चाहिए।
गांवों में नौजवान लड़कियों के लिए आंगनवाड़ी सेंटर, जानकारी का एक बड़ा स्त्रोत होते हैं। सरकार अगर इन सेंटरों को माहवारी के विषय पर जागरुक और सशक्त बना दे तो झारखंड के गांव में हर लड़की के पास माहवारी से जुड़ी सही जानकारी होगी।

समस्या
14 साल की फूलमनी को लग रहा था कि उसके गुप्तांग में जोंक घुस गई है!! फूलमनी को उसकी पहली माहवारी(पीरियड्स) आई थी और उसने वो 5 दिन डर और परेशानी में गुज़ार दिए।
फूलमनी अकेली नहीं है, झारखंड की कई लड़कियां अपनी पहली माहवारी इसी तरह डर और परेशानी के साए में गुज़ारती हैं। उनके पास कोई नहीं होता, जो उन्हें माहवारी से जुड़ी बातें बता सके; उन्हें माहवारी के बारे में शिक्षित कर सके।
शिक्षा की कमी की वजह से समाज और स्वयं लड़कियों में माहवारी को लेकर कई सारे भ्रम होते हैं। माहवारी से जुड़े भ्रम और गलत जानकारियां, शारीरिक और भावनात्मक रूप से लड़कियों पर बुरा असर करती हैं।
मैं चाहती हूं कि झारखंड की हर लड़की के पास माहवारी को लेकर सही जानकारी हो। उन्हें ऐसी सेवाएं प्राप्त हों कि वो इससे जुड़ी हर बात को बिना संकोच के सामने रख सकें।
झारखंड में पहले ही आंगनवाड़ी कर्मचारियों का एक मजबूत नेटवर्क है, जो गांव की महिलाओं को स्वास्थ्य और पोषण के मुद्दे पर जागरुक करती हैं। पर अधिक्तर आंगनवाड़ी कर्मचारियों की माहवारी के मुद्दे को लेकर कोई ट्रेनिंग नहीं होती है, इनके पास कोई साधन भी नहीं होता कि ये झारखंड की लड़कियों को माहवारी के बारे में जागरुक कर सकें।
मेरे पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि राज्य का पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय और देश का महिला एव बाल विकास मंत्रालय झारखंड के सुदूर इलाकों में रह रही लड़कियों को भी माहवारी से जुड़ी जानकारी और सेवाएं मुहैय्या कराए।
इस पेटीशन के माध्यम से झारखंड सरकार से मेरी निम्नलिखित मांगें हैं-
1. दिसंबर 2018 से पहले झारखंड की हर आंगनवाड़ी को माहवारी स्वच्छता सेवाएं देने में सक्षम बनाएं। इन सेवाओं में माहवारी से जुड़ी जानकारी के पोस्टर, इत्यादि शामिल हैं। इसके साथ ही लड़कियों को पैड, आयरन की गोलियां और खून की कमी का चेकअप मुहैय्या कराएं।
2.आंगनवाड़ी कर्मचारियों को माहवारी के मुद्दे पर ट्रेनिंग दी जाए, इस ट्रेनिंग में स्वच्छता और सही जानकारी पर ज़ोर हो। राज्य की हर आंगनवाड़ी में माहवारी पर अनिवार्य मासिक सत्र हों।
3. माहवारी से जुड़े कार्यक्रमों के नतीजे और उनके प्रभाव पर पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट एक ऑडिट रिपोर्ट जारी करे।
4. एक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, जिसमें 2015-16 और 2016-17 में सरकारी स्कूलों में माहवारी सवच्छता से जुड़े कार्यक्रमों के लिए स्वास्थ्य विभाग को स्वीकृत 25 करोड़ के खर्चे और प्रभाव का लेखाजोखा हो।
5. ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जिससे कि आंगनवाड़ी द्वारा माहवारी पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों के प्रभाव को देखा जा सके।
2014 से स्वच्छ भारत अभियान के तहत केंद्र सरकार, ग्रामीण इलाके के लोगों को स्वच्छता का वादा कर रही है। पिछले 5 सालों से मैं आदिवासी और दलित बच्चियों के साथ काम कर रही हूं। मुझे ये जानकर हैरत होती है कि इन बच्चियों को माहवारी के बारे में कितनी कम जानकारी है।
सरकारी स्कूलों के अंदर छात्राओं में माहवारी से जुड़ी स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए, झारखंड सरकार ने 2016 से सैनेटरी नैपकिन के लिए स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से 25 करोड़ रुपये बांटने का कार्यक्रम शुरू किया। लेकिन, इन सैनेटरी नैपकिन का क्या फायदा अगर लडकियों को उनके इस्तेमाल का तरीका ही नहीं पता, ना ये कि उन्हें कब बदला जाता है। अगर लडकियों को माहवारी से जुड़ी जानकारी ही नहीं दी जा रही तो उन्हें सैनेटरी नैपकिन देने से समस्या का हल नहीं होगा।
लड़कियों के स्कूल छोड़ने की एक बड़ी वजह माहवारी है। स्कूल जाना छोड़ चुकी कितनी लड़कियों को ये तक नहीं पता कि उन्हें जानकारी के लिए किसके पास जाना चाहिए।
गांवों में नौजवान लड़कियों के लिए आंगनवाड़ी सेंटर, जानकारी का एक बड़ा स्त्रोत होते हैं। सरकार अगर इन सेंटरों को माहवारी के विषय पर जागरुक और सशक्त बना दे तो झारखंड के गांव में हर लड़की के पास माहवारी से जुड़ी सही जानकारी होगी।

फैसला लेने वाले
पेटीशन अपडेट
पेटीशन को शेयर करें
1 जून 2018 पर पेटीशन बनाई गई