हर नौकरीपेशा भारतीय को मिले #RightToDisconnect, ताकि काम के बाद काम नहीं आराम मिले

समस्या

तनाव, थकान और नींद न आना। लगभग हर नौकरीपेशा भारतीय ने अपने जीवन में कभी न कभी इन दिक्कतों का सामना किया ही है।

कारण: काम के दबाव के कारण पूरे दिन और यहां तक ​​कि वीकेंड और छुट्टियों पर भी काम करना। सोते-सोते भी ऑफिस का कॉल या ईमेल आ जाता है तो कर्मचारी को जागना पड़ता है, काम करना पड़ता है।

मैं चिंतित हूँ। इसका हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम हो सकता है। खासकर कोरोना के बाद जब ऑफिस और घर का फर्क लगभग मिटता जा रहा है। 24/7 कनेक्टेड रहना हमें कुछ बीमारियों से भी कनेक्ट कर रहा है।

कागज पर तो ज्यादातर कंपनियों का कहना है कि वो कर्मचारियों से केवल 8 से 9 घंटे ही काम कराती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कर्मचारियों को कई बार छुट्टी पर होते हुए भी ऑफिस की कॉल उठानी पड़ती है। मेल का जवाब देना पड़ता है।

हम में से कितने हैं जो जीवन में ज़रा भी वर्क-लाइफ़ बैलेंस ना होने की शिकायत करते हैं, हमारे लिए टेलीफोन दरअसल टेलीप्रेशर बनता जा रहा है।

जब मैंने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट पढ़ी तो मैंने इस समस्या के बारे में कुछ करने का फैसला किया।

मैंने ये अभियान इसलिए शुरू किया है ताकि भारत की सभी पार्टियां मिलकर नौकरीपेशा भारतीयों को #RightToDisconnect दिलाएं। मेरी पेटीशन साइन-शेयर करें।

सुखी, तनावमुक्त जीवन जीना हम सभी का अधिकार है।

मैंने 28 दिसंबर 2018 को संसद में एक विधेयक पेश किया था और मैं इसे पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हूं क्योंकि यह काम की मौजूदा व्यवस्था को बदल देगा। बिल में कुछ सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यहां दिए गए हैं:

-कर्मचारी के पर्सनल स्पेस और टाइम का महत्व समझा जाए। काम के घंटों के बाद कर्मचारी के पास #RightToDisconnect यानी कंपनी के फोन, ईमेल का जवाब ना देने का विकल्प देना।

-कंपनियों की कामकाजी जरूरतों और उनकी विविध कार्य संस्कृतियों को ध्यान में रखना।

-एक कर्मचारी को ओवरटाइम वेतन का अधिकार देना यदि उसे ड्यूटी के समय के बाद काम करने के लिए कहा जाता है।

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Supriya Suleपेटीशन स्टार्टर

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तनाव, थकान और नींद न आना। लगभग हर नौकरीपेशा भारतीय ने अपने जीवन में कभी न कभी इन दिक्कतों का सामना किया ही है।

कारण: काम के दबाव के कारण पूरे दिन और यहां तक ​​कि वीकेंड और छुट्टियों पर भी काम करना। सोते-सोते भी ऑफिस का कॉल या ईमेल आ जाता है तो कर्मचारी को जागना पड़ता है, काम करना पड़ता है।

मैं चिंतित हूँ। इसका हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम हो सकता है। खासकर कोरोना के बाद जब ऑफिस और घर का फर्क लगभग मिटता जा रहा है। 24/7 कनेक्टेड रहना हमें कुछ बीमारियों से भी कनेक्ट कर रहा है।

कागज पर तो ज्यादातर कंपनियों का कहना है कि वो कर्मचारियों से केवल 8 से 9 घंटे ही काम कराती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कर्मचारियों को कई बार छुट्टी पर होते हुए भी ऑफिस की कॉल उठानी पड़ती है। मेल का जवाब देना पड़ता है।

हम में से कितने हैं जो जीवन में ज़रा भी वर्क-लाइफ़ बैलेंस ना होने की शिकायत करते हैं, हमारे लिए टेलीफोन दरअसल टेलीप्रेशर बनता जा रहा है।

जब मैंने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट पढ़ी तो मैंने इस समस्या के बारे में कुछ करने का फैसला किया।

मैंने ये अभियान इसलिए शुरू किया है ताकि भारत की सभी पार्टियां मिलकर नौकरीपेशा भारतीयों को #RightToDisconnect दिलाएं। मेरी पेटीशन साइन-शेयर करें।

सुखी, तनावमुक्त जीवन जीना हम सभी का अधिकार है।

मैंने 28 दिसंबर 2018 को संसद में एक विधेयक पेश किया था और मैं इसे पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हूं क्योंकि यह काम की मौजूदा व्यवस्था को बदल देगा। बिल में कुछ सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यहां दिए गए हैं:

-कर्मचारी के पर्सनल स्पेस और टाइम का महत्व समझा जाए। काम के घंटों के बाद कर्मचारी के पास #RightToDisconnect यानी कंपनी के फोन, ईमेल का जवाब ना देने का विकल्प देना।

-कंपनियों की कामकाजी जरूरतों और उनकी विविध कार्य संस्कृतियों को ध्यान में रखना।

-एक कर्मचारी को ओवरटाइम वेतन का अधिकार देना यदि उसे ड्यूटी के समय के बाद काम करने के लिए कहा जाता है।

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फैसला लेने वाले

M.Thambidurai
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Mallikarjun Kharge
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28 फ़रवरी 2022 पर पेटीशन बनाई गई