कोरोना लॉकडाउन में फंसे मज़दूरों के खाने-पीने और सुरक्षित यातायात की व्यवस्था करे सरकार

समस्या

“यहाँ शहर में मिट्टी और पत्थर खाएं? बेहतर है कि हम गाँव चले जाएं। कम से कम वहाँ नमक रोटी तो खा पाएंगे।”

टीवी पर एक प्रवासी मजदूर के इन शब्दों से हमारी आत्मा सिहर उठी। वो कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव जाने की कोशिश कर रहा था।

कोरोना वायरस के चलते देश में लॉकडाउन के बाद पूरा भारत हालात के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहा है। इससे हर भारतीय प्रभावित है लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं वो गरीब मजदूर और कामगार हैं, जो बड़े शहरों में रोज़ कमाने खाने की लड़ाई लड़ते हैं। देश में लॉकडाउन के साथ मानो इनके पेट पर भी लॉकडाउन लग गया।

लॉकडाउन का मतलब है कि अगले 3 हफ्तों तक उनके पास कोई काम नहीं होगा। ना कोई आमदानी जिससे वो खाना पाएं। सरकार के राहत पैकेज की घोषणाओं से पहले ही लाखों मजदूर सिर पर बोरी और बच्चों को लादकर पैदल ही अपने गाँव की ओर निकल गए। पैदल, क्योंकि रोड पर कोई बस या सवारी नहीं। वो किसी तरह बस अपने गाँव पहुँचना चाहते हैं।

मेरी पेटीशन साइन कर केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करें कि वो प्रवासी मजदूरों के लिए साझा राहत और बचाव अभियान चलाएं। इसमें वो:

1. उन्हें सुरक्षित उनके गाँव पहुँचाने के लिए सवारी का प्रबंध करें
2. रास्तों पर उनके लिए खाने-पीने के कैंप लगाए जाएं ताकि वो भूखे ना रहें

ऐसा करने के लिए विभिन्न राज्यों में बेहतर तालमेल की ज़रूरत है, इसमें ज़िला प्रशासनों की भी बड़ी भूमिका होगी। ये अच्छी बात है कि कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क कर रहे हैं और मजदूरों को राहत पहुँचा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (जहाँ से मैं खुद हूँ), ओडिशा, झारखंड, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य एक दूसरे से बराबर संपर्क में हैं। इस राहत और बचाव कार्य में और भी राज्यों को सक्रियता दिखानी होगी।

मेरी पेटीशन साइन करें ताकि लॉकडाउन में फंसे मजदूरों को तुरंत राहत पहुँचाई जाए। जब हम घर से नहीं निकल सकते, तो कम से कम घर पर रहकर इन मजदूरों के लिए आवाज़ तो उठा सकते हैं।

हमारे सोशल मीडिया का यही सबसे अच्छा उपयोग होगा कि हम उनके लिए आवाज़ उठाएं, अगर हमने ऐसा नहीं किया तो कौन करेगा?

#MazdooronKiMadad

Image Credit: Reuters

avatar of the starter
Shirin S Khan and Sunita Kumari Changemakersपेटीशन स्टार्टर
यह पेटीशन 4,59,858 हस्ताक्षर जुट गई

समस्या

“यहाँ शहर में मिट्टी और पत्थर खाएं? बेहतर है कि हम गाँव चले जाएं। कम से कम वहाँ नमक रोटी तो खा पाएंगे।”

टीवी पर एक प्रवासी मजदूर के इन शब्दों से हमारी आत्मा सिहर उठी। वो कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव जाने की कोशिश कर रहा था।

कोरोना वायरस के चलते देश में लॉकडाउन के बाद पूरा भारत हालात के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहा है। इससे हर भारतीय प्रभावित है लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं वो गरीब मजदूर और कामगार हैं, जो बड़े शहरों में रोज़ कमाने खाने की लड़ाई लड़ते हैं। देश में लॉकडाउन के साथ मानो इनके पेट पर भी लॉकडाउन लग गया।

लॉकडाउन का मतलब है कि अगले 3 हफ्तों तक उनके पास कोई काम नहीं होगा। ना कोई आमदानी जिससे वो खाना पाएं। सरकार के राहत पैकेज की घोषणाओं से पहले ही लाखों मजदूर सिर पर बोरी और बच्चों को लादकर पैदल ही अपने गाँव की ओर निकल गए। पैदल, क्योंकि रोड पर कोई बस या सवारी नहीं। वो किसी तरह बस अपने गाँव पहुँचना चाहते हैं।

मेरी पेटीशन साइन कर केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करें कि वो प्रवासी मजदूरों के लिए साझा राहत और बचाव अभियान चलाएं। इसमें वो:

1. उन्हें सुरक्षित उनके गाँव पहुँचाने के लिए सवारी का प्रबंध करें
2. रास्तों पर उनके लिए खाने-पीने के कैंप लगाए जाएं ताकि वो भूखे ना रहें

ऐसा करने के लिए विभिन्न राज्यों में बेहतर तालमेल की ज़रूरत है, इसमें ज़िला प्रशासनों की भी बड़ी भूमिका होगी। ये अच्छी बात है कि कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क कर रहे हैं और मजदूरों को राहत पहुँचा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (जहाँ से मैं खुद हूँ), ओडिशा, झारखंड, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य एक दूसरे से बराबर संपर्क में हैं। इस राहत और बचाव कार्य में और भी राज्यों को सक्रियता दिखानी होगी।

मेरी पेटीशन साइन करें ताकि लॉकडाउन में फंसे मजदूरों को तुरंत राहत पहुँचाई जाए। जब हम घर से नहीं निकल सकते, तो कम से कम घर पर रहकर इन मजदूरों के लिए आवाज़ तो उठा सकते हैं।

हमारे सोशल मीडिया का यही सबसे अच्छा उपयोग होगा कि हम उनके लिए आवाज़ उठाएं, अगर हमने ऐसा नहीं किया तो कौन करेगा?

#MazdooronKiMadad

Image Credit: Reuters

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Shirin S Khan and Sunita Kumari Changemakersपेटीशन स्टार्टर

फैसला लेने वाले

Manish Tewari
Member of Parliament and National Spokesperson - AICC
रिस्पोंस दिया गया
प्रिय देशवासियों, कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने हमारे देश में 1947 बँटवारे के बाद के सबसे बड़े मानवीय संकट को जन्म दिया है। मार्च के तीसरे सप्ताह में अचानक लॉकडाउन की घोषणा, जो कि केरल में दो महीने पहले इसका पहला केस सामने आने के बाद हुई, उससे आम जीवन अस्तव्यस्त हो गया। कुछ ही दिनों में हमारे मज़दूर भाई-बहनों के पलायन की दिल तोड़ देने वाली तस्वीरें भी आने लगीं। बिना किसी सहारे के, भूखे-प्यासे और बेघर मज़दूर हाईवे पर चलने को मजबूर किए गए। ना उन्हें तपती धूप में जलती सड़क रोक सकी और ना इस बात ने कि उनका घर सैकड़ों-हज़ारों किलोमीटर दूर है। इस दुखद यात्रा की तस्वीरें किसी भी भारतीय की आँखों में आंसू लाने के लिए काफ़ी हैं। ये एक ऐसा गंभीर मुद्दा है जो कांग्रेस पार्टी और मेरी प्राथमिकता है। मुझे खुशी है कि Change.org हिंदी पर सुनीता कुमारी और शिरीन शबाना खान की इस पेटीशन को मेरे ध्यान में लाया गया, जिसकी मांग है कि हमारे प्रवासी मज़दूर भाई-बहनों को सुरक्षित उनके घर वापस पहुँचाया जाए। जैसा कि हमारी पार्टी की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी ने कहा, हमारे कामगार और मज़दूर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं। भारत की नींव में उनकी मेहनत और उनका त्याग छिपा हुआ है। इस समस्या पर सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, मजदूरों को उनके घर-परिवार से मिलाने के लिए मुफ्त यात्रा या न्यूनतम खर्च पर यात्रा की सुविधा देनी होगी। इस मुद्दे पर मानवीयता के साथ और मज़दूरों के सम्मान की रक्षा को ध्यान में रखते हुए काम करना होगा। गृह मंत्रालय द्वारा 29 अप्रैल को जारी की गई गाइडलाइन के अनुसार मुझे आप सबको सूचित करते हुए खुशी हो रही है कि कांग्रेस शासित राज्य सरकारें- छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान घर वापस जा रहे मज़दूर भाई-बहनों की रेल यात्रा का खर्चा उठाएंगी। श्रीमती सोनिया गांधी के आदेशानुसार बाकी राज्यों की सभी प्रदेश कांग्रेस कमेटियों को भी सभी मजदूर और कामगार भाई-बहनों की रेल यात्रा का खर्च उठाने के निर्देश दे दिए गए हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र कांग्रेस ने महाराष्ट्र से बिहार जाने वाले 4627 मजदूर भाई-बहनों की यात्रा के लिए टिकट का खर्च उठाया। इसके कारण अन्य पार्टियां और राज्य सरकारें भी ऐसे फैसले लेने के लिए प्रेरित हुई हैं। इस संकट की घड़ी ने हम सबको एक अवसर दिया है कि हम पार्टी और राजनीति से ऊपर उठकर एक दूसरे का ख्याल रखें। हमें मिलकर कोशिश करनी होगी कि पूरे देश में किसी भारतीय के साथ अन्याय ना हो। मुझे खुशी होगी अगर आप हमारे काम के बारे में अपडेट पाने के लिए ट्विटर पर हमसे @INCIndia और @ManishTewari पर जुड़ेंगे। धन्यवाद, मनीष तिवारी सांसद, श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब) राष्ट्रीय प्रवक्ता, कांग्रेस पार्टी पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री, भारत सरकार
Manoj Kumar Jha
Member of Parliament, Rajya Sabha & Spokesperson RJD
रिस्पोंस दिया गया
हमारे मज़दूर भाई-बहनों के सामूहिक पलायन का कारण अचानक हुआ लॉकडाउन था, जिसके लिए किसी को तैयारी का समय नहीं दिया गया। इससे समाज का सबसे गरीब वर्ग बुरी तरह प्रभावित है। एक तरफ सरकार ने विदेशों में फंसे लोगों को पूरी प्लानिंग और सम्मान के साथ वापस लाया तो दूसरी तरफ़ प्रवासी मज़दूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया। भारत इस वैश्विक महामारी से उबर जाएगा पर इस लॉकडाउन से हमने जो संकट पैदा किया है वो आने वाले कई सालों तक हमारे मन को कचोटता रहेगा। अचानक से लॉकडाउन करना सरकार की दूरदृष्टि की कमी को दर्शाता है। कोई भी नीति बनाने से पहले हमें ये सोचना चाहिए कि देश के आखिरी गाँव के आखिरी इंसान पर उसका क्या असर होगा। संकट के समय, घर केवल ईंट-पत्थरों का एक मकान नहीं होता, जिसमें आप छिपना चाहते हैं। बल्कि घर एक स्थान होता है जहाँ आप खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। घर पर होना अगर हमारे लिए ज़रूरी है तो हमारे मज़दूर भाई-बहनों के लिए भी। ये पलायन ना केवल रोज़गार छीन रहा है बल्कि लोगों की जानें भी छीन रहा है। लोग बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ सैंकड़ों किलोमीटर चलने को मजबूर हैं और कुछ ने इस लंबी यात्रा में थककर दम दोड़ दिया है। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा कि देश के नागरिकों के साथ ऐसा हो रहा है। सरकार प्रवासी मज़दूर शक्ति को कटघरे में खड़ा कर रही है जबकि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकार की आपातकालीन रणनीति को कटघरे में खड़ा होना चाहिए। बरेली में उनपर केमिकल के छिड़काव से हमारे मज़दूर भाई-बहनों के साथ अमानवीयता की हदें पार हो गई हैं। क्या उन्हें बताया गया कि उनके साथ क्या होने जा रहा है? क्या उन्हें कपड़े बदलने की सुविधा दी गई? क्या सरकार समाज के अन्य वर्ग के साथ भी ऐसा बर्ताव करेगी? जब मैंने शिरीन शबाना खान और सुनीता कुमारी जी की ये पेटीशन देखी तो मैंने तुरंत इसके बारे में ट्वीट किया क्योंकि मेरा भी मानना है कि सरकार को इस मुद्दे पर एक मज़बूत रणनीति बनानी होगी। वित्त मंत्री ने आपातकालीन मदद के तौर पर 500 रुपये प्रति जन धन अकाउंट में डालने की बात कही है, ये मज़ाक है। मतलब 16.60 प्रति दिन। 16.60 रुपये में आप रोज़ क्या खरीद पाएंगे? मैं हमारे मज़दूर भाई-बहनों की हालत और उनकी तकलीफों पर प्रधानमंत्री को एक मज़बूत ज्ञापन देने जा रहा हूँ। हम कोरोना वायरस से लड़ाई में उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते हैं। सादर, मनोज झा सांसद (राज्य सभा), राष्ट्रीय प्रवक्ता (आरजेडी) (Image Courtesy: Reuters/Danish Siddiqui)
Uddhav Balasaheb Thackeray
Former Chief Minister of Maharashtra
Chief Ministers of All States
Chief Ministers of All States
Amit Shah
Amit Shah
Home Minister, India

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26 मार्च 2020 पर पेटीशन बनाई गई