‘कचरे के राक्षस’ का हो अंत: प्रशासन ले गाज़ीपुर लैंडफिल की सफाई का संकल्प


‘कचरे के राक्षस’ का हो अंत: प्रशासन ले गाज़ीपुर लैंडफिल की सफाई का संकल्प
समस्या
कोई भी भारतीय घर खरीदता या खरीदती है तो यही सोचता या सोचती है कि उसकी खिड़की किसी पार्क या पहाड़ के सामने खुले। पर हमारे घर की खिड़की खुलती है तो हमारे ठीक सामने एक ‘राक्षस’ खड़ाहोताहै।ये दिखने में बहुत भयावह है और उसके ऊपर मंडराते गिद्ध उसे और खूंखार रूप देते हैं।
ये ‘कचरे का राक्षस’ और कुछ नहीं, गाज़ीपुर लैंडफिल है। गाज़ीपुर लैंडफिल, जहाँ पूरी दिल्ली का कचरा उड़ेला जाता है। ये लैंडफिल हमारे घर के ठीक सामने है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये लैंडफिल 29 फुटबॉल मैदानों जितनी बड़ी है। ये भी कहा जाता है कि ये कुतुब मीनार जितनी ऊँची है।
कुतुब मीनार को तो खैर दुनियाभर से लोग देखने आते हैं, पर ये लैंडफिल किसी से नहीं देखी जा सकती। ये लैंडफिल या कहूँ कि ‘कचरे का राक्षस’, मेरे जैसे लाखों निवासियों के लिए सांसें रोककर जीने का कारण बन गई है।
यही नहीं, लैंडफिल में सड़ते कचरे से निकलने वाली ज़हरीली गैस से लोगों के स्वास्थ्य को भी खतरा है। हमने सपनों का घर तो ले लिया पर हम उस घर की खिड़की नहीं खोल सकते। क्योंकि खिड़की खुलते ही ऐसी दुर्गंध आती है कि लोगों को उल्टी आ जाए। ज़हरीली हवा ने हमारे घर की दीवारों को काला कर दिया है, ज़रा सोचिए कि वो हमारे फेफड़ों का क्या करती होगी।
गाज़ीपुर लैंडफिल 17 साल पहले ही भर चुकी थी और उसे बंद हो जाना चाहिए था पर आज भी यहाँ रोज़ कचरा डाला जाता है। 2 साल पहले लैंडफिल का एक हिस्सा ढह गया था, जिसमें 2 लोगों की जान गई थी। इसके बावजूद इस मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
ऐसा कैसे हो सकता है कि लाखों निवासियों को ये कचरे का राक्षस नज़र आता है पर प्रशासन को नहीं। हमें इस कचरे के राक्षस से बचा लीजिए!
हमने ये पेटीशन शुरू किया है क्योंकि अब हमसे और नहीं सहा जाता। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों के फेफड़े काले हों। हम प्रशासन को नींद से जगाना चाहते हैं। हमने तो सारी उम्मीद खो दी थी पर जब पता चला कि इंदौर में ऐसे ही एक कचरे के राक्षस का सफाया कर दिया गया तो हमारी उम्मीद जाग गई।
दरअसल इंदौर के एक होनहार आईएएस अफसर ने 6 महीने के अंदर, वहां मौजूद ऐसी ही एक छोटी लैंडफिल को साफ कर के दिखाया है। आईएएस अफसर आशीष सिंह जी ने इस नामुमकिन से काम को आसानी से कर के दिखाया है।
हम सारे निवासी नगर निगम से मांग करते हैं कि वो आशीष सिंह जी को दिल्ली बुलाकर अपने कर्मचारियों के साथ ट्रेनिंग वर्कशॉप का आयोजन करें। ताकि गाज़ीपुर लैंडफिल को साफ किया जा सके।
हमारी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि हमें इस लैंडफिल की दुर्गंध से आज़ादी मिले। ताकि हम अपने सपनों के घर की खिड़की खोल सकें।
ज़रा सोचिए कि ये लैंडफिल हमारे देश की राजधानी की क्या छवि पेश करती है। ज़रा सोचिए कि ये कचरे का राक्षस कैसे स्वच्छ भारत के मिशन को कच्चा चबा रहा है। हमारी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें।
#KachraPahad #SheVotes2019
चित्र: https://images.indianexpress.com/2018/05/ghazipur.jpg

समस्या
कोई भी भारतीय घर खरीदता या खरीदती है तो यही सोचता या सोचती है कि उसकी खिड़की किसी पार्क या पहाड़ के सामने खुले। पर हमारे घर की खिड़की खुलती है तो हमारे ठीक सामने एक ‘राक्षस’ खड़ाहोताहै।ये दिखने में बहुत भयावह है और उसके ऊपर मंडराते गिद्ध उसे और खूंखार रूप देते हैं।
ये ‘कचरे का राक्षस’ और कुछ नहीं, गाज़ीपुर लैंडफिल है। गाज़ीपुर लैंडफिल, जहाँ पूरी दिल्ली का कचरा उड़ेला जाता है। ये लैंडफिल हमारे घर के ठीक सामने है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये लैंडफिल 29 फुटबॉल मैदानों जितनी बड़ी है। ये भी कहा जाता है कि ये कुतुब मीनार जितनी ऊँची है।
कुतुब मीनार को तो खैर दुनियाभर से लोग देखने आते हैं, पर ये लैंडफिल किसी से नहीं देखी जा सकती। ये लैंडफिल या कहूँ कि ‘कचरे का राक्षस’, मेरे जैसे लाखों निवासियों के लिए सांसें रोककर जीने का कारण बन गई है।
यही नहीं, लैंडफिल में सड़ते कचरे से निकलने वाली ज़हरीली गैस से लोगों के स्वास्थ्य को भी खतरा है। हमने सपनों का घर तो ले लिया पर हम उस घर की खिड़की नहीं खोल सकते। क्योंकि खिड़की खुलते ही ऐसी दुर्गंध आती है कि लोगों को उल्टी आ जाए। ज़हरीली हवा ने हमारे घर की दीवारों को काला कर दिया है, ज़रा सोचिए कि वो हमारे फेफड़ों का क्या करती होगी।
गाज़ीपुर लैंडफिल 17 साल पहले ही भर चुकी थी और उसे बंद हो जाना चाहिए था पर आज भी यहाँ रोज़ कचरा डाला जाता है। 2 साल पहले लैंडफिल का एक हिस्सा ढह गया था, जिसमें 2 लोगों की जान गई थी। इसके बावजूद इस मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
ऐसा कैसे हो सकता है कि लाखों निवासियों को ये कचरे का राक्षस नज़र आता है पर प्रशासन को नहीं। हमें इस कचरे के राक्षस से बचा लीजिए!
हमने ये पेटीशन शुरू किया है क्योंकि अब हमसे और नहीं सहा जाता। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों के फेफड़े काले हों। हम प्रशासन को नींद से जगाना चाहते हैं। हमने तो सारी उम्मीद खो दी थी पर जब पता चला कि इंदौर में ऐसे ही एक कचरे के राक्षस का सफाया कर दिया गया तो हमारी उम्मीद जाग गई।
दरअसल इंदौर के एक होनहार आईएएस अफसर ने 6 महीने के अंदर, वहां मौजूद ऐसी ही एक छोटी लैंडफिल को साफ कर के दिखाया है। आईएएस अफसर आशीष सिंह जी ने इस नामुमकिन से काम को आसानी से कर के दिखाया है।
हम सारे निवासी नगर निगम से मांग करते हैं कि वो आशीष सिंह जी को दिल्ली बुलाकर अपने कर्मचारियों के साथ ट्रेनिंग वर्कशॉप का आयोजन करें। ताकि गाज़ीपुर लैंडफिल को साफ किया जा सके।
हमारी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि हमें इस लैंडफिल की दुर्गंध से आज़ादी मिले। ताकि हम अपने सपनों के घर की खिड़की खोल सकें।
ज़रा सोचिए कि ये लैंडफिल हमारे देश की राजधानी की क्या छवि पेश करती है। ज़रा सोचिए कि ये कचरे का राक्षस कैसे स्वच्छ भारत के मिशन को कच्चा चबा रहा है। हमारी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें।
#KachraPahad #SheVotes2019
चित्र: https://images.indianexpress.com/2018/05/ghazipur.jpg

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9 फ़रवरी 2019 पर पेटीशन बनाई गई