नो पॉलिटिक्स इन ओलंपिक्स


नो पॉलिटिक्स इन ओलंपिक्स
समस्या
पीवी सिंधू और साक्षी मलिक की ओलंपिक में जीत का श्रेय लेने की देश के नेताओं में होड़ मची हुई है। वहीं दूसरी तरफ ओपी जैशा जैसी एथलीट भी हैं जो रियो में 42.195किमी लंबी मैराथन में बिना पानी पिए दौड़ती रहीं। उन्हें पानी पिलाने के लिए कोई भारतीय अधिकारी मौजूद नहीं था। वह तीन घंटे बेहोश रहीं, शरीर में पानी की कमी को दूर करने के लिए 7 बॉटल ग्लूकोज चढ़ाया गया, लेकिन उनकी सुध लेने कोई खेल अधिकारी नहीं पहुंचा। यह अंधेर नहीं तो क्या है ?
खिलाड़ियों के साथ अधिकारियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार की यह पहली और एक मात्र घटना नहीं है। इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। कई आयोजन स्थलों पर महिला खिलाड़ियों के लिए न ही अलग शौचालय की व्यवस्था होती है और न ही चेंजिंग रुम की। कई बार स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिए पानी की व्यवस्था भी नहीं होती है। नहाने के लिए भी खिलाड़ियों को खुद पानी भरकर लाना पड़ा है। खिलाड़ियों के पास आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, बावजूद इसके हर कोई चाहता है कि वे ओलंपिक में पदक हासिल करें।
रियो ओलंपिक में भारत को जिस तरह एक-एक पदक के लिए संघर्ष करना पड़ा, उससे यही जाहिर होता है भारत में खेलों का नेतृत्व सही हाथों में नहीं है। किसी तरह भारत को कुश्ती और बैडमिंटन में पदक हासिल हुए, वह भी इसलिए क्योंकि इन खेलों के विकास में सीधे तौर पर खिलाड़ी जुड़े रहे। यदि इन खेलों की कमान केवल राजनेताओं के हाथों में होती तो शायद हमें रियो से खाली हाथ लौटना पड़ता।
जिस तरह लोढ़ा कमेटी ने बीसीसीआई के ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन करने की सिफारिश की है उसी देश के अन्य खेल संघों को भी नेताओं के चंगुल से मुक्त कराने का वक्त आ गया है। खेल के नियंता बने बैठे नेताओं को केवल पद और सुविधाओं का लालच है। उन्हें न तो खिलाड़ियों की जरुरतों की समझ है और न ही दिलचस्पी। इन खेल प्रशासकों को न तो खेलों की ठोस जानकारी है, साथ ही उनके पास खेलों के विकास को लेकर कोई दूरदर्शी योजना भी नहीं है।
भारत में खेलों को गंभीरता से लेने का वक्त आ गया है। खेलों के साथ हो रहे खिलवाड़ को अब देश की जनता बर्दाश्त नहीं करेगी। अमर उजाला ने इस बार भारत में खेल संघों में बदलाव का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया है। अमर उजाला देश का जाना माना अखबार है। अमर उजाला हमेशा से सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों को उठाता रहा है। हम आपके समर्थन से इस मुहिम को आगे बढ़ाएेंगे। आइए बदलाव की इस मुहिम का हिस्सा बनें और "नो पॉलिटिक्स इन ओलंपिक्स" मुहिम का समर्थन करें।

समस्या
पीवी सिंधू और साक्षी मलिक की ओलंपिक में जीत का श्रेय लेने की देश के नेताओं में होड़ मची हुई है। वहीं दूसरी तरफ ओपी जैशा जैसी एथलीट भी हैं जो रियो में 42.195किमी लंबी मैराथन में बिना पानी पिए दौड़ती रहीं। उन्हें पानी पिलाने के लिए कोई भारतीय अधिकारी मौजूद नहीं था। वह तीन घंटे बेहोश रहीं, शरीर में पानी की कमी को दूर करने के लिए 7 बॉटल ग्लूकोज चढ़ाया गया, लेकिन उनकी सुध लेने कोई खेल अधिकारी नहीं पहुंचा। यह अंधेर नहीं तो क्या है ?
खिलाड़ियों के साथ अधिकारियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार की यह पहली और एक मात्र घटना नहीं है। इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। कई आयोजन स्थलों पर महिला खिलाड़ियों के लिए न ही अलग शौचालय की व्यवस्था होती है और न ही चेंजिंग रुम की। कई बार स्टेडियम में खिलाड़ियों के लिए पानी की व्यवस्था भी नहीं होती है। नहाने के लिए भी खिलाड़ियों को खुद पानी भरकर लाना पड़ा है। खिलाड़ियों के पास आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, बावजूद इसके हर कोई चाहता है कि वे ओलंपिक में पदक हासिल करें।
रियो ओलंपिक में भारत को जिस तरह एक-एक पदक के लिए संघर्ष करना पड़ा, उससे यही जाहिर होता है भारत में खेलों का नेतृत्व सही हाथों में नहीं है। किसी तरह भारत को कुश्ती और बैडमिंटन में पदक हासिल हुए, वह भी इसलिए क्योंकि इन खेलों के विकास में सीधे तौर पर खिलाड़ी जुड़े रहे। यदि इन खेलों की कमान केवल राजनेताओं के हाथों में होती तो शायद हमें रियो से खाली हाथ लौटना पड़ता।
जिस तरह लोढ़ा कमेटी ने बीसीसीआई के ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन करने की सिफारिश की है उसी देश के अन्य खेल संघों को भी नेताओं के चंगुल से मुक्त कराने का वक्त आ गया है। खेल के नियंता बने बैठे नेताओं को केवल पद और सुविधाओं का लालच है। उन्हें न तो खिलाड़ियों की जरुरतों की समझ है और न ही दिलचस्पी। इन खेल प्रशासकों को न तो खेलों की ठोस जानकारी है, साथ ही उनके पास खेलों के विकास को लेकर कोई दूरदर्शी योजना भी नहीं है।
भारत में खेलों को गंभीरता से लेने का वक्त आ गया है। खेलों के साथ हो रहे खिलवाड़ को अब देश की जनता बर्दाश्त नहीं करेगी। अमर उजाला ने इस बार भारत में खेल संघों में बदलाव का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया है। अमर उजाला देश का जाना माना अखबार है। अमर उजाला हमेशा से सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों को उठाता रहा है। हम आपके समर्थन से इस मुहिम को आगे बढ़ाएेंगे। आइए बदलाव की इस मुहिम का हिस्सा बनें और "नो पॉलिटिक्स इन ओलंपिक्स" मुहिम का समर्थन करें।

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24 अगस्त 2016 पर पेटीशन बनाई गई