यौन हिंसा रिपोर्टिंग में महिलाओं को बतौर शिकार दर्शाने वाली तस्वीरों का बहिष्कार करें


यौन हिंसा रिपोर्टिंग में महिलाओं को बतौर शिकार दर्शाने वाली तस्वीरों का बहिष्कार करें
समस्या
एक डरा हुआ सा चेहरा, जिस पर अंधेरे की कालिख है। एक चीखती लड़की, जिसकी चीख को हाथों से दबा दिया गया हो। फटे कपड़ों में लिपटी लड़की, मदद की गुहार लगाती लड़की की तस्वीर, इत्यादि।
मुझे यकीन है कि आपने ऐसी बहुत सारी तस्वीरें देखी होंगी। हमारा मीडिया भरा पड़ा है ऐसी तस्वीरों से। पर जानते हैं ये क्या दर्शाती हैं? चाहे वो शारिरिक हिंसा हो या मानसिक हिंसा, हर बार महिलाओं को ही कमज़ोर, निरीह, बेसहारा, लाचार दिखाया जाता है।
ऐसी हिंसा का सामना कर चुकी महिला के रूप में, मैंने जितनी बार भी इन तस्वीरों को देखा है, मुझे बुरा लगा है। मुझे ऐसा लगा है जैसे ये तस्वीरें मेरा अपमान कर रही हों। ये ना सिर्फ मेरे बल्कि हिंसा का सामना कर चुकी सभी महिलाओं और बच्चियों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि मीडिया भले ही नेक नीयत से और महिलाओं की सुरक्षा के इरादे से ऐसी खबरों की रिपोर्टिंग करता है पर मीडिया द्वारा यौन हिंसा की रिपोर्टिंग में इस्तेमाल की जाने वाली तस्वीरें इसके उलट काम करती हैं।
क्योंकि ये सारी तस्वीरें दर्शाती हैं कि महिलाएं “आसान शिकार” हैं, “कमज़ोर” हैं, और यही बलात्कार और शोषण के सबसे बड़े कारणों में से एक है। ये तस्वीरें कहीं ना कहीं महिलाओं के प्रति हिंसा को और बढ़ावा देती हैं।
आप भी मानेंगे कि अगर समाज को एक बड़ा संदेश देना है कि महिलाएं कमज़ोर नहीं, वो हिंसा का सामना करने वाली हैं, उसकी शिकार नहीं--तो मीडिया को अपनी रिपोर्टिंग का तरीका बदलना होगा।
आज की मीडिया में इतनी ताकत है कि वो समाज की सोच को बदल सकता है। जरूरत है कि हमारा मीडिया हिंसा का सामना कर चुकी महिलाओं और बच्चियों के लिए सम्मानजनक और संवेदनशील तस्वीरों का प्रयोग करे। ऐसी तस्वीरें जिसमें वो “आसान शिकार” नहीं, “निडर” नज़र आती हों।
ब्रेकथ्रू नाम की एक एनजीओ ने बड़ी मेहनत से ऐसी तस्वीरों की एक पूरी लाइब्रेरी बनाई है। यौन हिंसा, बलात्कार की खबरों के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया जा सकता है। ताकि महिलाओं को सम्मानजनक तरीके से दर्शाया जाए।
मैंने नेटवर्क 18 को संबोधित कर के इस पिटीशन की शुरुआत की है। मैं चाहती हूँ कि नेटवर्क 18 यौन हिंसा की रिपोर्टिंग में महिलाओं को शिकार के तौर पर दर्शााने वाली तस्वीरों का बहिष्कार करे। मेरी पिटीशन पर हस्ताक्षर करें और इस कोशिश को अपना समर्थन दें।
नेटवर्क 18 देश का सबसे बड़ा और सम्मानित मीडिया हाउस है। कश्मीर से लेकर केरल और असम से लेकर गुजरात, नेटवर्क 18 की पहुंच देश के कोने-कोने में है। अगर वो इस संवेदनशील मुद्दे पर एक सकारात्मक कदम उठाते हैं तो देश के बाकी मीडिया हाउस के लिए ये एक बड़ा संदेश होगा।
#MeToo अभियान के इस दौर में महिलाएं बहादुरी से शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं। ऐसे दौर में शोषण का सामना करने वाली महिला को डरा हुआ, अधेरे में छिपा हुआ दिखाना कहाँ तक जायज़ है? हमारा मीडिया इससे बेहतर कर सकने के काबिल है। संवेदनशील रिपोर्टिंग का आधार ही यही है कि उसमें संवेदनशील तस्वीरों का प्रयोग हो।
मेरी पिटीशन पर हस्ताक्षर कर इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि हिंसा का सामना कर चुकी महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता बंद हो। हिंसा के बाद किसी व्यक्ति की ज़िंदगी रुकती नहीं है, तो फिर ये तस्वीरों में क्यों ठहरी हुई दिखाई दें?
#GenderSensitiveReporting
चित्र स्त्रोत: ब्रेकथ्रू इंडिया

समस्या
एक डरा हुआ सा चेहरा, जिस पर अंधेरे की कालिख है। एक चीखती लड़की, जिसकी चीख को हाथों से दबा दिया गया हो। फटे कपड़ों में लिपटी लड़की, मदद की गुहार लगाती लड़की की तस्वीर, इत्यादि।
मुझे यकीन है कि आपने ऐसी बहुत सारी तस्वीरें देखी होंगी। हमारा मीडिया भरा पड़ा है ऐसी तस्वीरों से। पर जानते हैं ये क्या दर्शाती हैं? चाहे वो शारिरिक हिंसा हो या मानसिक हिंसा, हर बार महिलाओं को ही कमज़ोर, निरीह, बेसहारा, लाचार दिखाया जाता है।
ऐसी हिंसा का सामना कर चुकी महिला के रूप में, मैंने जितनी बार भी इन तस्वीरों को देखा है, मुझे बुरा लगा है। मुझे ऐसा लगा है जैसे ये तस्वीरें मेरा अपमान कर रही हों। ये ना सिर्फ मेरे बल्कि हिंसा का सामना कर चुकी सभी महिलाओं और बच्चियों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि मीडिया भले ही नेक नीयत से और महिलाओं की सुरक्षा के इरादे से ऐसी खबरों की रिपोर्टिंग करता है पर मीडिया द्वारा यौन हिंसा की रिपोर्टिंग में इस्तेमाल की जाने वाली तस्वीरें इसके उलट काम करती हैं।
क्योंकि ये सारी तस्वीरें दर्शाती हैं कि महिलाएं “आसान शिकार” हैं, “कमज़ोर” हैं, और यही बलात्कार और शोषण के सबसे बड़े कारणों में से एक है। ये तस्वीरें कहीं ना कहीं महिलाओं के प्रति हिंसा को और बढ़ावा देती हैं।
आप भी मानेंगे कि अगर समाज को एक बड़ा संदेश देना है कि महिलाएं कमज़ोर नहीं, वो हिंसा का सामना करने वाली हैं, उसकी शिकार नहीं--तो मीडिया को अपनी रिपोर्टिंग का तरीका बदलना होगा।
आज की मीडिया में इतनी ताकत है कि वो समाज की सोच को बदल सकता है। जरूरत है कि हमारा मीडिया हिंसा का सामना कर चुकी महिलाओं और बच्चियों के लिए सम्मानजनक और संवेदनशील तस्वीरों का प्रयोग करे। ऐसी तस्वीरें जिसमें वो “आसान शिकार” नहीं, “निडर” नज़र आती हों।
ब्रेकथ्रू नाम की एक एनजीओ ने बड़ी मेहनत से ऐसी तस्वीरों की एक पूरी लाइब्रेरी बनाई है। यौन हिंसा, बलात्कार की खबरों के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया जा सकता है। ताकि महिलाओं को सम्मानजनक तरीके से दर्शाया जाए।
मैंने नेटवर्क 18 को संबोधित कर के इस पिटीशन की शुरुआत की है। मैं चाहती हूँ कि नेटवर्क 18 यौन हिंसा की रिपोर्टिंग में महिलाओं को शिकार के तौर पर दर्शााने वाली तस्वीरों का बहिष्कार करे। मेरी पिटीशन पर हस्ताक्षर करें और इस कोशिश को अपना समर्थन दें।
नेटवर्क 18 देश का सबसे बड़ा और सम्मानित मीडिया हाउस है। कश्मीर से लेकर केरल और असम से लेकर गुजरात, नेटवर्क 18 की पहुंच देश के कोने-कोने में है। अगर वो इस संवेदनशील मुद्दे पर एक सकारात्मक कदम उठाते हैं तो देश के बाकी मीडिया हाउस के लिए ये एक बड़ा संदेश होगा।
#MeToo अभियान के इस दौर में महिलाएं बहादुरी से शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं। ऐसे दौर में शोषण का सामना करने वाली महिला को डरा हुआ, अधेरे में छिपा हुआ दिखाना कहाँ तक जायज़ है? हमारा मीडिया इससे बेहतर कर सकने के काबिल है। संवेदनशील रिपोर्टिंग का आधार ही यही है कि उसमें संवेदनशील तस्वीरों का प्रयोग हो।
मेरी पिटीशन पर हस्ताक्षर कर इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि हिंसा का सामना कर चुकी महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता बंद हो। हिंसा के बाद किसी व्यक्ति की ज़िंदगी रुकती नहीं है, तो फिर ये तस्वीरों में क्यों ठहरी हुई दिखाई दें?
#GenderSensitiveReporting
चित्र स्त्रोत: ब्रेकथ्रू इंडिया

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31 जनवरी 2019 पर पेटीशन बनाई गई