हिंदी हो भारत की राष्ट्रभाषा। महात्मा गांधी व भीमरावअंबेडकर का देश राष्ट्रभाषा विहीन क्यों

समस्या

हिंदी हो भारत की राष्ट्रभाषा । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारतीय संविधान के अमर शिल्पी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का देश, अब तक राष्ट्रभाषा विहीन क्यों ? भारत में भारतीय भाषाओं का सर्वोच्च सम्मान सुनिश्चित होना ही चाहिए ।

प्यारे देशवासियों,

भारत ! हमारी मातृभूमि । विश्व की प्राचीनतम जीवित सभ्यता ।  एक आध्यात्मिक राष्ट्र । ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के कारण लंबे समय तक विश्व-गुरु की पदवी से विभूषित राष्ट्र, भारत । दुनिया को शांति व अहिंसा जैसे अनगिनत पाठ पढ़ाने वाला प्रथम राष्ट्र, भारत । श्री राम, श्री कृष्ण, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गार्गी, मैत्रेयी, मीरां बाई, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जैसे अनगिनत विभूतियों की जन्मभूमि भारत । इसके अलावा भारत पूर्णतः आधुनिक अर्थों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र भी है । इसी कड़ी में भारत की एक और पहचान भी है जो निश्चय ही गर्व करने योग्य नहीं है, लेकिन सच है । राष्ट्रभाषा-विहीन एक राष्ट्र, भारत । भारतीय भाषाओं के ऊपर एक विदेशी भाषा अँग्रेजी को वरीयता देने वाला राष्ट्र – भारत ।

भारतीय स्वतंत्रता-आंदोलन के दौरान समस्त भारत की एक आवाज़ बनकर जो भाषा उभरी, उसका नाम है – हिंदी । कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से बंगाल तथा अरुणाचल प्रदेश तक भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा का नाम है – हिंदी । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न राष्ट्र-नायकों की श्रेणी में यदि कोई भाषा खड़ी हो सकती है, तो निश्चय ही वह हिंदी होगी । क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रव्यापी और लोकप्रिय बनाने में हिंदी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है । हिंदी की इसी राष्ट्रव्यापी भूमिका को ध्यान में रखकर पहले-पहल स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही महात्मा गांधी ने यह महसूस किया कि भारत की एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए । साथ ही, हिंदी के अखिल भारतीय प्रसार को ध्यान में रखकर महात्मा गांधी समेत भारत के समस्त राजनेताओं तथा भाषाविदों ने उस समय यह माना कि भारतीय भाषाओं में हिंदी अथवा हिन्दुस्तानी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है । हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने को लेकर समस्त भारत में लगभग आम सहमति थी ।

लेकिन जैसे ही भारत के स्वतंत्र होने की संभावना बलवती हुई, स्वतंत्र एवं संप्रभु भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ, गैर-हिंदी-भाषी प्रदेशों के नेतृत्व की ओर से हिंदी के विरोध में स्वर मुखर होने लगे । स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े स्वप्नों में से एक, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के प्रश्न पर, संविधान सभा एकमत नहीं रह सकी, बल्कि दो हिस्सों में बंट गई । हिंदी के समर्थक और हिंदी के विरोधी । हिंदी के विरोध का आधार इस आशंका को बनाया गया कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं का विकास तो अवरुद्ध हो ही जाएगा, कालांतर में अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो जाएगा । राष्ट्रभाषा का प्रश्न संविधान सभा में सर्वाधिक विवादास्पद मुद्दा बन गया । इस विवाद के तात्कालिक निदान के रूप में ‘मुंशी-आयंगर फार्मूला’ सामने आया । इसके तहत राष्ट्रभाषा के स्थान पर भारत की सभी प्रमुख भाषाओं को सम्मान देने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय भाषाओं’ की संकल्पना सामने रखी गई और संविधान में ‘आठवीं अनुसूची’ का प्रावधान किया गया । वर्तमान में इस अनुसूची में कुल 22 भारतीय भाषाएँ हैं । और उसी फार्मूला के तहत अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा की क्षमता और भूमिका, दोनों को ध्यान में रखकर हिंदी को राजभाषा का पद प्रदान किया गया । साथ ही, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी की अक्षमता को मुद्दा बनाते हुए संविधान लागू होने के समय अर्थात् 26 जनवरी 1950 से 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी को सहायक राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्वीकृति मिल गई । लेकिन कालांतर में देश के विभिन्न हिस्सों में भाषा-विवाद इतना अधिक गहराया कि यह पंद्रह वर्ष आज तक समाप्त नहीं हुआ है । हालाँकि व्यावहारिक स्थिति इससे ठीक उलट है जो और अधिक चिंताजनक है; स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजी ही प्रमुख राजभाषा बनी रही और हिंदी को खानापूर्ति मात्र के लिए कथित राजभाषा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा ।

भारत को ब्रिटिश पराधीनता से मुक्त हुए 73 वर्ष पूरे हो चुके हैं । भारत में संविधान लागू हुए भी 70 वर्ष हो गए । अभी हम 21वीं शताब्दी के तीसरे दशक के बिल्कुल प्रारंभ में हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेवारी संघ अर्थात् केंद्र सरकार को दी गई है । प्रचार-प्रसार से तात्पर्य इतना ही नहीं है कि किन नए क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होने लगा ? ‘प्रसार’ का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए ? यही न कि हिंदी एक सक्षम एवं सशक्त राजभाषा के रूप में पूरी तरह से स्थापित हो जाए । लेकिन वस्तुस्थिति इससे पूर्णतः अलग है । इन 73 वर्षों में कई राजनीतिक दलों की सरकार बनी । उनमें से कुछ सरकारों ने हिंदी की उन्नति के नाम पर सिवाय खानापूर्ति के कुछ नहीं किया । कुछ सरकारें ऐसी भी आईं जो हिंदी की उन्नति के प्रति वास्तव में सजग और संवेदनशील थीं । फिर भी परिणाम बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं है । आज भी हिंदी भारत की एकमात्र राजभाषा बनने के अपने संवैधानिक अधिकार से मीलों दूर है । हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । स्वतंत्रता के बाद विशेषतः संविधान लागू होने के बाद तो भारत के राजनीतिक विमर्श से राष्ट्रभाषा हिंदी का मुद्दा गायब ही हो गया । लेकिन बिना राष्ट्रभाषा के किसी राष्ट्र की कल्पना भी की जा सकती है ? और इसमें क्या विवाद हो सकता है कि भारत की राष्ट्रभाषा कोई भारतीय भाषा ही हो सकती है, कोई विदेशी भाषा नहीं, भले ही वह अंतरराष्ट्रीय भाषा ही क्यों न हो !

मैं यह मानती हूँ कि 1947 में भारत राजनीतिक रूप से भले ही स्वतंत्र हो गया हो लेकिन सांस्कृतिक रूप से आज भी भारत पराधीन है । व्यावहारिक रूप से भारत की ‘प्रमुख राजभाषा’ के रूप में अंग्रेजी की उपस्थिति वास्तव में भारत की औपनिवेशिक दासता की पहचान है । वर्तमान भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व ने केवल हिंदी का नुकसान किया हो, ऐसा नहीं है । हिंदी तो अपनी प्राणवत्ता, जिजीविषा, जनसंख्या तथा न्यूनाधिक राजकीय संरक्षण के कारण, सीमित संदर्भों में ही सही, पल्लवित-पुष्पित होती रही है । लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं का तो और भी बुरा हाल है । विगत 29 जुलाई 2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ को अपनी स्वीकृति प्रदान की । इस शिक्षा नीति की धारा 22.5 तथा 22.6 में भी लगभग सभी भारतीय भाषाओं की चिंताजनक अवस्था को रेखांकित किया गया है –

“दुर्भाग्य से, भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई जिसके तहत देश ने विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया है । यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को ‘लुप्तप्राय’ घोषित किया है । - - - इसके अलावा, वे भारतीय भाषाएँ भी, जो आधिकारिक रूप से लुप्तप्राय की सूची में नहीं हैं – जैसे आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ वे भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं ।” आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ, जिसमें हिंदी भी शामिल है, कहने के लिए तो ‘राष्ट्रीय भाषाएँ’ हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि उनमें से अधिकांश तो प्रांत-विशेष की और कुछ तो एक प्रांत के क्षेत्र-विशेष की भाषा बनकर रह गई है । आठवीं अनुसूची के अलावा जो सैकड़ों भारतीय भाषाएँ हैं, उनमें से अधिकांश का तो अस्तित्व खतरे में है । मेरा यह दृढ़ मत है कि किसी एक भारतीय भाषा के राष्ट्रभाषा बनने से ही अन्य सभी भारतीय भाषाओं का समुचित विकास संभव है । अंग्रेजी के वर्चस्व का वर्तमान वातावरण अंततः सभी भारतीय भाषाओं के लिए नुकसानदायक है ।

भारतीय भाषाओं की उन्नति के संदर्भ में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ से मुझे और समस्त देशवासियों को बहुत अधिक उम्मीदें हैं । इस शिक्षा नीति की धारा 22.17 में भारत सरकार ने यह संकल्प लिया है कि “शास्त्रीय, आदिवासी और लुप्तप्राय भाषाओं सहित सभी भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के प्रयास नए जोश के साथ किए जाएंगे ।” यह संकल्प केवल सरकार तक सीमित नहीं रहना चाहिए । भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान के इस महायज्ञ में हम सभी देशवासियों को अपनी आहुति देनी है । हमारे लिए यह स्वर्णिम अवसर है जब केंद्र सरकार और विभिन्न प्रांतों की सरकारें भी समस्त भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान के लिए सजग, संवेदनशील और निरंतर प्रयासरत हैं । अब भारतीय जनमानस को सक्रिय और सचेत होने की आवश्यकता है । यही सही समय है जब सभी भारतवासी एकजुट होकर भाषा संबंधी सभी विवादों का एकसाथ निराकरण कर लें । इसके लिए जो भी आवश्यक हो, अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए । भाषा-विवाद का स्थायी समाधान निकालने के लिए एक विस्तृत भाषा-नीति की आवश्यकता है ।

भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान का मुद्दा हो या राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा का मुद्दा हो, अनंत काल तक इसे ठंडे वस्ते में नहीं रखा जा सकता । भाषा-विवाद को सुलझाने के लिए संसद और सड़क को एक साथ आना होगा । इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर के जन-जागरण की आवश्यकता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है । लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है । यद्यपि लोकतंत्र में बहुमत ही महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन मेरी सदिच्छा है कि भाषा के निम्नलिखित प्रश्नों पर पूरा भारत एकमत हो जाए –

  • भारत में भारतीयता एवं भारतीय भाषाओं का सर्वोच्च सम्मान सुनिश्चित होना चाहिए ।
  • केंद्र सरकार को भारतीयता एवं देशभक्ति से ओत-प्रोत  सुस्पष्ट भाषा-नीति की विधिवत घोषणा करनी चाहिए ।
  • भारत को औपनिवेशिक दासता की सांस्कृतिक पहचान अंग्रेजी भाषा की बाध्यता से अविलंब मुक्ति मिलनी चाहिए ।
  • संवैधानिक भावनाओं का सम्मान करते हुए हिंदी को जल्द-से-जल्द भारत की एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाना चाहिए ।
  • आध्यात्मिक एवं आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ बनाने के लिए हिंदी को अंततः राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए ।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हमें सामूहिक प्रयास करना होगा । हमें अब यथास्थितिवाद अर्थात् ‘जो चल रहा है चलने दो’ की मनोदशा से बाहर निकलना होगा । महात्मा गांधी ने ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के सभापति पद से 1918 में कहा था –

“मुझे खेद तो यह है कि जिन प्रांतों की मातृभाषा हिंदी है, वहाँ भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखाई देता है । - - - हम अपने देश में अपने महत् कार्य विदेशी भाषा में करते हैं । मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम हिंदी भाषा की राष्ट्रीय और अपनी अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं ।”

महात्मा गाँधी जिस स्वराज्य अथवा ग्राम-स्वराज की स्थापना की कल्पना करते थे और वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जिस आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न देख रहे हैं, उसे साकार करने के लिए भारत की अपनी राष्ट्रभाषा का होना अति-आवश्यक है । स्वदेशी भाषा में ही स्वराज संभव है । पराई अथवा विदेशी भाषा का वर्चस्व रहते भारत आत्मनिर्भर कैसे हो सकता है ! अभी यह कृतज्ञ राष्ट्र अपने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जन्म का सार्धशती (150वां) समारोह मना रहा है । यह सर्वाधिक उचित अवसर है, जब सभी देशवासियों को एकजुट होकर महात्मा गाँधी के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए । 2022 में भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूरे हो जाएंगे । इस अवसर पर एक ओर तो हम अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का 75वां उत्सव पूरे उल्लास और उमंग से मना रहे होंगे, वहीं दूसरी ओर इस वास्तविकता से भी अपना मुंह नहीं मोड़ सकेंगे कि अभी तक हमारा राष्ट्र भाषायी रूप से पराधीन ही है । आइए एकसाथ मिलकर हम अपने स्वाभिमान को प्राप्त करें और अपने प्राणों  से भी प्यारे इस महान राष्ट्र को राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान करें ।

मैं सभी देशवासियों से विनम्र आग्रह करती हूँ कि भारतीय भाषाओं के सर्वोच्च सम्मान के लिए एकजुट हों । लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है । लोकतंत्र में जिस मांग को व्यापक जन-समर्थन प्राप्त हो उसकी आपूर्ति में देर नहीं लगती । हमें अपने कदम-से-कदम और कंधे-से-कंधा मिलाकर अपनी मातृभूमि के लिए राष्ट्रभाषा की मांग करनी चाहिए । मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आपने मेरी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी और हमने एकसाथ मिलकर, एक सुर में राष्ट्रभाषा के लिए बोलना शुरू कर दिया, तो लोकतांत्रिक सत्ता के शीर्ष पर बैठे संवेदनशील जन-प्रतिनिधियों को जन-भावनाओं के अनुरूप जन-जन की लोकप्रिय हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना ही होगा ।

इस दिशा में जन-जागरूकता अभियान के तहत अनेकानेक अखिल भारतीय रचनात्मक कार्यक्रमों की शृंखला शुरू की जा रही है । अभी कोविड-19 की वैश्विक महामारी को ध्यान में रखते हुए, Change.org नामक अंतरराष्ट्रीय मंच के माध्यम से अखिल भारतीय हस्ताक्षर अभियान का प्रारंभ किया जा रहा है । एक बार पुनः मैं सभी देशवासियों से विनम्र अनुरोध करती हूँ कि लाखों-करोड़ों की संख्या में इस देशव्यापी अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें ताकि इस पुनीत-पावन आध्यात्मिक एवं स्वाभिमानी आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की भी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो ।

जय हिंद । वंदे मातरम् ।

आपके सहयोग एवं समर्थन की आशा में,

डॉ. रमा

प्राचार्या

हंसराज कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय ।

संपर्क सूत्र : drramahrc65@gmail.com

 

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डॉ. रमा (Dr. Rama)पेटीशन स्टार्टरप्राचार्या, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।

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समस्या

हिंदी हो भारत की राष्ट्रभाषा । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारतीय संविधान के अमर शिल्पी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का देश, अब तक राष्ट्रभाषा विहीन क्यों ? भारत में भारतीय भाषाओं का सर्वोच्च सम्मान सुनिश्चित होना ही चाहिए ।

प्यारे देशवासियों,

भारत ! हमारी मातृभूमि । विश्व की प्राचीनतम जीवित सभ्यता ।  एक आध्यात्मिक राष्ट्र । ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के कारण लंबे समय तक विश्व-गुरु की पदवी से विभूषित राष्ट्र, भारत । दुनिया को शांति व अहिंसा जैसे अनगिनत पाठ पढ़ाने वाला प्रथम राष्ट्र, भारत । श्री राम, श्री कृष्ण, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गार्गी, मैत्रेयी, मीरां बाई, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जैसे अनगिनत विभूतियों की जन्मभूमि भारत । इसके अलावा भारत पूर्णतः आधुनिक अर्थों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र भी है । इसी कड़ी में भारत की एक और पहचान भी है जो निश्चय ही गर्व करने योग्य नहीं है, लेकिन सच है । राष्ट्रभाषा-विहीन एक राष्ट्र, भारत । भारतीय भाषाओं के ऊपर एक विदेशी भाषा अँग्रेजी को वरीयता देने वाला राष्ट्र – भारत ।

भारतीय स्वतंत्रता-आंदोलन के दौरान समस्त भारत की एक आवाज़ बनकर जो भाषा उभरी, उसका नाम है – हिंदी । कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से बंगाल तथा अरुणाचल प्रदेश तक भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा का नाम है – हिंदी । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न राष्ट्र-नायकों की श्रेणी में यदि कोई भाषा खड़ी हो सकती है, तो निश्चय ही वह हिंदी होगी । क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रव्यापी और लोकप्रिय बनाने में हिंदी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है । हिंदी की इसी राष्ट्रव्यापी भूमिका को ध्यान में रखकर पहले-पहल स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही महात्मा गांधी ने यह महसूस किया कि भारत की एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए । साथ ही, हिंदी के अखिल भारतीय प्रसार को ध्यान में रखकर महात्मा गांधी समेत भारत के समस्त राजनेताओं तथा भाषाविदों ने उस समय यह माना कि भारतीय भाषाओं में हिंदी अथवा हिन्दुस्तानी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है । हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने को लेकर समस्त भारत में लगभग आम सहमति थी ।

लेकिन जैसे ही भारत के स्वतंत्र होने की संभावना बलवती हुई, स्वतंत्र एवं संप्रभु भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ, गैर-हिंदी-भाषी प्रदेशों के नेतृत्व की ओर से हिंदी के विरोध में स्वर मुखर होने लगे । स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े स्वप्नों में से एक, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के प्रश्न पर, संविधान सभा एकमत नहीं रह सकी, बल्कि दो हिस्सों में बंट गई । हिंदी के समर्थक और हिंदी के विरोधी । हिंदी के विरोध का आधार इस आशंका को बनाया गया कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं का विकास तो अवरुद्ध हो ही जाएगा, कालांतर में अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो जाएगा । राष्ट्रभाषा का प्रश्न संविधान सभा में सर्वाधिक विवादास्पद मुद्दा बन गया । इस विवाद के तात्कालिक निदान के रूप में ‘मुंशी-आयंगर फार्मूला’ सामने आया । इसके तहत राष्ट्रभाषा के स्थान पर भारत की सभी प्रमुख भाषाओं को सम्मान देने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय भाषाओं’ की संकल्पना सामने रखी गई और संविधान में ‘आठवीं अनुसूची’ का प्रावधान किया गया । वर्तमान में इस अनुसूची में कुल 22 भारतीय भाषाएँ हैं । और उसी फार्मूला के तहत अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा की क्षमता और भूमिका, दोनों को ध्यान में रखकर हिंदी को राजभाषा का पद प्रदान किया गया । साथ ही, अंग्रेजी की तुलना में हिंदी की अक्षमता को मुद्दा बनाते हुए संविधान लागू होने के समय अर्थात् 26 जनवरी 1950 से 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी को सहायक राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्वीकृति मिल गई । लेकिन कालांतर में देश के विभिन्न हिस्सों में भाषा-विवाद इतना अधिक गहराया कि यह पंद्रह वर्ष आज तक समाप्त नहीं हुआ है । हालाँकि व्यावहारिक स्थिति इससे ठीक उलट है जो और अधिक चिंताजनक है; स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजी ही प्रमुख राजभाषा बनी रही और हिंदी को खानापूर्ति मात्र के लिए कथित राजभाषा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा ।

भारत को ब्रिटिश पराधीनता से मुक्त हुए 73 वर्ष पूरे हो चुके हैं । भारत में संविधान लागू हुए भी 70 वर्ष हो गए । अभी हम 21वीं शताब्दी के तीसरे दशक के बिल्कुल प्रारंभ में हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेवारी संघ अर्थात् केंद्र सरकार को दी गई है । प्रचार-प्रसार से तात्पर्य इतना ही नहीं है कि किन नए क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होने लगा ? ‘प्रसार’ का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए ? यही न कि हिंदी एक सक्षम एवं सशक्त राजभाषा के रूप में पूरी तरह से स्थापित हो जाए । लेकिन वस्तुस्थिति इससे पूर्णतः अलग है । इन 73 वर्षों में कई राजनीतिक दलों की सरकार बनी । उनमें से कुछ सरकारों ने हिंदी की उन्नति के नाम पर सिवाय खानापूर्ति के कुछ नहीं किया । कुछ सरकारें ऐसी भी आईं जो हिंदी की उन्नति के प्रति वास्तव में सजग और संवेदनशील थीं । फिर भी परिणाम बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं है । आज भी हिंदी भारत की एकमात्र राजभाषा बनने के अपने संवैधानिक अधिकार से मीलों दूर है । हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । स्वतंत्रता के बाद विशेषतः संविधान लागू होने के बाद तो भारत के राजनीतिक विमर्श से राष्ट्रभाषा हिंदी का मुद्दा गायब ही हो गया । लेकिन बिना राष्ट्रभाषा के किसी राष्ट्र की कल्पना भी की जा सकती है ? और इसमें क्या विवाद हो सकता है कि भारत की राष्ट्रभाषा कोई भारतीय भाषा ही हो सकती है, कोई विदेशी भाषा नहीं, भले ही वह अंतरराष्ट्रीय भाषा ही क्यों न हो !

मैं यह मानती हूँ कि 1947 में भारत राजनीतिक रूप से भले ही स्वतंत्र हो गया हो लेकिन सांस्कृतिक रूप से आज भी भारत पराधीन है । व्यावहारिक रूप से भारत की ‘प्रमुख राजभाषा’ के रूप में अंग्रेजी की उपस्थिति वास्तव में भारत की औपनिवेशिक दासता की पहचान है । वर्तमान भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व ने केवल हिंदी का नुकसान किया हो, ऐसा नहीं है । हिंदी तो अपनी प्राणवत्ता, जिजीविषा, जनसंख्या तथा न्यूनाधिक राजकीय संरक्षण के कारण, सीमित संदर्भों में ही सही, पल्लवित-पुष्पित होती रही है । लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं का तो और भी बुरा हाल है । विगत 29 जुलाई 2020 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ को अपनी स्वीकृति प्रदान की । इस शिक्षा नीति की धारा 22.5 तथा 22.6 में भी लगभग सभी भारतीय भाषाओं की चिंताजनक अवस्था को रेखांकित किया गया है –

“दुर्भाग्य से, भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई जिसके तहत देश ने विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया है । यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को ‘लुप्तप्राय’ घोषित किया है । - - - इसके अलावा, वे भारतीय भाषाएँ भी, जो आधिकारिक रूप से लुप्तप्राय की सूची में नहीं हैं – जैसे आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ वे भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं ।” आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ, जिसमें हिंदी भी शामिल है, कहने के लिए तो ‘राष्ट्रीय भाषाएँ’ हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि उनमें से अधिकांश तो प्रांत-विशेष की और कुछ तो एक प्रांत के क्षेत्र-विशेष की भाषा बनकर रह गई है । आठवीं अनुसूची के अलावा जो सैकड़ों भारतीय भाषाएँ हैं, उनमें से अधिकांश का तो अस्तित्व खतरे में है । मेरा यह दृढ़ मत है कि किसी एक भारतीय भाषा के राष्ट्रभाषा बनने से ही अन्य सभी भारतीय भाषाओं का समुचित विकास संभव है । अंग्रेजी के वर्चस्व का वर्तमान वातावरण अंततः सभी भारतीय भाषाओं के लिए नुकसानदायक है ।

भारतीय भाषाओं की उन्नति के संदर्भ में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ से मुझे और समस्त देशवासियों को बहुत अधिक उम्मीदें हैं । इस शिक्षा नीति की धारा 22.17 में भारत सरकार ने यह संकल्प लिया है कि “शास्त्रीय, आदिवासी और लुप्तप्राय भाषाओं सहित सभी भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के प्रयास नए जोश के साथ किए जाएंगे ।” यह संकल्प केवल सरकार तक सीमित नहीं रहना चाहिए । भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान के इस महायज्ञ में हम सभी देशवासियों को अपनी आहुति देनी है । हमारे लिए यह स्वर्णिम अवसर है जब केंद्र सरकार और विभिन्न प्रांतों की सरकारें भी समस्त भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान के लिए सजग, संवेदनशील और निरंतर प्रयासरत हैं । अब भारतीय जनमानस को सक्रिय और सचेत होने की आवश्यकता है । यही सही समय है जब सभी भारतवासी एकजुट होकर भाषा संबंधी सभी विवादों का एकसाथ निराकरण कर लें । इसके लिए जो भी आवश्यक हो, अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए । भाषा-विवाद का स्थायी समाधान निकालने के लिए एक विस्तृत भाषा-नीति की आवश्यकता है ।

भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान का मुद्दा हो या राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा का मुद्दा हो, अनंत काल तक इसे ठंडे वस्ते में नहीं रखा जा सकता । भाषा-विवाद को सुलझाने के लिए संसद और सड़क को एक साथ आना होगा । इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर के जन-जागरण की आवश्यकता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है । लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है । यद्यपि लोकतंत्र में बहुमत ही महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन मेरी सदिच्छा है कि भाषा के निम्नलिखित प्रश्नों पर पूरा भारत एकमत हो जाए –

  • भारत में भारतीयता एवं भारतीय भाषाओं का सर्वोच्च सम्मान सुनिश्चित होना चाहिए ।
  • केंद्र सरकार को भारतीयता एवं देशभक्ति से ओत-प्रोत  सुस्पष्ट भाषा-नीति की विधिवत घोषणा करनी चाहिए ।
  • भारत को औपनिवेशिक दासता की सांस्कृतिक पहचान अंग्रेजी भाषा की बाध्यता से अविलंब मुक्ति मिलनी चाहिए ।
  • संवैधानिक भावनाओं का सम्मान करते हुए हिंदी को जल्द-से-जल्द भारत की एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाना चाहिए ।
  • आध्यात्मिक एवं आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ बनाने के लिए हिंदी को अंततः राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए ।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हमें सामूहिक प्रयास करना होगा । हमें अब यथास्थितिवाद अर्थात् ‘जो चल रहा है चलने दो’ की मनोदशा से बाहर निकलना होगा । महात्मा गांधी ने ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के सभापति पद से 1918 में कहा था –

“मुझे खेद तो यह है कि जिन प्रांतों की मातृभाषा हिंदी है, वहाँ भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखाई देता है । - - - हम अपने देश में अपने महत् कार्य विदेशी भाषा में करते हैं । मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम हिंदी भाषा की राष्ट्रीय और अपनी अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं ।”

महात्मा गाँधी जिस स्वराज्य अथवा ग्राम-स्वराज की स्थापना की कल्पना करते थे और वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जिस आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न देख रहे हैं, उसे साकार करने के लिए भारत की अपनी राष्ट्रभाषा का होना अति-आवश्यक है । स्वदेशी भाषा में ही स्वराज संभव है । पराई अथवा विदेशी भाषा का वर्चस्व रहते भारत आत्मनिर्भर कैसे हो सकता है ! अभी यह कृतज्ञ राष्ट्र अपने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जन्म का सार्धशती (150वां) समारोह मना रहा है । यह सर्वाधिक उचित अवसर है, जब सभी देशवासियों को एकजुट होकर महात्मा गाँधी के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए । 2022 में भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूरे हो जाएंगे । इस अवसर पर एक ओर तो हम अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का 75वां उत्सव पूरे उल्लास और उमंग से मना रहे होंगे, वहीं दूसरी ओर इस वास्तविकता से भी अपना मुंह नहीं मोड़ सकेंगे कि अभी तक हमारा राष्ट्र भाषायी रूप से पराधीन ही है । आइए एकसाथ मिलकर हम अपने स्वाभिमान को प्राप्त करें और अपने प्राणों  से भी प्यारे इस महान राष्ट्र को राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान करें ।

मैं सभी देशवासियों से विनम्र आग्रह करती हूँ कि भारतीय भाषाओं के सर्वोच्च सम्मान के लिए एकजुट हों । लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है । लोकतंत्र में जिस मांग को व्यापक जन-समर्थन प्राप्त हो उसकी आपूर्ति में देर नहीं लगती । हमें अपने कदम-से-कदम और कंधे-से-कंधा मिलाकर अपनी मातृभूमि के लिए राष्ट्रभाषा की मांग करनी चाहिए । मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आपने मेरी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिला दी और हमने एकसाथ मिलकर, एक सुर में राष्ट्रभाषा के लिए बोलना शुरू कर दिया, तो लोकतांत्रिक सत्ता के शीर्ष पर बैठे संवेदनशील जन-प्रतिनिधियों को जन-भावनाओं के अनुरूप जन-जन की लोकप्रिय हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना ही होगा ।

इस दिशा में जन-जागरूकता अभियान के तहत अनेकानेक अखिल भारतीय रचनात्मक कार्यक्रमों की शृंखला शुरू की जा रही है । अभी कोविड-19 की वैश्विक महामारी को ध्यान में रखते हुए, Change.org नामक अंतरराष्ट्रीय मंच के माध्यम से अखिल भारतीय हस्ताक्षर अभियान का प्रारंभ किया जा रहा है । एक बार पुनः मैं सभी देशवासियों से विनम्र अनुरोध करती हूँ कि लाखों-करोड़ों की संख्या में इस देशव्यापी अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें ताकि इस पुनीत-पावन आध्यात्मिक एवं स्वाभिमानी आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की भी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो ।

जय हिंद । वंदे मातरम् ।

आपके सहयोग एवं समर्थन की आशा में,

डॉ. रमा

प्राचार्या

हंसराज कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय ।

संपर्क सूत्र : drramahrc65@gmail.com

 

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डॉ. रमा (Dr. Rama)पेटीशन स्टार्टरप्राचार्या, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।

फैसला लेने वाले

श्री राम नाथ कोविन्द
श्री राम नाथ कोविन्द
माननीय राष्ट्रपति, भारतीय गणराज्य
श्री एम. वेंकैया नायडु
श्री एम. वेंकैया नायडु
माननीय उपराष्ट्रपति, भारतीय गणराज्य
श्री नरेंद्र मोदी
श्री नरेंद्र मोदी
माननीय प्रधानमंत्री, भारतीय गणराज्य
श्री अमित शाह
श्री अमित शाह
माननीय गृह मंत्री, भारत सरकार
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक
माननीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार
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17 सितंबर 2020 पर पेटीशन बनाई गई