मेरी लैंगिक पहचान के कारण मुझे नौकरी से निकाला गया; न्याय की लड़ाई में मेरा साथ दें


मेरी लैंगिक पहचान के कारण मुझे नौकरी से निकाला गया; न्याय की लड़ाई में मेरा साथ दें
समस्या
मेरे पास Masters की डिग्री है और मैंने B.ed भी किया है, लेकिन लखीमपुर खीरी में स्थित ‘उमा देवी चिल्ड्रन्स एकेडमी’ नामक एक प्राइवट स्कूल के लिए मेरे प्रोफेशनल स्किल्स मायने नहीं रखता। उनके लिए तो सिर्फ़ ये मायने रखता है कि मैं एक ट्रांसजेंडर महिला हूँ।
मैंने स्कूल में TGT सोशल स्टडीज के पद के लिए अप्लाई किया था और मूल्यांकन के चार राउंड को सफलतापूर्वक पास भी किया। स्कूल प्रशासन ने मुझे इस शर्त पर नौकरी दी कि मैं अपनी लैंगिक पहचान स्कूल के बाक़ी स्टाफ और छात्रों से छुपा कर रखूँगी। मेरी आर्थिक स्थिति कमजोर है और मुझे नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी। इसलिए मैंने ये समझौता करने का फ़ैसला लिया। लेकिन ज्वोईनिंग के एक हफ़्ते के अंदर ही मुझे काम के दौरान मानसिक रूप से बेहद तनाव का सामना करना पड़ा।
स्कूल में मेरी नियुक्ति, उनके लिए एक मौक़ा था जहां वो अपने छात्रों व अन्य स्टाफ़ को ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के बारे में संवेदनशील बना सकते थे। इसके बजाय, उन्होंने मुझे अपनी पहचान छुपाने के लिए मजबूर किया। ये स्पष्ट रूप से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के खिलाफ जाता है।
मैं अपनी लैंगिक पहचान के बारे किसी से बात नहीं करूँगी लेकिन अपने शरीर को कैसे छुपाऊँगी? एक क्लास से दूसरी क्लास जाते समय छात्र खुलेआम मेरा – यानी उनके टीचर – का मज़ाक उड़ाते थे, मुझे ‘हिजड़ा’ कहकर मुझपर हंसते थे। मैं कोशिश करती थी कि बच्चों की इन बातों को दिल पे न लूँ, बल्कि उनके लिए एक सेफ़ स्पेस बनाकर उन्हें ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के बारे में शिक्षित करूँ और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील बना सकूँ।
एक मौक़े पर मैंने एक छात्र के साथ तर्क करने की कोशिश के दौरान उसे अपनी लैंगिक पहचान के बारे में बताया, तो ये बात तुरंत स्कूल के अन्य लोगों तक पहुँछ गई। प्रिन्सिपल ने मुझ पर आरोप लगाया कि नियुक्ति के दौरान मैंने अपनी पहचान छुपाने का जो वादा किया था, उसे मैंने तोड़ा है। मैंने प्रशासन से गुहार लगाई कि वे मुझे पढ़ाने दें, मुझे नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी। लेकिन उन्होंने मेरी गुहार नहीं सुनी। मुझे उसी दिन हॉस्टल खाली करने को कह दिया गया। 3 दिसंबर को रात करीब 9 बजे लखीमपुर खीरी के सुनसान बस स्टॉप से मैंने बस पकड़ी और वापस दिल्ली लौट गई। मेरी लैंगिक पहचान के कारण मुझे नौकरी से बर्खास्त करने में स्कूल को सिर्फ एक हफ़्ते का समय लगा!
दो दिन बाद, स्कूल ने मुझे एक औपचारिक टर्मिनेशन पत्र भेजा। 3 दिसंबर को लिखे गए उस पत्र में, वो दावा कर रहे हैं कि उन्होंने मुझे बर्खास्त इसलिए किया क्योंकि मैं एक अच्छी सोशल स्टडीज की टीचर नहीं थी।
पत्र में लिखा था कि, "हमारे साथ आपकी सेवा अवधि के दौरान हमने पाया कि आप अपने मुख्य विषय के साथ हर रोज चुनौतियों का सामना कर रहीं हैं, चूंकि हमें एक प्रमुख सामाजिक विज्ञान शिक्षक की आवश्यकता है और बोर्ड की कक्षाएं आवंटित की जानी हैं, हम जोखिम नहीं उठा सकते हैं, इसलिए हम आपको इस पद से मुक्त कर रहे हैं। जब हमें मुख्य अंग्रेजी भाषा के शिक्षक की आवश्यकता होगी, तो हम आपको वापिस स्कूल में ज़रूर देखना चाहेंगे।”
मैंने इंटर्व्यू के चार राउंड पास करके ये पद अर्जित किया था। और सिर्फ़ एक हफ़्ते में, स्कूल को अचानक एहसास हुआ कि मैं एक अच्छा टीचर नहीं थी। बेशक, उन्होंने जो मुझे स्कूल के स्टाफ़ व छात्रों से मेरी पहचान को छुपाने को कहाँ था, वो टर्मिनेशन पत्र में नही लिखा था। ये जुबानी बातें थीं जिन्हें कागज़ पर उतारने की वे हिम्मत नहीं कर सकते थे।
अतीत में, मैंने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड से संपर्क कर के उनसे उनके सभी ऑनलाइन नौकरी आवेदन पत्रों में विकल्प के रूप में 'ट्रांसजेंडर' जोड़ने के लिए कहा था, और मेरी कोशिश सफल भी हुई थी। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, मैंने ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर काम किया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे पास अंग्रेजी में Masters की डिग्री है और सामाजिक विज्ञान पढ़ाने में विशेषज्ञता के साथ B.Ed की भी डिग्री है। फिर भी, उमा देवी चिल्ड्रन एकेडमी, लखीमपुर खीरी में टीजीटी सोशल साइंस पढ़ाने के लिए मैं फ़िट नहीं हूँ!
मेरी मांग है कि स्कूल मुझे तुरंत टीजीटी सोशल साइंस के पद पर बहाल करे। प्रशासन को ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के बारे में अपने स्टाफ़ और छात्रों को संवेदनशील बनाए, और एक कम्प्लेंट सेल स्थापित करे जो की कैंपस में ट्रांसजेंडर शिक्षक और बच्चों का समर्थन करे।
मैं आपसे आग्रह करती हूं कि इस पेटीशन पर साइन करें ताकि हम साथ मिलकर ये सुनिश्चित कर सकें कि 21वीं सदी के भारत में ट्रांसजेंडर लोगों को अपने सबसे बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष न करना पड़े।
9,691
समस्या
मेरे पास Masters की डिग्री है और मैंने B.ed भी किया है, लेकिन लखीमपुर खीरी में स्थित ‘उमा देवी चिल्ड्रन्स एकेडमी’ नामक एक प्राइवट स्कूल के लिए मेरे प्रोफेशनल स्किल्स मायने नहीं रखता। उनके लिए तो सिर्फ़ ये मायने रखता है कि मैं एक ट्रांसजेंडर महिला हूँ।
मैंने स्कूल में TGT सोशल स्टडीज के पद के लिए अप्लाई किया था और मूल्यांकन के चार राउंड को सफलतापूर्वक पास भी किया। स्कूल प्रशासन ने मुझे इस शर्त पर नौकरी दी कि मैं अपनी लैंगिक पहचान स्कूल के बाक़ी स्टाफ और छात्रों से छुपा कर रखूँगी। मेरी आर्थिक स्थिति कमजोर है और मुझे नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी। इसलिए मैंने ये समझौता करने का फ़ैसला लिया। लेकिन ज्वोईनिंग के एक हफ़्ते के अंदर ही मुझे काम के दौरान मानसिक रूप से बेहद तनाव का सामना करना पड़ा।
स्कूल में मेरी नियुक्ति, उनके लिए एक मौक़ा था जहां वो अपने छात्रों व अन्य स्टाफ़ को ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के बारे में संवेदनशील बना सकते थे। इसके बजाय, उन्होंने मुझे अपनी पहचान छुपाने के लिए मजबूर किया। ये स्पष्ट रूप से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के खिलाफ जाता है।
मैं अपनी लैंगिक पहचान के बारे किसी से बात नहीं करूँगी लेकिन अपने शरीर को कैसे छुपाऊँगी? एक क्लास से दूसरी क्लास जाते समय छात्र खुलेआम मेरा – यानी उनके टीचर – का मज़ाक उड़ाते थे, मुझे ‘हिजड़ा’ कहकर मुझपर हंसते थे। मैं कोशिश करती थी कि बच्चों की इन बातों को दिल पे न लूँ, बल्कि उनके लिए एक सेफ़ स्पेस बनाकर उन्हें ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के बारे में शिक्षित करूँ और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील बना सकूँ।
एक मौक़े पर मैंने एक छात्र के साथ तर्क करने की कोशिश के दौरान उसे अपनी लैंगिक पहचान के बारे में बताया, तो ये बात तुरंत स्कूल के अन्य लोगों तक पहुँछ गई। प्रिन्सिपल ने मुझ पर आरोप लगाया कि नियुक्ति के दौरान मैंने अपनी पहचान छुपाने का जो वादा किया था, उसे मैंने तोड़ा है। मैंने प्रशासन से गुहार लगाई कि वे मुझे पढ़ाने दें, मुझे नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी। लेकिन उन्होंने मेरी गुहार नहीं सुनी। मुझे उसी दिन हॉस्टल खाली करने को कह दिया गया। 3 दिसंबर को रात करीब 9 बजे लखीमपुर खीरी के सुनसान बस स्टॉप से मैंने बस पकड़ी और वापस दिल्ली लौट गई। मेरी लैंगिक पहचान के कारण मुझे नौकरी से बर्खास्त करने में स्कूल को सिर्फ एक हफ़्ते का समय लगा!
दो दिन बाद, स्कूल ने मुझे एक औपचारिक टर्मिनेशन पत्र भेजा। 3 दिसंबर को लिखे गए उस पत्र में, वो दावा कर रहे हैं कि उन्होंने मुझे बर्खास्त इसलिए किया क्योंकि मैं एक अच्छी सोशल स्टडीज की टीचर नहीं थी।
पत्र में लिखा था कि, "हमारे साथ आपकी सेवा अवधि के दौरान हमने पाया कि आप अपने मुख्य विषय के साथ हर रोज चुनौतियों का सामना कर रहीं हैं, चूंकि हमें एक प्रमुख सामाजिक विज्ञान शिक्षक की आवश्यकता है और बोर्ड की कक्षाएं आवंटित की जानी हैं, हम जोखिम नहीं उठा सकते हैं, इसलिए हम आपको इस पद से मुक्त कर रहे हैं। जब हमें मुख्य अंग्रेजी भाषा के शिक्षक की आवश्यकता होगी, तो हम आपको वापिस स्कूल में ज़रूर देखना चाहेंगे।”
मैंने इंटर्व्यू के चार राउंड पास करके ये पद अर्जित किया था। और सिर्फ़ एक हफ़्ते में, स्कूल को अचानक एहसास हुआ कि मैं एक अच्छा टीचर नहीं थी। बेशक, उन्होंने जो मुझे स्कूल के स्टाफ़ व छात्रों से मेरी पहचान को छुपाने को कहाँ था, वो टर्मिनेशन पत्र में नही लिखा था। ये जुबानी बातें थीं जिन्हें कागज़ पर उतारने की वे हिम्मत नहीं कर सकते थे।
अतीत में, मैंने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड से संपर्क कर के उनसे उनके सभी ऑनलाइन नौकरी आवेदन पत्रों में विकल्प के रूप में 'ट्रांसजेंडर' जोड़ने के लिए कहा था, और मेरी कोशिश सफल भी हुई थी। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, मैंने ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर काम किया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे पास अंग्रेजी में Masters की डिग्री है और सामाजिक विज्ञान पढ़ाने में विशेषज्ञता के साथ B.Ed की भी डिग्री है। फिर भी, उमा देवी चिल्ड्रन एकेडमी, लखीमपुर खीरी में टीजीटी सोशल साइंस पढ़ाने के लिए मैं फ़िट नहीं हूँ!
मेरी मांग है कि स्कूल मुझे तुरंत टीजीटी सोशल साइंस के पद पर बहाल करे। प्रशासन को ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के बारे में अपने स्टाफ़ और छात्रों को संवेदनशील बनाए, और एक कम्प्लेंट सेल स्थापित करे जो की कैंपस में ट्रांसजेंडर शिक्षक और बच्चों का समर्थन करे।
मैं आपसे आग्रह करती हूं कि इस पेटीशन पर साइन करें ताकि हम साथ मिलकर ये सुनिश्चित कर सकें कि 21वीं सदी के भारत में ट्रांसजेंडर लोगों को अपने सबसे बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष न करना पड़े।
9,691
9 दिसंबर 2022 पर पेटीशन बनाई गई