'फरिश्ते दिल्ली के' योजना में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टिंग को भी प्रोत्साहित करें

'फरिश्ते दिल्ली के' योजना में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टिंग को भी प्रोत्साहित करें

समस्या

“आसपास बहुत सारे लोग थे, लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं, किसी ने कुछ किया नहीं!”

जब बात महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा की होती है तो हम सबने ये बातें कभी ना कभी सुनी हैं। चाहे वो 2012 का दिल्ली गैंगरेप केस रहा हो या 2017 में नए साल के मौके पर बैंगलोर में महिलाओं के साथ छेड़छाड़। निर्भया ने अकेले सड़कों पर ना जाने कितना समय बिताया था, इससे पहले कि किसी ने कुछ किया, उसकी मदद की।

ये तो बस कुछ उदाहरण हैं, हम सबके साथ जीवन में कभी ना कभी ऐसा हुआ होगा, जहाँ हम बोल सकते थे पर नहीं बोले, जहाँ हम कुछ कर सकते थे पर नहीं किया। हम उसे अनदेखा करके आगे बढ़ गए।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हिसाब से 2018-2019 में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराध में 7.3% की बढ़ोतरी हुई। विंग्स 2018 की रिपोर्ट के अनुसार हर 4 में से 1 किशोरी को ये डर लगा रहता है कि उनके साथ सार्वजनिक जगहों पर कभी भी किसी भी तरह की हिंसा हो सकती है-- शारीरिक हिंसा, अपहरण यहाँ तक की रेप जैसे अपराध हो सकते हैं। 2013 में UN Women एवं ICRW की एक रिपोर्ट में दिल्ली की 95% महिलाओं ने कहा कि वो सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।

महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए कई सारे कदम उठाने पड़ते हैं, जिसमें नीतिगत बदलाव, इत्यादि शामिल है। इसका एक महत्वपूर्ण अंग बाईस्टैंडर सपोर्ट भी है। बाईस्टैंडर का मतलब आसपास की भीड़। किसी भी व्यक्ति के साथ कुछ घटना होती है तो उसके आसपास की भीड़ का उससे एक गहरा संबंध होता है। यदि वो हिंसा को लेकर अपनी जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से समझता/समझती है तो शायद हिंसा को तत्काल रोका जो सकता है।

महिलाओं के साथ हिंसा के संदर्भ में ऐसा नहीं है कि आसपास खड़ी भीड़ उसके खिलाफ़ कुछ करना या बोलना नहीं चाहती। बात दरअसल ये है कि ये भीड़ कोर्ट-कचहरी, पुलिसिया कार्यवाही से डरती है, हिंसा का दोष खुद पर आ जाने से डरती है। बहुत से लोगों को जानकारी भी नहीं होती कि ऐसी परिस्थिति में वो क्या करें या सही कदम क्या होगा?

दिल्ली में रहने वाली एक महिला के रूप में मैं अपनी सरकार से चाहती हूँ कि वो ये कदम उठाए:

2019 में दिल्ली सरकार ने ‘फरिश्ते दिल्ली के’ नाम से एक योजना शुरू की, जिसमें यदि कोई व्यक्ति सड़क हादसे, एसिड अटैक एवं आग की चपेट में आए लोगों को अस्पताल पहुँचाते हैं तो ऐसे व्यक्ति को 2000 रुपये की प्रोत्साहन राशि एवं नेक नागरिक होने का प्रमाण-पत्र मिलता है। ऐसे व्यक्ति पुलिस के सवालों के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।

इस योजना के पायलट प्रजोक्ट के काफ़ी बढ़िया नतीजे देखने को मिले थे, इसके तहत 3000 ज़िंदगियाँ बचाई जा सकी थीं।

तो फिर क्यों नहीं इस योजना के दायरे को बढ़ाया जाए और इसमें सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा रोकने को भी जोड़ दिया जाए। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा करने से ना केवल महिला सुरक्षा की दिशा में अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे बल्कि इससे हमारे सार्वजनिक स्थान महिलाओं और बच्चियों के लिए सुरक्षित बन सकेंगे।

मेरी दिल्ली सरकार से मांग है कि वो मेरी पेटीशन में उठाई मांग पर विचार करें और लोगों को प्रोत्साहित करें कि वो महिला सुरक्षा की दिशा में आगे आएं। मेरी पेटीशन साइन करें और जितना हो सके शेयर करें।

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Richa Singhपेटीशन स्टार्टर
यह पेटीशन 61,906 हस्ताक्षर जुट गई

समस्या

“आसपास बहुत सारे लोग थे, लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं, किसी ने कुछ किया नहीं!”

जब बात महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा की होती है तो हम सबने ये बातें कभी ना कभी सुनी हैं। चाहे वो 2012 का दिल्ली गैंगरेप केस रहा हो या 2017 में नए साल के मौके पर बैंगलोर में महिलाओं के साथ छेड़छाड़। निर्भया ने अकेले सड़कों पर ना जाने कितना समय बिताया था, इससे पहले कि किसी ने कुछ किया, उसकी मदद की।

ये तो बस कुछ उदाहरण हैं, हम सबके साथ जीवन में कभी ना कभी ऐसा हुआ होगा, जहाँ हम बोल सकते थे पर नहीं बोले, जहाँ हम कुछ कर सकते थे पर नहीं किया। हम उसे अनदेखा करके आगे बढ़ गए।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हिसाब से 2018-2019 में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराध में 7.3% की बढ़ोतरी हुई। विंग्स 2018 की रिपोर्ट के अनुसार हर 4 में से 1 किशोरी को ये डर लगा रहता है कि उनके साथ सार्वजनिक जगहों पर कभी भी किसी भी तरह की हिंसा हो सकती है-- शारीरिक हिंसा, अपहरण यहाँ तक की रेप जैसे अपराध हो सकते हैं। 2013 में UN Women एवं ICRW की एक रिपोर्ट में दिल्ली की 95% महिलाओं ने कहा कि वो सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।

महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए कई सारे कदम उठाने पड़ते हैं, जिसमें नीतिगत बदलाव, इत्यादि शामिल है। इसका एक महत्वपूर्ण अंग बाईस्टैंडर सपोर्ट भी है। बाईस्टैंडर का मतलब आसपास की भीड़। किसी भी व्यक्ति के साथ कुछ घटना होती है तो उसके आसपास की भीड़ का उससे एक गहरा संबंध होता है। यदि वो हिंसा को लेकर अपनी जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से समझता/समझती है तो शायद हिंसा को तत्काल रोका जो सकता है।

महिलाओं के साथ हिंसा के संदर्भ में ऐसा नहीं है कि आसपास खड़ी भीड़ उसके खिलाफ़ कुछ करना या बोलना नहीं चाहती। बात दरअसल ये है कि ये भीड़ कोर्ट-कचहरी, पुलिसिया कार्यवाही से डरती है, हिंसा का दोष खुद पर आ जाने से डरती है। बहुत से लोगों को जानकारी भी नहीं होती कि ऐसी परिस्थिति में वो क्या करें या सही कदम क्या होगा?

दिल्ली में रहने वाली एक महिला के रूप में मैं अपनी सरकार से चाहती हूँ कि वो ये कदम उठाए:

2019 में दिल्ली सरकार ने ‘फरिश्ते दिल्ली के’ नाम से एक योजना शुरू की, जिसमें यदि कोई व्यक्ति सड़क हादसे, एसिड अटैक एवं आग की चपेट में आए लोगों को अस्पताल पहुँचाते हैं तो ऐसे व्यक्ति को 2000 रुपये की प्रोत्साहन राशि एवं नेक नागरिक होने का प्रमाण-पत्र मिलता है। ऐसे व्यक्ति पुलिस के सवालों के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।

इस योजना के पायलट प्रजोक्ट के काफ़ी बढ़िया नतीजे देखने को मिले थे, इसके तहत 3000 ज़िंदगियाँ बचाई जा सकी थीं।

तो फिर क्यों नहीं इस योजना के दायरे को बढ़ाया जाए और इसमें सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा रोकने को भी जोड़ दिया जाए। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा करने से ना केवल महिला सुरक्षा की दिशा में अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे बल्कि इससे हमारे सार्वजनिक स्थान महिलाओं और बच्चियों के लिए सुरक्षित बन सकेंगे।

मेरी दिल्ली सरकार से मांग है कि वो मेरी पेटीशन में उठाई मांग पर विचार करें और लोगों को प्रोत्साहित करें कि वो महिला सुरक्षा की दिशा में आगे आएं। मेरी पेटीशन साइन करें और जितना हो सके शेयर करें।

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Richa Singhपेटीशन स्टार्टर

फैसला लेने वाले

Manish Sisodia
Deputy Chief Minister of Delhi

पेटीशन अपडेट

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7 फ़रवरी 2021 पर पेटीशन बनाई गई