मध्य प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिये निःशुल्क नैपकिन उपलब्ध हों


मध्य प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिये निःशुल्क नैपकिन उपलब्ध हों
समस्या
“देखो उसकी फ्रॉक पर खून लगा है!”
मुझे पहली बार पीरियड्स स्कूल के अंदर ही आए। मैं उस वक्त 10वीं कक्षा में थी ।
मुझे अच्छे से याद है उस दिन शनिवार था क्योंकि मैं यूनिफॉर्म की जगह अपनी पसंदीदा सफेद रंग की झालर वाली फ्रॉक पहन कर गई थी। उसपर खून के धब्बे लग गए थे। मुझसे पहले मेरी फ्रॉक को मेरे सर और बाकी बच्चों ने देखा। वो मुझे इशारा कर रहे थे पर मुझे समझ नहीं आ रहा था मेरे साथ आखिर हो क्या रहा था ?
मैं बुरी तरह डर गई थी। मुझे तुरंत घर जाने के लिए कहा गया। मैं माँ के पास आते ही रोने लगी। माँ ने मेरी पीठ सहलाई, चुप कराया और माहवारी(पीरियड्स) क्या होती है यह समझाने का प्रयास किया।
उस एक घटना ने मुझपर इतना गहरा असर किया, मैं इतनी शर्मिंदगी महसूस करने लगी कि सोचा स्कूल ही जाना छोड़ दूँ। उसके बाद से स्कूल में मेरी उपस्थिति बहुत कम हो गई खासकर पीरियड्स में तो मैं कभी नहीं जाती थी और अपनी डेट के कुछ दिन पहले ही स्कूल जाना बंद कर देती थी।
इस बीच जब बोर्ड की परीक्षा आई तो मैं ऐसे में दो तरह के मानसिक तनाव से गुज़र रही थी एक तो परीक्षा के दुसरा पीरियड्स के क्यूंकि मेरी डेट नजदीक ही थी और रोल नम्बर में साफ लिखा था परीक्षा में सिर्फ पेन और रोल नम्बर ही ले जाने अनुमति थी और मुझे अच्छे से पता था स्कूल में पैड उपलब्ध नहीं होते हैं फिर ऐसे में परीक्षा केंद्र पर ही पीरियड्स आए तो क्या करूँगी ?बहुत सारे लोगों के सामने तमाशा बनेगा । मैं इतना डर गई थी कि पीरियड्स के बिना भी लगातार तीन परीक्षा मैंने पैड लगाकर दी।
जो मेरे साथ हुआ, मैं ऐसा किसी लड़की के साथ होते नहीं देखना चाहती। मैंने ये पेटीशन अपने राज्य की लड़कियों को उस तकलीफ़ और तनाव से मुक्त कराने के लिए शुरू की है जिससे मैं गुज़री। कृपया मेरी पेटीशन साइन करें और अपने व्यक्तियों से ज़रूर शेयर करें।
उस समय मुझे लगता था कि ये अकेले मेरा अनुभव है, पर जब बड़े हुए, दुनिया देखी तो जानकर दुख हुआ कि कई लड़कियों का अनुभव भी ऐसा ही है।
मेरी कहानी अकेली मेरी नहीं बल्कि मेरे राज्य मध्य प्रदेश की कई महिलाओं और बच्चियों की कहानी थी।
- एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में लगभग दो करोड़ से भी ज़्यादा लड़कियों का स्कूल जाना पीरियड्स के कारण छूट जाता है। जिसमें प्रमुख कारण सैनिटरी पैड का उपलब्ध ना होना और सुविधाओं की कमी है साफ़ सफाई के लिए पानी साबुन बाथरूम तक नहीं है
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में 15-24 वर्ष की लड़कियां 57.6 % पीरियड्स के समय स्वच्छता अपनाती हैं वहीं हमारे मध्यप्रदेश का हाल और बुरा है सिर्फ 37.4% लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्वच्छता अपनाती हैं । - एक रिपोर्ट के अनुसार 71% लड़कियों का कहना है कि उन्हें पहले पीरियड्स के विषय में पहले से कोई जानकारी नहीं थी ।
- 82 एनजीओ संगठनों का कहना है कोविड में सैनिटरी पैड की और अधिक कमी आई है और पैड व माहवारी से जुड़ी सेवाओं का अभाव लड़कियों की शिक्षा में पहले से कहीं बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है। यदि हमारी सरकारें इसको प्राथमिकता बना लें तो लाखों लड़कियों का जीवन संवर सकता है।
मध्यप्रदेश में हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी को लोग स्नेह से मामा कहते हैं। वो भी प्रदेश की बेटियों को अपनी भांजी कहकर संबोधित करते हैं। मैं अपने ‘मामा’ जी से अनुरोध कर रही हूँ कि एमपी की अपनी सभी भांजियों को मध्य प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में निशुल्क पैड उपलब्ध हों ।
कृपया मेरी पेटीशन साइन करें और शेयर करें ताकि सरकार प्रदेश की लड़कियों के लिए ये सकारात्मक कदम उठाए जिससे वो शिक्षित भी होंगी और स्वस्थ भी।
#MaahvariNaHoBhaari

समस्या
“देखो उसकी फ्रॉक पर खून लगा है!”
मुझे पहली बार पीरियड्स स्कूल के अंदर ही आए। मैं उस वक्त 10वीं कक्षा में थी ।
मुझे अच्छे से याद है उस दिन शनिवार था क्योंकि मैं यूनिफॉर्म की जगह अपनी पसंदीदा सफेद रंग की झालर वाली फ्रॉक पहन कर गई थी। उसपर खून के धब्बे लग गए थे। मुझसे पहले मेरी फ्रॉक को मेरे सर और बाकी बच्चों ने देखा। वो मुझे इशारा कर रहे थे पर मुझे समझ नहीं आ रहा था मेरे साथ आखिर हो क्या रहा था ?
मैं बुरी तरह डर गई थी। मुझे तुरंत घर जाने के लिए कहा गया। मैं माँ के पास आते ही रोने लगी। माँ ने मेरी पीठ सहलाई, चुप कराया और माहवारी(पीरियड्स) क्या होती है यह समझाने का प्रयास किया।
उस एक घटना ने मुझपर इतना गहरा असर किया, मैं इतनी शर्मिंदगी महसूस करने लगी कि सोचा स्कूल ही जाना छोड़ दूँ। उसके बाद से स्कूल में मेरी उपस्थिति बहुत कम हो गई खासकर पीरियड्स में तो मैं कभी नहीं जाती थी और अपनी डेट के कुछ दिन पहले ही स्कूल जाना बंद कर देती थी।
इस बीच जब बोर्ड की परीक्षा आई तो मैं ऐसे में दो तरह के मानसिक तनाव से गुज़र रही थी एक तो परीक्षा के दुसरा पीरियड्स के क्यूंकि मेरी डेट नजदीक ही थी और रोल नम्बर में साफ लिखा था परीक्षा में सिर्फ पेन और रोल नम्बर ही ले जाने अनुमति थी और मुझे अच्छे से पता था स्कूल में पैड उपलब्ध नहीं होते हैं फिर ऐसे में परीक्षा केंद्र पर ही पीरियड्स आए तो क्या करूँगी ?बहुत सारे लोगों के सामने तमाशा बनेगा । मैं इतना डर गई थी कि पीरियड्स के बिना भी लगातार तीन परीक्षा मैंने पैड लगाकर दी।
जो मेरे साथ हुआ, मैं ऐसा किसी लड़की के साथ होते नहीं देखना चाहती। मैंने ये पेटीशन अपने राज्य की लड़कियों को उस तकलीफ़ और तनाव से मुक्त कराने के लिए शुरू की है जिससे मैं गुज़री। कृपया मेरी पेटीशन साइन करें और अपने व्यक्तियों से ज़रूर शेयर करें।
उस समय मुझे लगता था कि ये अकेले मेरा अनुभव है, पर जब बड़े हुए, दुनिया देखी तो जानकर दुख हुआ कि कई लड़कियों का अनुभव भी ऐसा ही है।
मेरी कहानी अकेली मेरी नहीं बल्कि मेरे राज्य मध्य प्रदेश की कई महिलाओं और बच्चियों की कहानी थी।
- एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में लगभग दो करोड़ से भी ज़्यादा लड़कियों का स्कूल जाना पीरियड्स के कारण छूट जाता है। जिसमें प्रमुख कारण सैनिटरी पैड का उपलब्ध ना होना और सुविधाओं की कमी है साफ़ सफाई के लिए पानी साबुन बाथरूम तक नहीं है
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में 15-24 वर्ष की लड़कियां 57.6 % पीरियड्स के समय स्वच्छता अपनाती हैं वहीं हमारे मध्यप्रदेश का हाल और बुरा है सिर्फ 37.4% लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्वच्छता अपनाती हैं । - एक रिपोर्ट के अनुसार 71% लड़कियों का कहना है कि उन्हें पहले पीरियड्स के विषय में पहले से कोई जानकारी नहीं थी ।
- 82 एनजीओ संगठनों का कहना है कोविड में सैनिटरी पैड की और अधिक कमी आई है और पैड व माहवारी से जुड़ी सेवाओं का अभाव लड़कियों की शिक्षा में पहले से कहीं बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है। यदि हमारी सरकारें इसको प्राथमिकता बना लें तो लाखों लड़कियों का जीवन संवर सकता है।
मध्यप्रदेश में हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी को लोग स्नेह से मामा कहते हैं। वो भी प्रदेश की बेटियों को अपनी भांजी कहकर संबोधित करते हैं। मैं अपने ‘मामा’ जी से अनुरोध कर रही हूँ कि एमपी की अपनी सभी भांजियों को मध्य प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में निशुल्क पैड उपलब्ध हों ।
कृपया मेरी पेटीशन साइन करें और शेयर करें ताकि सरकार प्रदेश की लड़कियों के लिए ये सकारात्मक कदम उठाए जिससे वो शिक्षित भी होंगी और स्वस्थ भी।
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29 मई 2021 पर पेटीशन बनाई गई