याचिका बंद हो गई

आइए खड़े हों, हिन्दी के विनाश के विरुद्ध

यह मुद्दा 610 हस्ताक्षर जुट गये


महोदय,

यह याचिका संविधान की आठवीं अनुसूची की यथा स्थिति को बनाए रखने और भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियों को आठवीं अनुसूची से बाहर रखने के लिए है।

वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की ‘पावर लेंग्वेज इंडेक्स’, जो कि प्रभावशाली भाषाओं की अंतर्राष्ट्रीय सूची है, में हिन्दी ही  एकमात्र भारतीय भाषा है, जो वैश्विक संगठनों में, ‘राष्ट्र-राज्य’ की ‘भाषिक शक्ति’ के रूप में स्वीकृत हो सकती है।

हिन्दी की बोलियों को भाषाओं का दर्जा देकर हिन्दी के विरुद्ध खड़ी करने की मुहिम, आधिकारिक तौर पर हिन्दी भाषियों की संख्या घटाने का प्रयास है। बोलियों को भाषा का दर्जा देना ‘स्थानीयता’ के ‘अहम’ की तुष्टि तो करेगा, लेकिन, इससे एक बड़े जनतंत्र की भाषा के ध्वंस की औपनिवेशिक रणनीति ही सफल होगी। इस विघटन से, भारत सरकार के आंकड़ों से ही यह प्रमाणित किया जा सकेगा कि हिन्दी, विश्व की दूसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बावजूद एक नगण्य भाषा है और इसमें बोलने वाले कुछ करोड़ ही हैं। इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी के दावे को कमजोर किया जा सकेगा।

भाषाओं को उसकी बोलियों से लड़ाने का प्रयास अँग्रेजी द्वारा फ्रांस, जर्मनी, जापान और अफ्रीका में भी चलाया जा रहा है। यह भूमंडलीकरण की आड़ में हिन्दी को नष्ट करने की अँग्रेजी की नव-साम्राज्यवादी व्यूह-रचना है।

हिन्दी भाषी समाज, घर में बोलियों का प्रयोग करता है और विचार-विमर्श, लिखना-पढ़ना आदि हिन्दी में। किसी भी बोली को भाषा का दर्जा देना एक राजनीतिक और सामाजिक निर्णय ही है। भाषा विज्ञान के अनुसार अगर किसी भी स्थानीय बोली में कहा गया, मानक भाषा हिन्दी में समझा जा सकता है, और मानक भाषा में कहा-लिखा उस स्थानीय बोली में समझा जा सकता है, तो उस स्थानीय बोली को एक अलग भाषा का दर्जा देने की आवश्यकता नहीं है।

अतः आपसे अनुरोध है कि भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियों को आठवीं अनुसूची से बाहर रख आठवीं अनुसूची की यथा स्थिति बनाए रखें।

भवदीय।

पुनर्वसु जोशी (पी॰एच॰डी॰, नैनोटेक्नालॉंजी, यू॰एस॰ए॰), हिन्दी बचाओ मंच

 

Dear Sir,

This is a petition requesting to maintain status quo of the Eighth Schedule of Constitution of India and to keep regional dialects such as Bhojpuri, Rajasthani etc. out from the same.

There is only one Indian language which makes into World Economic Forum’s Power Language Index which ranks world’s most influential languages. This Indian language which can fulfill the role of ‘linguistic power’ of a ‘Nation-State’ in world organizations is Hindi.

The campaign to pitch Hindi’s dialects against Hindi, by granting them the status of an ‘Schedule Language’ is an effort to reduce the number of Hindi speaking people. By breaking up Hindi this way, it would be easier to prove by using official statistics of Government of India that Hindi is only a minor language and is spoken by only a few million people in India. This way Hindi’s claim for acceptance in world organizations could be easily weakened. Granting dialects such a status would not only please the ‘ego’ of ‘regionalism’ but would also unwittingly aid an imperialistic strategy to destroy one of the major languages of a large democracy.

Attempts to pitch a language against its dialect are also going on in France, Germany, Japan and some African countries as well. This is a neo-imperialistic tactic to promote the English language by destroying Hindi under the aegis of globalization.

Furthermore, the decision to grant an ‘Schedule Language’ status to any dialect is a political and a social one. As per Linguistics, if people speaking in a regional dialect can understand and communicate in its standard language and vice-versa, then it is not necessary to grant an ‘Schedule  Langauge’ status to that regional dialect.

Hence, it is requested once again to maintain status quo of Eighth Schedule of Constitution of India and to keep the regional dialects such as Bhojpuri, Rajasthani etc. out from the same.

Yours Sincerely

Punarvasu Joshi (Ph. D. Nanotechnology, USA) Hindi Bacho Manch        

 



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