तालिबान से बचकर भाग रहीं सभी अफ़गान महिलाओं और बच्चों को तुरंत शरण दें


तालिबान से बचकर भाग रहीं सभी अफ़गान महिलाओं और बच्चों को तुरंत शरण दें
समस्या
सितम्बर 2020 में तालिबान ने मेरी कज़न बहन फ़रिश्ता को मार डाला।
उसका गुनाह सिर्फ़ ये था की वो अपने देश में शिक्षा और अन्य अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही थी।
जो महिलाएँ सपने देखने की हिम्मत कर तालिबान के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं उन सबके साथ यही होता है। मेरी पेटीशन साइन करें और अफ़ग़ानिस्तान की अन्य महिलाओं और बच्चों को इस सज़ा से बचाएं।
मेरा नाम अदीबा है और मैं मध्य अफ़ग़ानिस्तान से हूँ। 99.8% मार्क्स के साथ मैं अपने स्कूल की टॉपर थी और मुझे हेरात यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस पढ़ने का मौक़ा मिला। मैं हमेशा से ही एक डॉक्टर बनना चाहती थी।
फरिश्ता की तरह मेरी मां भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो लैंगिक समानता के मुद्दे पर काम करती थीं। उन्हें भी तालीबान द्वारा जान से मारने की धमकी मिली। पल भर में हमारी पूरी दुनिया बदल गई। हमने तुरंत भारत में आने के लिए वीज़ा का आवेदन किया और नवंबर 2019 तक हम दिल्ली पहुँच गए। हमने हमारा पंजीकरण यूएनएचसीआर (UNHCR) में कराया और अब हम भारत में शरणार्थी का दर्जा मिलने का इंतेज़ार कर रहें हैं।
भारत में हमारा जीवन बेहतर और सुरक्षित है। महिला होने के नाते हम कम से कम जो चाहें पहन सकते हैं, किसी पुरुष के बिना बाहर अकेले घूम सकते हैं, आगे पढ़ सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, बैंक में खाते खोल सकते हैं, कार चला सकते हैं। तालिबान के होते इनमें से कोई भी चीज अब अफगानिस्तान में करना संभव नहीं है। जो कोई भी तालिबान के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाता है उसे जेल में डाल दिया जाता है या मार दिया जाता है।
आज मैं दिल्ली के एक क्लिनिक में अनुवादक के रूप में काम कर रही हूं, मेरा दिल और दुआएं मेरे देशवासियों के साथ हैं। अफगानिस्तान से आ रही खबरें और वीडियो को देखकर मेरी रातों की नींद उड़ गई है। मैं फरिश्ता को तो नहीं बचा सकी लेकिन वहां की महिलाओं और बच्चों के लिए कुछ तो कर ज़रूर सकती हूँ।
मेरी पेटीशन साइन करें और भारत सरकार एवं अन्य देश के लीडरों से निवेदन करें की वे जल्द से जल्द तालिबान से भाग रही सभी अफ़गान महिलाओं और बच्चों को शरण दें।
मैंने चेंज डॉट ओर्ग पर ये पेटीशन फ़रिश्ता की याद में शुरू की है क्यूँकि मुझे यक़ीन है की पेटीशन द्वारा मुझे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का समर्थन मिल पाएगा। आप में से हर कोई अगर अपनी आवाज़ उठाएगा तो हमारी माँग ज़रूर सुनी जाएगी।
समस्या
सितम्बर 2020 में तालिबान ने मेरी कज़न बहन फ़रिश्ता को मार डाला।
उसका गुनाह सिर्फ़ ये था की वो अपने देश में शिक्षा और अन्य अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही थी।
जो महिलाएँ सपने देखने की हिम्मत कर तालिबान के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं उन सबके साथ यही होता है। मेरी पेटीशन साइन करें और अफ़ग़ानिस्तान की अन्य महिलाओं और बच्चों को इस सज़ा से बचाएं।
मेरा नाम अदीबा है और मैं मध्य अफ़ग़ानिस्तान से हूँ। 99.8% मार्क्स के साथ मैं अपने स्कूल की टॉपर थी और मुझे हेरात यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस पढ़ने का मौक़ा मिला। मैं हमेशा से ही एक डॉक्टर बनना चाहती थी।
फरिश्ता की तरह मेरी मां भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो लैंगिक समानता के मुद्दे पर काम करती थीं। उन्हें भी तालीबान द्वारा जान से मारने की धमकी मिली। पल भर में हमारी पूरी दुनिया बदल गई। हमने तुरंत भारत में आने के लिए वीज़ा का आवेदन किया और नवंबर 2019 तक हम दिल्ली पहुँच गए। हमने हमारा पंजीकरण यूएनएचसीआर (UNHCR) में कराया और अब हम भारत में शरणार्थी का दर्जा मिलने का इंतेज़ार कर रहें हैं।
भारत में हमारा जीवन बेहतर और सुरक्षित है। महिला होने के नाते हम कम से कम जो चाहें पहन सकते हैं, किसी पुरुष के बिना बाहर अकेले घूम सकते हैं, आगे पढ़ सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, बैंक में खाते खोल सकते हैं, कार चला सकते हैं। तालिबान के होते इनमें से कोई भी चीज अब अफगानिस्तान में करना संभव नहीं है। जो कोई भी तालिबान के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाता है उसे जेल में डाल दिया जाता है या मार दिया जाता है।
आज मैं दिल्ली के एक क्लिनिक में अनुवादक के रूप में काम कर रही हूं, मेरा दिल और दुआएं मेरे देशवासियों के साथ हैं। अफगानिस्तान से आ रही खबरें और वीडियो को देखकर मेरी रातों की नींद उड़ गई है। मैं फरिश्ता को तो नहीं बचा सकी लेकिन वहां की महिलाओं और बच्चों के लिए कुछ तो कर ज़रूर सकती हूँ।
मेरी पेटीशन साइन करें और भारत सरकार एवं अन्य देश के लीडरों से निवेदन करें की वे जल्द से जल्द तालिबान से भाग रही सभी अफ़गान महिलाओं और बच्चों को शरण दें।
मैंने चेंज डॉट ओर्ग पर ये पेटीशन फ़रिश्ता की याद में शुरू की है क्यूँकि मुझे यक़ीन है की पेटीशन द्वारा मुझे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का समर्थन मिल पाएगा। आप में से हर कोई अगर अपनी आवाज़ उठाएगा तो हमारी माँग ज़रूर सुनी जाएगी।
पेटीशन बंद हो गई
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फैसला लेने वाले
18 अगस्त 2021 पर पेटीशन बनाई गई