संस्कृत: राष्ट्रभाषा - विश्व भाषा

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बहुत ही कम लोग जानते हैं कि अधिकारिक रूपसे हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है ही नहीं। भारत के 28 राज्यों व 9 केंद्र शासित प्रदेशों में से मात्र 7 ही राज्यों में हिंदी अधिकारिक राज्यभाषा है। अन्य 21 राज्यभााषाएं मिलाकर हमारी कुल 22 राज्यभााषाएं तो है, पर राष्ट्रभाषा है ही नहीं। 

संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं का मूल है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में संस्कृत शब्दों का प्रतिशत-

पंजाबी 95℅ सर्वाधिक (पाकिस्तानी पंजाबी भी)
तमिळ 71℅ (न्युनतम)
मलयालम 84℅
तेलुगु व कन्नड़ 82℅
बंगाली व असामी 86%

किसीभी भारतीय को संस्कृत सीखने में कोई दुविधा हो सकती है? आश्चर्य यही है कि उपरोक्त तथ्यों की अवहेलना कर संस्कृत को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया। जबकि स्वयं भाषा-समिति के मुस्लिम प्रतिनिधि भी संस्कृत के पक्ष में थेे।सभी संस्कृत बहुलभाषी राज्यों ने हिंदी का तीक्ष्ण विरोध कर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यो के संरक्षण, संवर्धन के लिए आंदोलन किया था।

अतएवं संस्कृत जैसी एकीकृत भाषा होते हुए भी, भारत एक राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र है।  प्रश्न है कि ३७ राज्यों व केद्र क्षेत्रों को एकसूत्र में बांधने संस्कृत सर्वमान्य है, तो हमें राष्ट्रभाषा से अबतक क्यों वंचित रखा गया है? 

हिंदी  विरोधी प्रांत केरल व तमिलनाडु में संस्कृत के संसाधन समृद्ध हैं। हिन्दू, मुस्लिम, इसाई सभी इन प्रांतों में संस्कृत पढ़ते आ रहे हैं। वे सभी इसका समर्थन करेंगे। हिन्दीभाषी राज्यों से पिछडने का डर किसी राज्य को नहीं  होगा।  

200 वर्षों से अधिक समय से अंतरराष्ट्रीय विचारधारा के अनुकूल, संस्कृत एक विश्वभाषा बननें जा ही रही है। विश्व के सभी राष्ट्र संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाते जा रहे हैं।  विश्व की सबसे वैज्ञानिक, तर्क संगत, सुमधुर व समृद्ध भाषा से सभी देश सर्सवम्मत हैं। क्या हम विश्वभाषा बनने के बाद ही संस्कृत राष्ट्रभाषा बनाएंगे? 

अत: हम सब  प्रधानमंत्री से निवेदन पर हस्ताक्षर करें कि संस्कृत राष्ट्रभाषा  घोषित कर सभी राज्यों की सम्मति से चरणबद्ध रूप से इस दशक में क्रियान्वयन करें। कि सभी राज्यों में संस्कृत ही एकमेव राष्ट्रभाषा व राज्यभााषा हो।