

ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करें और प्रभावी, आसान मुआवज़ा नीति बनाएं।
समस्या
डिजिटल उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करें
प्रभावी मुआवज़ा, डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल और पारदर्शी रिफंड व्यवस्था लागू करें
प्रेषित:
भारत सरकार, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA), उपभोक्ता मामलों का विभाग तथा सभी ऑनलाइन फूड डिलीवरी एवं डिजिटल सेवा प्रदाता कंपनियों के नाम।
भारत के डिजिटल उपभोक्ताओं के हित में एक सार्वजनिक अपील
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। करोड़ों नागरिक प्रतिदिन ऑनलाइन फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स तथा अन्य डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। डिजिटल सुविधा निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, किंतु सुविधा के साथ-साथ उपभोक्ता अधिकारों की समान रूप से प्रभावी सुरक्षा भी आवश्यक है।
यदि डिजिटल सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावी शिकायत निवारण की व्यवस्था नहीं होगी, तो उपभोक्ताओं का विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
मेरा अनुभव
19 अक्टूबर 2025 को मैंने अपने एक मित्र के लिए ₹1,317 की मिठाई ऑनलाइन ऑर्डर की। डिलीवरी का पता तथा प्राप्तकर्ता का मोबाइल नम्बर स्पष्ट रूप से दर्ज था।
कुछ समय बाद कंपनी की ओर से मुझे फ़ोन आया और मेरी बात डिलीवरी पार्टनर से कराई गई। उसने बताया कि उसे कंपनी की ओर से प्राप्तकर्ता का पता या मोबाइल नम्बर उपलब्ध नहीं हुआ है। मैंने उसी समय उसे अपने मित्र का मोबाइल नम्बर नोट करा दिया।
कुछ ही देर बाद मुझे एक SMS प्राप्त हुआ कि मेरा ऑर्डर रद्द कर दिया गया है तथा पूरी राशि "कैंसिलेशन चार्ज" के रूप में रख ली गई है।
यह मेरे लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था क्योंकि ऑर्डर रद्द करने से पहले न तो मुझसे दोबारा संपर्क किया गया और न ही कोई पूर्व सूचना दी गई।
मैंने तत्काल कंपनी से चैट तथा ई-मेल के माध्यम से संपर्क कर पूरी स्थिति बताई। कंपनी ने जाँच का आश्वासन दिया, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी मुझे कोई संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं हुआ।
बाद में मेरे मित्र ने बताया कि उन्हें डिलीवरी पार्टनर का एक कॉल आया था। उस समय वे मोटरसाइकिल चला रहे थे, इसलिए तत्काल कॉल नहीं उठा सके। बाद में उन्होंने कॉल बैक किया तो उन्हें बताया गया कि ऑर्डर रद्द हो चुका है।
उसी दिन मेरे मित्र ने संबंधित मिठाई विक्रेता से संपर्क किया। उन्हें मौखिक रूप से बताया गया कि मिठाई जैसी वस्तु आसानी से बिक जाने वाली होने के कारण प्लेटफ़ॉर्म को राशि वापस कर दी गई है।
मैं इस जानकारी का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं कर सका। किंतु यदि वास्तव में ऐसा हुआ हो और फिर भी उपभोक्ता को कोई धनवापसी न मिले, तो यह पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
मैंने उपलब्ध व्यवस्था का भी उपयोग किया
मैंने राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में 02.01.2026 को शिकायत दर्ज कराई।
डॉकेट संख्या : 8447972
मेरी शिकायत संबंधित कंपनी को भेजी गई तथा कंपनी का उत्तर मुझे अग्रेषित कर दिया गया। किंतु मुझे कोई प्रभावी समाधान प्राप्त नहीं हुआ।
इस अनुभव से मुझे यह महसूस हुआ कि वर्तमान व्यवस्था में अनेक उपभोक्ता समय, धन और मानसिक ऊर्जा खर्च करने के बाद भी प्रभावी राहत प्राप्त नहीं कर पाते।
इसलिए यह केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि नीतिगत सुधार की आवश्यकता का विषय है।
समस्या केवल रिफंड की नहीं है
कई डिजिटल कंपनियाँ अपनी वेबसाइट अथवा मोबाइल ऐप पर पहले से टिक किए हुए (Pre-checked) विकल्प रखती हैं।
परिणामस्वरूप उपभोक्ता अनजाने में ऐसी सदस्यताओं अथवा सेवाओं के लिए सहमत मान लिया जाता है जिनके लिए उसने स्पष्ट सहमति नहीं दी होती, और उसके खाते से स्वतः भुगतान लिया जा सकता है।
डिजिटल भारत में प्रत्येक भुगतान उपभोक्ता की स्पष्ट, सूचित तथा स्वैच्छिक सहमति (Explicit Opt-in Consent) पर आधारित होना चाहिए।
ऐसी सहमति वैध नहीं मानी जानी चाहिए जो उपभोक्ता की स्पष्ट और सक्रिय कार्रवाई (Active Opt-in) के बिना प्राप्त की गई हो।
हमारी प्रमुख माँगें
ऑर्डर रद्द करने से पहले ऑर्डर देने वाले तथा प्राप्तकर्ता—दोनों से संपर्क करने का उचित एवं प्रमाणित प्रयास अनिवार्य किया जाए।
प्रत्येक असफल डिलीवरी की स्थिति में कंपनी उपभोक्ता को डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराए कि कब, कितनी बार और किस माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया।
यदि डिलीवरी संभव न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार निष्पक्ष एवं पारदर्शी रिफंड नीति लागू की जाए।
सभी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अपनी रिफंड, कैंसिलेशन तथा डिलीवरी नीतियाँ सरल, स्पष्ट एवं उपभोक्ता-अनुकूल भाषा में प्रकाशित करें तथा इन नीतियों की निष्पक्षता की समीक्षा करने के लिए सरकार द्वारा अधिकृत संस्था की व्यवस्था हो।
किसी भी अतिरिक्त सेवा, सदस्यता अथवा भुगतान के लिए पहले से टिक किए हुए (Pre-checked) विकल्पों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
ग्राहक की स्पष्ट (Opt-in) सहमति के बिना कोई शुल्क न लिया जाए।
उपभोक्ता को अनजाने में लिए गए भुगतान अथवा सदस्यता को उचित समय के भीतर रद्द करने तथा धनवापसी का प्रभावी अधिकार मिले।
बार-बार उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के विरुद्ध प्रभावी एवं उदाहरण बनने योग्य नियामकीय कार्रवाई की जाए।
बैंकिंग लोकपाल की तर्ज पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और अधिकारयुक्त "डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल (Digital Consumer Ombudsman)" की स्थापना की जाए।
डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल क्यों आवश्यक है?
आज यदि किसी उपभोक्ता का ₹500, ₹1,000 अथवा ₹2,000 का नुकसान होता है, तो अधिकांश लोग न्यायालय जाने के बजाय अपनी शिकायत सोशल मीडिया या ऐप रिव्यू तक ही सीमित कर देते हैं।
मैंने स्वयं भी विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के रिव्यू में अनेक उपभोक्ताओं की शिकायतें देखी हैं। छोटी राशि तथा न्यायालयी प्रक्रिया में लगने वाले समय और खर्च को देखते हुए अधिकांश लोग आगे नहीं बढ़ते।
इसलिए हम माँग करते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र की तरह डिजिटल सेवाओं के लिए भी एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और अधिकारयुक्त Digital Consumer Ombudsman स्थापित किया जाए।
इस संस्था की प्रमुख विशेषताएँ हों—
बिना वकील के ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा।
शिकायतों का 30–45 दिनों के भीतर समयबद्ध निस्तारण।
धनवापसी, उचित मुआवज़ा तथा सुधारात्मक निर्देश देने की शक्ति।
बार-बार नियम तोड़ने वाली कंपनियों के विरुद्ध नियामकीय कार्रवाई की अनुशंसा करने का अधिकार।
शिकायत प्रक्रिया सरल, निःशुल्क एवं आम नागरिक के लिए सुलभ हो।
प्रभावी और उदाहरण बनने योग्य मुआवज़ा क्यों आवश्यक है?
यदि किसी कंपनी को यह पता हो कि उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करने पर उसे केवल मामूली आर्थिक जोखिम उठाना पड़ेगा, तो उसके पास अपनी नीतियाँ सुधारने की पर्याप्त प्रेरणा नहीं होगी।
इसलिए भारत में भी ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए कि यदि कोई कंपनी जानबूझकर, घोर लापरवाही से अथवा बार-बार उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो—
उपभोक्ता को केवल धनवापसी ही नहीं, बल्कि समय, मानसिक उत्पीड़न और वास्तविक आर्थिक क्षति के लिए प्रभावी एवं उदाहरण बनने योग्य मुआवज़ा भी मिले।
बार-बार नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर ऐसा आर्थिक दंड लगाया जाए जो भविष्य में उल्लंघन करने से प्रभावी रूप से रोके।
ऐसा मुआवज़ा दंडात्मक उद्देश्य से नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा, कंपनियों में जवाबदेही बढ़ाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए होना चाहिए।
यह व्यवस्था ईमानदार कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि केवल उन कंपनियों के लिए आवश्यक है जो उपभोक्ता अधिकारों की निरंतर अनदेखी करती हैं।
यह पिटीशन क्यों महत्वपूर्ण है?
यह केवल ₹1,317 की बात नहीं है।
यह उन लाखों भारतीय उपभोक्ताओं की बात है जो डिजिटल सेवाओं पर विश्वास करते हैं।
यह पारदर्शिता, स्पष्ट सहमति, जवाबदेही, निष्पक्ष रिफंड, समयबद्ध शिकायत निवारण और प्रभावी उपभोक्ता संरक्षण की बात है।
यदि आज नियम मजबूत नहीं किए गए, तो भविष्य में और अधिक उपभोक्ताओं को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में विश्व के अग्रणी देशों में स्थान बना रहा है। इसलिए डिजिटल उपभोक्ता अधिकार भी उसी स्तर के मजबूत, पारदर्शी और प्रभावी होने चाहिए। नवाचार और सुविधा तभी सार्थक हैं जब उनके साथ न्याय, जवाबदेही और उपभोक्ता का विश्वास भी सुरक्षित रहे।
आपसे विनम्र अनुरोध
यदि आप मानते हैं कि भारत के प्रत्येक उपभोक्ता को सम्मान, पारदर्शिता और न्याय मिलना चाहिए, तो कृपया इस पिटीशन पर हस्ताक्षर करें तथा इसे अपने परिवार, मित्रों और सोशल मीडिया पर साझा करें।
आपका एक हस्ताक्षर भारत में डिजिटल उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
– उत्तम कुमार
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक, पंजाब नेशनल बैंक
39+ वर्षों का बैंकिंग अनुभव
उपभोक्ता जागरूकता समर्थक
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समस्या
डिजिटल उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करें
प्रभावी मुआवज़ा, डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल और पारदर्शी रिफंड व्यवस्था लागू करें
प्रेषित:
भारत सरकार, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA), उपभोक्ता मामलों का विभाग तथा सभी ऑनलाइन फूड डिलीवरी एवं डिजिटल सेवा प्रदाता कंपनियों के नाम।
भारत के डिजिटल उपभोक्ताओं के हित में एक सार्वजनिक अपील
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। करोड़ों नागरिक प्रतिदिन ऑनलाइन फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स तथा अन्य डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। डिजिटल सुविधा निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, किंतु सुविधा के साथ-साथ उपभोक्ता अधिकारों की समान रूप से प्रभावी सुरक्षा भी आवश्यक है।
यदि डिजिटल सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावी शिकायत निवारण की व्यवस्था नहीं होगी, तो उपभोक्ताओं का विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
मेरा अनुभव
19 अक्टूबर 2025 को मैंने अपने एक मित्र के लिए ₹1,317 की मिठाई ऑनलाइन ऑर्डर की। डिलीवरी का पता तथा प्राप्तकर्ता का मोबाइल नम्बर स्पष्ट रूप से दर्ज था।
कुछ समय बाद कंपनी की ओर से मुझे फ़ोन आया और मेरी बात डिलीवरी पार्टनर से कराई गई। उसने बताया कि उसे कंपनी की ओर से प्राप्तकर्ता का पता या मोबाइल नम्बर उपलब्ध नहीं हुआ है। मैंने उसी समय उसे अपने मित्र का मोबाइल नम्बर नोट करा दिया।
कुछ ही देर बाद मुझे एक SMS प्राप्त हुआ कि मेरा ऑर्डर रद्द कर दिया गया है तथा पूरी राशि "कैंसिलेशन चार्ज" के रूप में रख ली गई है।
यह मेरे लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था क्योंकि ऑर्डर रद्द करने से पहले न तो मुझसे दोबारा संपर्क किया गया और न ही कोई पूर्व सूचना दी गई।
मैंने तत्काल कंपनी से चैट तथा ई-मेल के माध्यम से संपर्क कर पूरी स्थिति बताई। कंपनी ने जाँच का आश्वासन दिया, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी मुझे कोई संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं हुआ।
बाद में मेरे मित्र ने बताया कि उन्हें डिलीवरी पार्टनर का एक कॉल आया था। उस समय वे मोटरसाइकिल चला रहे थे, इसलिए तत्काल कॉल नहीं उठा सके। बाद में उन्होंने कॉल बैक किया तो उन्हें बताया गया कि ऑर्डर रद्द हो चुका है।
उसी दिन मेरे मित्र ने संबंधित मिठाई विक्रेता से संपर्क किया। उन्हें मौखिक रूप से बताया गया कि मिठाई जैसी वस्तु आसानी से बिक जाने वाली होने के कारण प्लेटफ़ॉर्म को राशि वापस कर दी गई है।
मैं इस जानकारी का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं कर सका। किंतु यदि वास्तव में ऐसा हुआ हो और फिर भी उपभोक्ता को कोई धनवापसी न मिले, तो यह पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
मैंने उपलब्ध व्यवस्था का भी उपयोग किया
मैंने राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में 02.01.2026 को शिकायत दर्ज कराई।
डॉकेट संख्या : 8447972
मेरी शिकायत संबंधित कंपनी को भेजी गई तथा कंपनी का उत्तर मुझे अग्रेषित कर दिया गया। किंतु मुझे कोई प्रभावी समाधान प्राप्त नहीं हुआ।
इस अनुभव से मुझे यह महसूस हुआ कि वर्तमान व्यवस्था में अनेक उपभोक्ता समय, धन और मानसिक ऊर्जा खर्च करने के बाद भी प्रभावी राहत प्राप्त नहीं कर पाते।
इसलिए यह केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि नीतिगत सुधार की आवश्यकता का विषय है।
समस्या केवल रिफंड की नहीं है
कई डिजिटल कंपनियाँ अपनी वेबसाइट अथवा मोबाइल ऐप पर पहले से टिक किए हुए (Pre-checked) विकल्प रखती हैं।
परिणामस्वरूप उपभोक्ता अनजाने में ऐसी सदस्यताओं अथवा सेवाओं के लिए सहमत मान लिया जाता है जिनके लिए उसने स्पष्ट सहमति नहीं दी होती, और उसके खाते से स्वतः भुगतान लिया जा सकता है।
डिजिटल भारत में प्रत्येक भुगतान उपभोक्ता की स्पष्ट, सूचित तथा स्वैच्छिक सहमति (Explicit Opt-in Consent) पर आधारित होना चाहिए।
ऐसी सहमति वैध नहीं मानी जानी चाहिए जो उपभोक्ता की स्पष्ट और सक्रिय कार्रवाई (Active Opt-in) के बिना प्राप्त की गई हो।
हमारी प्रमुख माँगें
ऑर्डर रद्द करने से पहले ऑर्डर देने वाले तथा प्राप्तकर्ता—दोनों से संपर्क करने का उचित एवं प्रमाणित प्रयास अनिवार्य किया जाए।
प्रत्येक असफल डिलीवरी की स्थिति में कंपनी उपभोक्ता को डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराए कि कब, कितनी बार और किस माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया।
यदि डिलीवरी संभव न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार निष्पक्ष एवं पारदर्शी रिफंड नीति लागू की जाए।
सभी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अपनी रिफंड, कैंसिलेशन तथा डिलीवरी नीतियाँ सरल, स्पष्ट एवं उपभोक्ता-अनुकूल भाषा में प्रकाशित करें तथा इन नीतियों की निष्पक्षता की समीक्षा करने के लिए सरकार द्वारा अधिकृत संस्था की व्यवस्था हो।
किसी भी अतिरिक्त सेवा, सदस्यता अथवा भुगतान के लिए पहले से टिक किए हुए (Pre-checked) विकल्पों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
ग्राहक की स्पष्ट (Opt-in) सहमति के बिना कोई शुल्क न लिया जाए।
उपभोक्ता को अनजाने में लिए गए भुगतान अथवा सदस्यता को उचित समय के भीतर रद्द करने तथा धनवापसी का प्रभावी अधिकार मिले।
बार-बार उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के विरुद्ध प्रभावी एवं उदाहरण बनने योग्य नियामकीय कार्रवाई की जाए।
बैंकिंग लोकपाल की तर्ज पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और अधिकारयुक्त "डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल (Digital Consumer Ombudsman)" की स्थापना की जाए।
डिजिटल उपभोक्ता लोकपाल क्यों आवश्यक है?
आज यदि किसी उपभोक्ता का ₹500, ₹1,000 अथवा ₹2,000 का नुकसान होता है, तो अधिकांश लोग न्यायालय जाने के बजाय अपनी शिकायत सोशल मीडिया या ऐप रिव्यू तक ही सीमित कर देते हैं।
मैंने स्वयं भी विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के रिव्यू में अनेक उपभोक्ताओं की शिकायतें देखी हैं। छोटी राशि तथा न्यायालयी प्रक्रिया में लगने वाले समय और खर्च को देखते हुए अधिकांश लोग आगे नहीं बढ़ते।
इसलिए हम माँग करते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र की तरह डिजिटल सेवाओं के लिए भी एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और अधिकारयुक्त Digital Consumer Ombudsman स्थापित किया जाए।
इस संस्था की प्रमुख विशेषताएँ हों—
बिना वकील के ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा।
शिकायतों का 30–45 दिनों के भीतर समयबद्ध निस्तारण।
धनवापसी, उचित मुआवज़ा तथा सुधारात्मक निर्देश देने की शक्ति।
बार-बार नियम तोड़ने वाली कंपनियों के विरुद्ध नियामकीय कार्रवाई की अनुशंसा करने का अधिकार।
शिकायत प्रक्रिया सरल, निःशुल्क एवं आम नागरिक के लिए सुलभ हो।
प्रभावी और उदाहरण बनने योग्य मुआवज़ा क्यों आवश्यक है?
यदि किसी कंपनी को यह पता हो कि उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करने पर उसे केवल मामूली आर्थिक जोखिम उठाना पड़ेगा, तो उसके पास अपनी नीतियाँ सुधारने की पर्याप्त प्रेरणा नहीं होगी।
इसलिए भारत में भी ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए कि यदि कोई कंपनी जानबूझकर, घोर लापरवाही से अथवा बार-बार उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो—
उपभोक्ता को केवल धनवापसी ही नहीं, बल्कि समय, मानसिक उत्पीड़न और वास्तविक आर्थिक क्षति के लिए प्रभावी एवं उदाहरण बनने योग्य मुआवज़ा भी मिले।
बार-बार नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर ऐसा आर्थिक दंड लगाया जाए जो भविष्य में उल्लंघन करने से प्रभावी रूप से रोके।
ऐसा मुआवज़ा दंडात्मक उद्देश्य से नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा, कंपनियों में जवाबदेही बढ़ाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए होना चाहिए।
यह व्यवस्था ईमानदार कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि केवल उन कंपनियों के लिए आवश्यक है जो उपभोक्ता अधिकारों की निरंतर अनदेखी करती हैं।
यह पिटीशन क्यों महत्वपूर्ण है?
यह केवल ₹1,317 की बात नहीं है।
यह उन लाखों भारतीय उपभोक्ताओं की बात है जो डिजिटल सेवाओं पर विश्वास करते हैं।
यह पारदर्शिता, स्पष्ट सहमति, जवाबदेही, निष्पक्ष रिफंड, समयबद्ध शिकायत निवारण और प्रभावी उपभोक्ता संरक्षण की बात है।
यदि आज नियम मजबूत नहीं किए गए, तो भविष्य में और अधिक उपभोक्ताओं को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में विश्व के अग्रणी देशों में स्थान बना रहा है। इसलिए डिजिटल उपभोक्ता अधिकार भी उसी स्तर के मजबूत, पारदर्शी और प्रभावी होने चाहिए। नवाचार और सुविधा तभी सार्थक हैं जब उनके साथ न्याय, जवाबदेही और उपभोक्ता का विश्वास भी सुरक्षित रहे।
आपसे विनम्र अनुरोध
यदि आप मानते हैं कि भारत के प्रत्येक उपभोक्ता को सम्मान, पारदर्शिता और न्याय मिलना चाहिए, तो कृपया इस पिटीशन पर हस्ताक्षर करें तथा इसे अपने परिवार, मित्रों और सोशल मीडिया पर साझा करें।
आपका एक हस्ताक्षर भारत में डिजिटल उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
– उत्तम कुमार
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक, पंजाब नेशनल बैंक
39+ वर्षों का बैंकिंग अनुभव
उपभोक्ता जागरूकता समर्थक
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