Stop recruitment on contractual basis in government services.

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देश में लाखों योग्य, शिक्षित युवा नागरिक राज्य सरकारों के अधीन कार्यालयों में संविदा कार्मिक के रूप में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं। जो अपनी सेवाओं के एवज में मानदेय राशि मासिक रूप से प्राप्त कर रहे हैं। संविदा कार्मिकों की भर्तियाँ मानव अधिकारों व समानता के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। 

उदाहरण 

उच्च प्राथमिक शिक्षा यानी 8वीं उत्तीर्ण एक हेल्पर वेतन के रूप में स्नातक, स्नातकोत्तर व तकनीकी शिक्षा प्राप्त संविदा कार्मिक के मानदेय से कहीं अधिक भुगतान प्राप्त कर रहा है। 

संविदा पर कार्मिक लेने की व्यवस्था कब शुरू हुई, इस बारे में तो तथ्य उपलब्ध नहीं है। लेकिन दशकों पूर्व संविदा व्यवस्था से बड़ी संख्या में भर्तियाँ की गई। 

संविदा कार्मिकों की भर्तियाँ विभिन्न मंत्रालयों के अधीन कार्यक्रमों, योजनाओं व मिशन के अंतर्गत की गई। 

एक रणनीति के तहत उक्त कार्यक्रमों, योजनाओं व मिशनों को पूर्व व्यवस्थाओं के उलट सरकारी संस्थाओं व समितियों का गठन कर चलाया जाना निर्धारित किया गया। 

इन संस्थाओं व समितियों के प्रमुख सरकारों के वेतनभोगी कर्मचारियों व अधिकारियों को बनाया गया। 

सीधी भर्ती व मानदेय के अतिरिक्त संविदा कार्मिकों की सेवा शर्ते नियमित कर्मचारियों के समकक्ष हैं। 

सरकारों ने दूसरी रणनीति के रूप में निर्धारित किया कि इन संविदा कार्मिकों के पदनाम सेवा नियमों में वर्णित कैडर व पदनामों से भिन्न रखे गए। जबकि योग्यताएँ पद अनुसार समान रखी गयी। विधि की दृष्टि से यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि लेखा कार्यों हेतु कॉमर्स विषय में डिप्लोमा, डिग्री की वांछनीय योग्यता होती है। नियमित या संविदा कार्मिकों के लिए भी ऐसा ही निर्धारित है। जबकि समान योग्यता के बावजूद सेवा के प्रतिफल वेतन व मानदेय में भारी असमानता क्यों? लेखा कार्यों में अंतर बता कर मानदेय का अंतर किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। कार्य की प्रकृति लेखा कार्य है, जिसका योग्यतानुसार वेतन व मानदेय समान होना चाहिए। इसी प्रकार कंप्यूटर, नर्सिंग, अभियांत्रिकी, चिकित्सकीय कार्यों सहित अन्य समान योग्यता व कार्य प्रकृति के कर्मचारियों पर भी लागू होना चाहिए। 

समान योजनाओं में लगे कार्मिकों के साथ असमानता भी की जा रही है। जैसे किन्हीं कर्मचारियों की वेतन वृद्धि कर दी गयी, जबकि दूसरे कर्मियों को उस वृद्धि से वंचित कर दिया गया। 

मानदेय राशि आयकर नियमों में वेतन  का ही भाग व उसी श्रेणी की है। लेकिन सरकार मानदेय कहकर अपने उत्तरदायित्त्व से बचने का प्रयास कर रही हैं। 

सरकारों ने एक और रणनीति द्वारा इस व्यवस्था से भी एक नई व्यवस्था निकाल ली NGO व प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से कर्मचारियों की भर्ती। जिस पर सुस्थापित विधि है कि सरकार नियोजन की अपनी संप्रभुत्त्व शक्तियों को किसी तृतीय पक्षकार को प्रत्याभूत नहीं कर सकती। इसके बावजूद सरकारें इस विधि का स्पष्ट उल्लंघन कर रही हैं। 

कार्यक्रम, योजनायें व मिशन मूल रूप से सरकारों के ही कार्य हैं, इन कार्यक्रमों, योजनाओं व मिशन के संचालन हेतु वित्त की व्यवस्था सरकारों द्वारा ही कि जाति हैं। प्रत्येक कर्मचारी द्वारा संपादित कार्य राज्यों की उपलब्धि में शामिल होता है। बावजूद इसके कर्मचारियों के शोषण की स्थिति तक असमानता क्यों? 

जब सेवा नियमों के अंतर्गत कैडर पदों की भर्तियाँ अनेक बार की जा चुकी हैं, लेकिन राज्यों का इन कार्मिकों को दशकों बाद भी नियमित नहीं करना अन्यायपूर्ण है। कैडर व पदनाम सेवा नियमों में शामिल करना राज्य की शक्तियों के अधीन है। 

प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्यों ने विधियों से परे स्थापित व्यवस्था के विपरीत सोसाइटी, समितियों के माध्यम से कार्यक्रम, योजनाएं व मिशन क्यों चलाये गए?  जबकि इन कार्यक्रमों, योजनाओं व मिशन के कार्य भी पूर्व कार्यक्रमों के समान प्रकृति के ही थे। 

 

उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि संविदा कार्मिकों की व्यवस्था शोषण की व्यवस्था है एवं समानता के अधिकारों व नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध व्यवस्था है। 

इस संबंध में प्रभावित समस्त नागरिकों को संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है।