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To protect the existence of Patna Museum! पटना संग्रहालय के अस्तित्व की रक्षा हेतु !

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The Honorable Chief Minister,
Government of Bihar, Patna.

Subject: Against shifting of rare and invaluable archeological antiques and artifacts to Bihar Museum from Patna Museum.

In the centenary year of Patna Museum, we want to bring to your kind attention gross injustice, immaturity and partiality of the state government machinery with well-known and prestigious Patna Museum.

It has been known from the newspapers that all antiquities and artifacts dated before 1764 are being transferred to the newly constructed Bihar Museum. Among them are the stone statues exhibited in five galleries of Patna Museum, all bronze statues of the Bronze Gallery, terracotta artifacts, Tibetian Thanka and all important artifacts of Patliputra Gallery. Sir, once these invaluable antiquities are shifted as per the report, nothing important will remain in Patna Museum. Patna Museum receives global recognition due to all these antiquities. We believe that the souls of founders of the Patna Museum- Edward Gate, Walls, K.P. Jaiswal, Prof. J. N. Samadar, Dr. Sachchidanand Sinha, Mahapandit Rahul Sankrityayan, Dr. Sion must be weeping at this thoughtless and brazen act of the state government. This is, perhaps, world's first incident when all invaluable assets of a world-class museum established a hundred years ago are being given to a museum operated by an autonomous society registered under the Society's Act. We strongly oppose this mess with the future of antiquities which represent our shared culture.

We want to know whether this completely impractical, illegal and anti-museum decision has been taken in the light of a decision taken by a high level special committee constituted by the government or by the state bureaucracy to serve some vested interest. Under the Archaeological Property Protection Act, no antiquity can be transferred from Patna Museum to any other destination. It is noteworthy that most of the antiquities, preserved in Patna Museum, have been obtained through donations and on loans by individuals and institutions like Indian Museum, Kolkata, Madras Museum, Lucknow Museum, Mahapandit Rahul Samkitayan etc. Without the express permission of donors and loaners any transfer of antiquities will be both immoral and illegal.

It is to be noted that in the establishment year of Patna Museum itself, the most beautiful representative of Indian archeological finding- Yakshini- was found and the glory of Patna Museum reached every corner of the world with its prize collection of Yakshini, an artistic imagination of bountiful beauty. During the Congress regime in the 80's, Yakshini came into political controversy and Yakshini was brought back from the National Museum, Delhi to Patna Museum. Heavy compensation was also paid for a minor damage caused to Yakshini.

Perhaps you are forgetting the fact that this year of 2017 is the centenary year of Patna Museum. On the completion of hundred years of any reputed state institution, usually, festivals are organized throughout the year. Seminars and discussions are also organized to review its glorious journey right from its establishment to monumental achievements. On the basis of such discussions and debates, road map for better future of the said institute is outlined. Unfortunately, in the context of glorious Patna Museum, attempts are being made by none other than the state to completely exterminate it in its centenary year itself.

It may not be out of context to mention that the Hon'ble President and the Hon'ble Prime Minister were present at the centenary celebrations of Hon'ble Patna High Court. This year Patna University is also celebrating its centenary year and there is the possibility of the Hon'ble President and the Hon'ble Prime Minister attending that function. It is really amazing as to why the state government is not giving any consideration to organize cultural festival in the centenary year of Patna Museum. The state government is bound to give a satisfactory answer to this riddle.

We welcome the idea and construction of Bihar Museum. However, if Bihar Museum was to be made rich by transferring all important antiquities of Patna Museum, then what was the need of the new Bihar Museum?

We request you to direct competent authorities to immediately send back all those items being displayed in Bihar Museum after being transferred from Patna Museum. A high level committee of all-India-level archaeologists, historians and museum experts should also be constituted and given the right to decide which items kept in the Patna Museum's store can be sent to the Bihar Museum. This expert committee should be kept free from the control of the Chief Secretary or any other bureaucrat of Bihar.

Yours faithfully,

Jaya Sankrityayan (D/o Great Travelog writer Rahul Sankrityayan.)
S.S Biswas (Former Director General, National Museum,Delhi.)
Prof. Siddheshwar Prasad (Former Governor,Tripura)
Hari kishor Prasad (First Director of Museums Bihar)
Manager Pandey (renowned Hindi Critic,Delhi)
Khagendra Thakur (Hindi Critic and got Bihar Shikhar samman).
Dinesh Mishra (River expert and member of Namami Ganga project,Goi,Delhi). Shekhar Pathak, Editor, Pahad, Nainital.
Rajiv Lochan Saah, e editor, Nainital Samachar.
Vijay Bahadur Singh (senior Author,Bhopal).
Ranjiv, (River expert,Patna).
Palash Biswas, (Senior Journalist,Kolkata)
Pushpraj, (Freelance journalist and Author) Convenor-Save Yakshini,Save Patna Museum campaign.


माननीय मुख्यमंत्री जी ,बिहार

विषय – पटना संग्रहालय को शताब्दी वर्ष में वीरान कर अमूल्य पुरावशेषों एवं
कलाकृतिओं को बिहार संग्रहालय में ले जाने के विरूद्ध.

शताब्दी वर्ष में पटना संग्रहालय के साथ हो रहे घोर अन्याय तथा सरकारी तंत्र की अपरिपक्वता एवं अदूरदर्शिता की ओर हमलोग आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं. अखबारों से ज्ञात हुआ है कि 1764 से पूर्व के सारे पुरावशेष एवं कलाकृतियां नवनिर्मित बिहार संग्रहालय में भेजी जा रही हैं. इनमें पटना संग्रहालय की पाँच दीर्घाओं में प्रदर्शित प्रस्तर मूर्तियां, ब्रौंज गैलरी की सभी कांस्य प्रतिमाएं, मृण् मूर्तिकक्ष, तिब्बती थंका चित्र गैलरी तथा पाटलिपुत्र गैलरी की सभी महत्वपूर्ण कलाकृतियां व प्रदर्श सम्मिलित हैं. इन बहुमूल्य पुरावशेषों के चले जाने के बाद पटना संग्रहालय में कुछ भी महत्वपूर्ण प्राचीन कलाकृतियां नहीं रह जायेंगीं. इन सभी पुरावशेषों के कारण ही पटना संग्रहालय को वैश्विक पहचान प्राप्त है. निश्चय ही पटना संग्रहालय के संस्थापकों में एडवर्ड गेट, वाल्स, के.पी. जायसवाल, प्रो. जे. एन. समादार, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ. शेर की आत्मा सरकार इस कृत से रो रही होगी. यह विश्व की पहली घटना है, जब किसी सौ वर्ष पूर्व स्थापित विश्व स्तरीय संग्रहालय की सभी अमूल्य सम्पदा एक रजिस्टर्ड सोसायटी के द्वारा संचालित
संग्रहालय को दी जा रही हो. पुरावशेषों के भविष्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ का हम घोर विरोध करते हैं.

हमलोग यह जानना चाहते हैं कि इस प्रकार का पूर्णतः अव्यवहारिक,अवैधानिक एवं संग्रहालय विरोधी निर्णय क्या किसी उच्च स्तरीय विशेष समिति के द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में लिया गया है अथवा नौकरशाही के द्वारा किसी खास विशेष उदेश्य से लिया गया निर्णय है .

पुरातात्विक संपदा संरक्षण कानून के तहत किसी भी पुरावशेष को पटना संग्रहालय से दूसरी जगह स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि इस म्यूजियम में इन्डियन म्यूजियम कोलकाता, मद्रास म्यूजियम, लखनऊ म्यूजियम, महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वरा दान एवं लोन के द्वारा प्राप्त ज्यादातर पुरावशेष –कलाकृतियां संरक्षित हैं. दानदाताओं – ऋणदाताओं की इजाजत के बिना किसी भी पुरावशेष का स्थानान्तरण गैर –क़ानूनी होगा. ज्ञात हो कि पटना संग्रहालय के स्थापना वर्ष में ही भारतीय पुरातत्व की सबसे खूबसूरत कृति यक्षिणी की प्राप्ति हुई थी और सौन्दर्य एक परिकल्पना की प्रतिमूर्ति यक्षिणी के यश के साथ ही पटना संग्रहालय की ख्याति शुरू हुई थी. 80 के दशक में कांग्रेस शासन काल में यक्षिणी राजनीतिक विवादों के कारण चर्चें में आईं थी और मुआवजा सहित यक्षिणी को नेशनल म्यूजियम दिल्ली से पटना संग्रहालय में वापस
लाया गया था.

शायद आप विस्मृत हो रहें हों कि 2017 का यह वर्ष पटना संग्रहालय का शताब्दी वर्ष है .किसी भी प्रतिष्ठित राजकीय संस्था के सौ वर्ष पूरा होने पर पूरे वर्ष समारोहों का आयोजन होता है और स्थापना काल से लेकर उत्कर्ष के हर मुकाम की चर्चा ,समीक्षा ,विवेचना कर संस्थान के बेहतर भविष्य और विकास की रुपरेखा बनाई जाती है. किन्तु इस गरिमामई संग्रहालय का अस्तित्व शताब्दी वर्ष में ही पूर्णतः समाप्त किया जा रहा है. अभी माननीय पटना उच्च न्यायालय के शताब्दी समारोह में महामहिम राष्ट्रपति तथा माननीय प्रधानमंत्री महोदय पधारे थे .इस वर्ष पटना
विश्व विद्यालय भी शताब्दी वर्ष मना रहा है तथा इस समारोह में महामहिम राष्ट्रपति एवं माननीय प्रधानमन्त्री जी के आने की सम्भावना है. सरकार पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में समारोहों के आयोजन को तरजीह क्योँ नहीं दे रही है ? सरकार से इस सवाल का उत्तर भी अपेक्षित है.
बिहार संग्रहालय की परिकल्पना और निर्माण का हम स्वागत करते हैं, किन्तु पटना संग्रहालय के ही सभी महत्वपूर्ण पुरावशेषों से बिहार संग्रहालय को चमकाना था तो नूतन बिहार संग्रहालय की क्या जरूरत थी?

हम लोगों का अनुरोध है कि पटना संग्रहालय में प्रदर्शित उन सभी वस्तुओं को तत्काल बिहार संग्रहालय से वापस लाने का निर्देश दिया जाए और अखिल भारतीय स्तर के पुरातत्वविदों, इतिहासकारों, संग्रहालय विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर उन्हें यह तय करने का अधिकार दिया जाए कि पटना संग्रहालय के स्टोर में रखी हुई कौन –कौन सी चीजें बिहार संग्रहालय में भेजी जा सकती है. इस विशेषज्ञ समिति को मुख्य सचिव या किन्हीं अन्य नौकरशाह के नियंत्रण से मुक्त रखा जाये!

जया सांकृत्यायन, पुत्री, महापंडित राहुल सांकृत्यायन
एस एस विश्वास, अ० प्रा०, महानिदेशक , नेशनल म्यूजियम, दिल्ली 
प्रो० सिद्धेश्वर प्रसाद, भूतपूर्व राज्यपाल, त्रिपुरा
हरिकिशोर प्रसाद, अ० प्रा०, प्रथम निदेशक,बिहार संग्रहालय ,पटना
डॉ. मैनेजर पाण्डेय ,प्रख्यात आलोचक ,दिल्ली 
खगेन्द्र ठाकुर, ( बिहार सरकार से हिंदी साहित्य शिखर सम्मान प्राप्त प्रख्यात आलोचक )
दिनेश मिश्र (प्रख्यात नदी विशेषज्ञ एवं सदस्य नमामि गंगा परियोजना ,भारत सरकार)
शेखर पाठक, संपादक, "पहाड़", नैनीताल 
राजीव लोचन साह, संपादक, नैनीताल समाचार 
विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ आलोचक, भोपाल
रणजीव (नदी विशेषज्ञ),पटना
पलाश विश्वाश,वरिष्ठ पत्रकार ,कोलकाता
पुष्पराज, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक (नंदीग्राम डायरी), संयोजक, "यक्षिणी बचाओ, पटना संग्रहालय बचाओ" !

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