छोटा भीम के प्रोड्यूसर, चुटकी को दें उसका अपना टीवी शो #ChutkiKisiSeKamNahin

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थिएटर तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा है और हर कोई अनगिनत भावों से भरा हुआ है। पर्दे पर ‘गली ब्वॉय’ का एक सीन है, जहाँ रैपर एक दूसरे पर गानों के बाण चला रहे हैं। दरअसल यह एक प्रतियोगिता है, जिसमें रैपर एक दूसरे को अपने बोल से नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। जिसके बोल से सामने वाला चित होगा, वही इस रैप युद्ध का विजेता होगा।

पर ये नीचा दिखाने के रैप युद्ध में एक रैपर दूसरे को कहता है, “तू छोटा भीम नहीं, चुटकी है!” और पूरा थिएटर ठहाके मारकर हँसता है। उन ठहाकों से मुझे दुख हुआ क्योंकि किसी को चुटकी कहकर नीचा दिखाने का परोक्ष रूप से मतलब है उसे लड़की कहकर नीचा दिखाना।

आपने भी तो सुना ही होगा जब समाज किसी को दुर्बल कहना चाहता है तो वो कहता है, “लड़की हो क्या?”

समाज की बात क्या करूँ जब अपने आसपास, अपने घर में ही ऐसे रूपकों का सामना करना पड़ता है। कुछ दिन पहले 7 साल का मेरा बेटा और मेरी दोस्त की 11 साल की बेटी खेल रहे होते हैं। वो तय करते हैं कि दोनों सूपरहीरो बनेंगे। मेरा बेटा छोटा भीम बन जाता है और मेरी दोस्त की बेटी चुटकी।

वो ताकतवर है, उसके पास डोले-शोले हैं और वो भीमकाय होने का प्रतीक है। वहीं चुटकी के सिर पर दो चोटियां हैं, गाल लाल हैं और वो तुरंत छोटा भीम के लिए टेबल साफकर उसपर लड्डू रखती है। जबकि दोनों सूपरहीरो हैं।

ये सब देखकर मैं एक बार को सोच में पड़ गई। एक सामान्य से कार्टून शो का हमारे बच्चों पर कितना गहरा असर पड़ रहा है। कार्टून, कहीं ना कहीं हमारे बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ रहे हैं। इसलिए तो लड़की टेबल साफ करेगी और लड़का हीरो बनेगा।

जिस देश की राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक महिला रही हों, उस देश की लड़कियां क्या सिर्फ टेबल साफ करेंगी? क्या उनकी अपनी महत्वकांक्षाएं नहीं होनी चाहिए। वो भी तो हीरो बन सकती है ना! एक ऐसा देश जिसकी रक्षा मंत्री महिला हो, हैं वहाँ की हर चुटकी भी रक्षा करने का बल रखती है।

इसलिए मैंने ये पेटीशन शुरू की है ताकि हम चुटकी को बराबरी का अधिकार दें। ताकि उसे देखकर देश की अन्य चुटकी ये सीखें कि वो आत्मनिर्भर हैं और हीरो हैं। वो टेबल पर लड्डू रखने के लिए नहीं बल्कि उसी टेबल पर हो रही किसी मीटिंग की अध्यक्षता करने के काबिल हैं।

मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि ‘छोटा भीम’ कार्टून के प्रोड्यूसर और क्रिएटिव डायरेक्टर चुटकी को भी बराबरी का रोल दें और साथ ही एक अलग शो बनाएं जिसमें चुटकी मुख्य भूमिका में हो।

मैं जानती हूँ कि मेरी पेटीशन को पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि ये तो अति हो गई पर ऐसा नहीं हैं। छोटा भीम को भारत में करीब 4 करोड़ से ज़्यादा लोग देखते हैं, जिसमें मुख्यरूप से 3-9 साल के बच्चे होते हैं। ये कार्टून छोटे शहरों और हमारे गाँवों के बच्चों में खासा लोकप्रिय है। तभी तो हर दूसरे घर में एक बच्चा आपको कहता मिलेगा कि वो छोटा भीम है।

यही नहीं यूट्यबू पर छोटा भीम की निर्माता कंपनी ग्रीन गोल्ड एनिमेशन को 280 करोड़ से ज्यादा व्यूज़ हैं। सोचिए उनकी पहुँच कहाँ तक है और कितनी ज्यादा है।

आपको बताना चाहती हूँ कि हमारे देश का भविष्य, ये छोटे बच्चे छोटा भीम देख नहीं रहे हैं बल्कि उससे बहुत कुछ सीख भी रहे हैं। हमें चिंता होनी चाहिए कि हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं।

बताना चाहती हूँ कि ग्रीन गोल्ड एनिमेशन ने कई सारे कार्टून शो का निर्माण किया है, जो बच्चों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हैं। कुछ शो हैं-- छोटा भीम, सूपर भीम, माइटी राजू, अर्जुन-प्रिंस ऑफ़ बाली, कृष्णा-द ग्रेट, चोर-पुलिस, इत्यादि। इसमें से एक भी कार्टून ऐसा नहीं, जिसमें मुख्य भूमिका में कोई लड़की या महिला हो।

छोटा भीम अगर सूपर भीम बन सकता है। उसकी टीम का राजू, माइटी राजू बन सकता है। तो चुटकी, चतुर-चुटकी या टफ-चुटकी भी बन सकती है। आपके हस्ताक्षर से ये संभव हो सकता है, मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें।

हालांकि चुटकी एक काल्पनिक पात्र है पर हमारे समाज की नींव में बसी पितृसत्ता और महिलाओं को कमज़ोर समझने की सोच काल्पनिक नहीं है। चुटकी का रोल कहीं ना कहीं इस सोच को हमारे बच्चों तक पहुँचा रहा है, जिसे हम सबको मिलकर बदलना होगा।मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि हमारे पास महिला शिरोज़ भी हों। जिनसे मेरा बेटा भी सीखे और बाकी बच्चे भी कि लड़कियां किसी से कम नहीं और कमज़ोर तो हरगिज़ नहीं।