Computer Professional (Contractual) in DRDA and JDC offices of Uttar Pradesh seek Justice

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 देश के सभी प्रबुद्ध नागरिकों का ध्यान उत्तर प्रदेश के जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों व संयुक्त विकास आयुक्त में विगत 31 वर्षो से गिरमिटया लेबर की मानिन्द कार्य कर रहे संविदा कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स व आपरेटर्स की अमानवीय परिस्थितियों की ओर आकृष्ट करना चाहते है। वर्ष 1988-1989 में जब भारत में सरकारी कार्य प्रणाली को सुचारु करने के ध्येय से कम्प्यूटर प्रणाली ग्राम्य विकास विभाग में लागू किया गया था और इस हेतु प्रदेश के जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में कम्प्यूटर व अन्य उपकरण उपलब्ध कराये गये थे तब इन कार्यालयों में कोई भी तकनीकी स्टाफ उपलब्ध नहीं था। तत्समय वर्ष 1989 में आयुक्त, ग्राम्य विकास, उत्तर प्रदेश कार्यालय के शासनादेश सं0 10224/मा0सेल/1989-89 दिनांक 30 नवम्बर,1989   के द्वारा कम्प्यूटर कर्मियों की नियुक्ति जिला स्तर पर जिलाधिकारी व मंडल स्तर पर संयुक्त विकास आयुक्त की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा कम्प्यूटर कर्मियों की नियुक्ति संविदा पर निर्धारित वेतनमानों के समतुल्य निम्नवत मासिक संहत वेतन पर की गयी थी। तत्समय किसी भी कर्मचारी को इस बात का अंदेशा भी नहीं था कि उक्त पदों को सृजित कराये बिना ही कम्प्यूटर कर्मचारियों की नियुक्ति की गयी है। 
पदनामवेतनमान  संहत मासिक वेतन
1-   डेटा एन्ट्री आपरेटर      354-558 1500/-
2-   कम्प्यूटर आपरेटर570-11001800/-
3-प्रोग्रामर770-16003000/-


तद् दिनांक सें हम सभी कम्प्यूटर कर्मी संविदा पर नियमित रुप से अपने पदों पर कार्य करते आ रहे हैं। विषाद यह है कि 31 वर्षो तक कार्य करने के उपरान्त भी हम लोगों को कर्मचारी भविष्य निधि, जीवन बीमा, अनुमन्य भत्तों, बोनस आदि से महरूम रखा गया है। हम लोगों को आयुक्त कार्यालय से प्रमुख सचिव कार्यालय, उत्तर प्रदेश शासन स्तर पर लगभग 13 प्रस्ताव पदो ंके सृजन, नियमितीकरण हेतु भेजकर हम लोगों को झांसे में रखा गया। फलस्वरुप हम लोग कहीं अन्यत्र अपनी रोजी-रोटी भी नहीं तलाश सके। आज हम सभी लोग 50 वर्ष या उससे अधिक आयु को प्राप्त कर चुके है। कुछ साथी अधिवर्षता आयु पर भी पहुॅंच गये है। जिस कारण 31 वर्षो की सेवा अर्थात अपने जीवन का स्वर्णिम समय अपने विभाग को देने के पश्चात भी दयनीय स्थितियों में कार्य करने को मजबूर हैं। सभी प्रस्ताव शोषण के हथियार से अधिक कुछ भी साबित नहीं हुये हैं।


ब- न्यूनतम मासिक संहत वेतनवृद्धि का विवरण- विगत 31 वर्षों में हम लोगों द्वारा काफी निवेदन करने, प्रत्यावेदन देने के उपरान्त ही उपरोक्त कार्यालयों द्वारा हम लोगों के वेतन में उपरोक्त वर्णित वेतनमानों के समतुल्य मंहगाई को जोडते हुये 7 बार ही वृद्वि की गयी है जोकि नगण्य सी ही प्रतीत होती रही है। वर्तमान में तो हम लोगों को वास्तव में गिरमिटिया लेबर मानते हुये प्राईस इन्डेक्स के आधार पर मात्र 40 प्रतिशत की वृद्वि की गयी जोकि हम लोगों के लम्बे सेवा काल को देखते हुये बहुत ही शर्मनाक है। 
वर्ष 2011 तक की गयी न्यून वेतनवृद्धि निम्न वेतनमानों को दृष्टिगत करते हुये की जाती रही है। परन्तु वर्ष 2011 के उपरान्त 8 वर्ष के बडे़ अन्तराल पश्चात वेतन वृद्धि को प्राईस इन्डेक्स के आधार पर किस उद्देश्य से निर्धारित किया गया यह समझ से परे है। क्योंकि यहां से हम लोगों की नियुक्ति की प्रकृति को लेबर की मानिन्द निर्धारित कर दिया गया है जोकि कि अन्यायपूर्ण और अनियमित है। यदि 7वें वेतन आयोग के आधार पर यह वेतनवृद्धि हम लोगों के 31 वर्ष के सेवा काल को दृष्टिगत कर की जाती तो यह वेतनवृद्धि 1 लाख 10 हजार से अधिक निर्धारित की जाती। हम लोगों का वेतन निर्धारिण विगत 31 वर्षों में निम्न वेतनमानों के अन्तर्गत निर्धारित किया जाता रहा है - 

                                              Pay Commission          

                Post           III             IV                  V                          Vi           PB       7th

 Programmer    770-1600    2000-3200  6500-10500  9300-34800  4600  35400-

112400

 Comp.Op.          570-1100   950-1400   3050-4590  5200-20200 2800 29200-92300

उपरोक्त वेतनवृद्धि का स्केल भी शोषण से अधिक कुछ भी नहीं रहा जिसका परिणाम में हम लोगों में कुंठा का रोपण करने से अधिक कुछ भी नहीं रहा है और इस सुहागा यह कि अब लेबर मानते हुये प्राईस इन्डेक्स के आधार पर मासिक वेतन वृद्धि का निर्धारण किया जा रहा है। परन्तु श्रम कानूनों का कहीं भी आज तक पालन नहीं किया गया है। उक्त कानून अन्तर्गत दिये जाने वाले लाभों से हम लोगों को मरहूम रखा गया। यह किस प्रकार की नौकरी हम लोगों से करायी गयी है। हम लोगों के साथ वर्ष 1988-89 में समान योग्यता के साथ एन.आई0सी में नियुक्त किये सहायक सूचना विज्ञान अधिकारी आज लगभग 1 लाख 25 हजार वेतन पा रहे हैं और उनकी प्रोन्नति भी की गयी है। हम लोग आज भी वहीं पर है जहां पर नियुक्त किये गये थे वरन उससे भी निम्नतम स्थिति पर लाकर खडें कर दिये गये हैं। महोदय आज हम अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने में असमर्थ रहे और आज की परिस्थितियों में उनके वैवाहिक कार्य को करने में भी अपने को सक्षम नहीं पा रहे हैं। इन परिस्थितियों के लिये कौन जिम्मेदार है इस तथ्य का निर्धारण कर जांच-कार्यवाही किया जाना मानवीय दृष्टिकोण से अत्यन्त आवश्यक है।

स- वर्ष 2015 में संविदा कर्मियों के विनियमितीकरण हेतु पूर्व सरकार द्वारा लायी गयी नीति का विभाग द्वारा किया गया हश्र- उपरोक्त 31 वर्षों के लम्बे सेवाकाल के विवरण के उपरान्त आपको यह भी अवगत कराना है कि विगत सरकार द्वारा प्रदेश के राजकीय विभागों,स्वशासी संस्थाओं, सार्वजनिक उपक्रमों/निगमों, स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों एवं जिला पंचायतों में दिनांक 31-03-1996 व दिनांक 31 दिसम्बर, 2001 तक नियुक्त दैनिक वेतन/ वर्कचार्ज एवं संविदा कार्मिकों के विनियमितिकरण का नीतिगत फैसला लिया गया और वित्त विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा शासनादेश सं0 44 दिनांक 13 अगस्त 2015 को जारी किया गया तदुपरान्त वित्त विभाग द्वारा शासनादेश सं0 9/2016 दिनांक 24 फरवरी 2016 तक इस शासनादेश की परिधि में दिनांक 31-12-2001 तक नियुक्त संविदा कर्मियों का शामिल किया गया(संलग्न)। इस फैसले के अन्तर्गत अन्य विभागों में कार्यरत संविदा कर्मियों को तो नियमित कर दिया गया परन्तु हमारे विभाग द्वारा अन्यान्य सूचनायें एकत्र की गयी, तरह-तरह के निर्णय लिये, वित्त एवं कार्मिक विभाग से सहमति लेकर माननीय मुख्यमंत्री कार्यालय तक दो-दो बार पत्रावली को अनुमोदन हेतु प्रेषित किया गया लेकिन हठधर्मिता व भ्रष्टाचार के चलते दोनों बार ही पत्रावली को बिना स्वीकृति के डम्प कर दिया गया। उसके उपरान्त आयुक्त, ग्राम्य विकास उत्तर प्रदेश श्री एन0पी0 सिंह जी द्वारा हम लोगों की दयनीय स्थिति को देखते हुये एक वर्ष पूर्व प्रमुख सचिव, ग्राम्य विकास, उ0प्र0 द्वारा बिना किसी कारण प्रमुख सचिव, वित्त विभाग से फाईल को वापस ले आया गया था, पर पुनः बैठक कर नियमितीकरण का निर्णय लेते हुये कार्यवाही की गयी जो एक बार फिर वित्त विभाग व ग्राम्य विकास विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और हठधर्मिता की भेंट चढ गयी। 31 वर्षों के लम्बे सेवाकाल को दर किनार करते हुय धमकाया गया कि यदि कोई भी कर्मी कोर्ट का सहारा लेगा तो यह कार्य कभी भी नहीं होने दिया जायेगा जिसकी परिणति 3 वर्ष तक उपरोक्त फाईल में शासनादेश से आच्छादित होने के उपरान्त, इससे आच्छादित न होने का तमगा हम लोगों पर लगा कर हमारा विनियिमितीकरण को ठंडे बस्ते में रख दिया गया है, किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। महोदय हम लोगों के लिये यह हताशा की पराकाष्ठा है। 


उपरोक्त शासनादेश से आच्छादित न होने के जो आधार ग्राम्य विकास विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा बताये गये है उनका विवरण मनमाना और हठधर्मिता पूर्ण है क्योंकि किसी एक कम्प्यूटर कर्मी जिसकी अधिवर्षता आयु पूरी होने में मात्र 4 वर्ष ही बचे हैं के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में एक वाद दायर किया हुआ है जिस कारण चिढ़कर उच्चाधिकारियों द्वारा उक्त शासनादेश से आच्छादित 71 लोगों का भविष्य नष्ट कर दिया गया है। विगत 3 वर्ष तक हम लोगों को आच्छादित मानते हुये पत्रावली में वही सब आधार दर्ज है जिनसे यह सिद्ध किया गया थी हम 71 लोग उक्त शासनादेश की परिधि में आते है और उससे आच्छादित है। इस तथ्य की जांच नोटशीट्स सं  411 से 495   तक में दर्ज विवरण और उन पर की गयी कार्यवाहियों से सत्यापित की जा सकती है। ग्राम्य विकास विभाग द्वारा बताये गये आधार निम्नवत है -

1- कि कम्प्यूटर कर्मी संविदा कर्मी है और इनका पद सृजित नहीं है तथा सीधी भर्ती के कार्मिक नहीं हैं इसलिये इनका संविलियन नहीं किया जा सकता है।
2- कि जिला ग्राम्य विकास अभिकरण अपने स्त्रोतों से संचालित संस्था नहीं है और इस प्रकार के विनियिमतिकरण से आने वाले अतिरिक्त व्ययभार को वहन करने में सक्षम नहीं है
3- कि 12 सितम्बर 2016 को कार्मिक विभाग के अनुभाग-2 द्वारा जारी की गयी नियमावली से आच्छादित नहीं है।
4- कि कम्प्यूटर कर्मी संविदा कर्मी है यह दिनांक जिला ग्राम्य विकास अभिकरण कर्मियों के संविलियन हेतु जारी शासनादेश दिनांक 18-7-2016 के शासनादेश की व्यवस्था अन्तर्गत नहीं आते हैं।

महोदय उपरोक्त दिये गये आधारों के लिये उत्तरदायी कौन है इस तथ्य की जांच की आवश्यकता है जिसके लिये निम्न बिन्दुओं का संज्ञान लिया जाना भी अनिवार्य है-

1- जिला ग्राम्य विकास अभिकरण के स्टाफिंग पैटर्न में परिवर्तन करने एवं पद सृजन कराने का उत्तरदायित्व 31 वर्षो से कार्यरत कम्प्यूटर कर्मियों पर तो हो नहीं सकता, गहन जांच का विषय है।

2- जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में 31 वर्षों से कार्यरत समस्त संविदा कम्प्यूटर कर्मचारियों को डीआरडीए के अन्य कर्मचारियों के साथ ही डीआरडीए की प्रशासनिक मद से वेतन का भुगतान किया जाता है न कि किसी योजना से। इस मद में भारत सरकार व प्रदेश सरकार द्वारा आने वाले व्यव को वहन किया जाता है। पूर्व में यह व्यवस्था 75ः25 के अनुपात में थी जिसको वर्तमान में 60ः40 निर्धारित कर दिया गया है। दिनांक 18-07-2016 से संविलियन किये गये 954 कर्मचारियों में लगभग 200 से ऊपर कर्मचारी आज दिनांक तक सेवानिवृत्त हो चुके है जिनका व्ययभार कम हो चुका है। फिर 71 कर्मचारियों के विनियमितीकरण से किस प्रकार का अतिरिक्त व्ययभार आयेगा जिसको स्वशासी संस्था वहन करने में सक्षम नहीं है।


3- वित्त विभाग द्वारा जारी किये गये शासनादेश से आच्छादित होने के कारण ही शासन व आयुक्त,ग्राम्य विकास विभाग द्वारा पत्राचार किया गया। पत्रावली 198/आईआरडी/188 पर वित्त विभाग व कार्मिक विभाग से सहमति प्राप्त कर पत्रावली को दो-दो बार माननीय मुख्यमंत्री जी के अनुमोदन हेतु प्रेषित क्यों  किया गया, नियमावली सिर्फ सरकारी विभागों के लिये ही क्यों बनायी गयी, गहन जांच का विषय है।


4- जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में कार्य कर रहे समस्त कर्मी सीधी भर्ती के कर्मचारी है चाहे वह नियमित वेतनमान में कार्य कर रहे हों अथवा संविदा पर क्योंकि संविदा पर रखे गये कम्प्यूटर कर्मियों की भर्ती हेतु वहीं प्रक्रिया जनपद स्तर पर अपनायी गयी जोकि सीधी भर्ती के कर्मियों के लिये अपनायी गयी। फिर इस प्रकार का भेद क्यों?, जांच का विषय है।


उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह ग्राम्य विकास विभाग के उच्चाधिकारियों की हठधर्मिता का परिणाम मात्र है और कुछ नहीं। जानबूझकर इन अधिकारियों द्वारा 71 परिवारों के जीवन को बर्बाद किया गया है। महोदय इसकी जांच गहनता से किसी स्वतंत्र संस्था के माध्यम से करायी जानी चाहिये।

द- जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में कार्यरत सीधी भर्ती के कर्मियों का संविलियन- दिनांक 18-07-2016 को जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में कार्यरत सीधी भर्ती के 995 कर्मियों में से 954 कर्मियों जिन्होने विकल्प को भरा था, का संविलियन विकास विभाग में कर दिया गया। परन्तु इस संविलियन में भी हम लोगों को नेगलेक्ट कर दिया गया जबकि ग्राम्य विकास, भारत सरकार के स्पष्ट निर्देश है कि जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों के ।सस कतकं इवतद मउचसवलममे का संविलियन किया जाये। परन्तु हम 85 कर्मचारियों को छोड़कर जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों में कार्यरत सीधी भर्ती के 995 कर्मियों में से 954 कर्मियों जिन्होने विकल्प को भरा था, का संविलियन विकास विभाग में कर दिया गया। इस संविलियन में हम लोगों को शामिल ही नहीं किया गया है। इस सारे विवरण में महोदय हम लोगों का कसूर क्या था आज तक समझ नहीं आया। अन्ततः हम लोगों को इस कगार में लाकर छोड़ दिया गया है जहां पर कोई भी उम्मीद की किरण दिखाई नहीं देती है।


य- दिनांक 9 नवम्बर वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना हुयी थी। तत्समय उत्तराखण्ड के जनपदों व संयुक्त विकास आयुक्त कार्यालयों में कार्यरत लगभग 15 संविदा पर कार्य कम्प्यूटर प्रोग्रामर जोकि ग्राम्य विकास विभाग उत्तर प्रदेश के वर्ष 1989 में जारी इसी शासनादेश अन्तर्गत नियुक्त किये गये थे, उत्तराखण्ड सरकार द्वारा जिला ग्राम्य विकास अभिकरण के सीधी भर्ती के कर्मियों के संविलियन के समय उन सभी संविदा पर नियुक्त कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स को संख्या सहायक के रिक्त पदों पर समायोजित कर दिया गया। परन्तु ग्राम्य विकास विभाग उत्तर प्रदेश हम लोगों के सम्बन्ध में हमेशा से ही तटस्थ और निर्दयी रहा है, जिसकी परिणति हम लोगों की दयनीय स्थिति के रुप में स्पष्ट है।


र- ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों हेतु जारी किये गये स्टाफिंग पैटर्न में प्रोग्रामर का पद न होने पर उनसे मात्र दो या तीन बार पत्र प्रेषित कर अनुरोध किया गया (संलग्न) जबकि ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों हेतु जारी किये गये स्टाफिंग पैटर्न के पैरा 4ः2 में पहले से ही स्पष्ट किया गया है कि प्रदेश सरकार अपनी आवश्यकतानुसार उक्त स्टाफिंग पैटर्न में आवश्यक परिवर्तन कर सकती हैं परन्तु इस बात का ध्यान रखा जाये कि उक्त बेसिक  स्ट्रक्चर प्रभावित न हो। इस प्रावधान का उपयोग हम लोगों के नियमितीकरण हेतु कदापि नहीं किया गया इसका उत्तरदायी कौन है? इसकी जांच की जाये और साथ ही इस तथ्य की भी गहन जांच की जाये कि इस व्यवस्था में 31 वर्षों से हम लोगों को गिरमिटिया लेबर बनाकर हमारा पूरा का पूरा जीवन और भविष्य पूर्ण रुप से बर्बाद करने के लिये कौन-कौन दोषी है? उनके विरुद्ध विधिक कार्यवाही भी संस्थित की जाये। 

अतः हम लोगों के साथ 31 वर्षों के सेवाकाल में विभाग द्वारा किये गये सौतेले और जीवन बर्बाद किये जाने वाले व्यवहार के लिये कौन-कौन जिम्मेदार है उसकी गहन जांच किसी स्वतंत्र सक्षम संस्था से करायी जाये जो कि इस विभाग के उच्चाधिकारियों की परिधि में न आती हो। 31 वर्षों से लम्बित शोषण की जांच निम्न बिन्दुओ पर की जाये

1- वर्ष 1988-1989 से जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों पर संविदा पर रखे गये कम्प्यूटर प्रोग्रामर व कम्प्यूटर आपरेटर का बिना पद सृजित कराये लगभग 85 कर्मचारियों को संविदा पर 31 वर्षों पर क्यों रखा गया? 

2- विभाग को इन पदों की नितान्त आवश्यकता थी तो ग्राम्य विकास विभाग भारत सरकार द्वारा निर्धारित स्टाफिंग पैटर्न में के पैरा 4ः2 में दिये गये प्रावधानों अन्तर्गत उक्त पदों को सृजित कर हम लोगों को निर्धारित वेतनमानों अन्तर्गत् नियमित क्यों नहीं किया गया?

3- पैरा ’’ब’’ में दिये गये वेतनवृद्धि का आधार क्यों बदला गया और उसको वेतनमान में निर्धारण से हटाकर प्राईस इन्डेक्स के आधार पर क्यों किया गया तथा वेतनवृद्धि करते समय कर्मचारियों के सेवाकाल को ध्यान में क्यों नहीं रखा गया?
4- पैरा ’’अ’’ अन्तर्गत 31 वर्षां में उल्लिखित प्रेषित प्रस्तावों का क्या औचित्य था जब उन पर कोई कार्यवाही हीं नहीं की जानी थी तो उनका क्या उपयोग हुआ? बस इतना कि हम लोगों को झांसे में रखकर पूरा का पूरा जीवन हीं बर्बाद कर दिया गया। इसका उत्तरदायित्व का निर्धारण करते हुये जबावदेही निर्धारित करते हुये जांच की जाये।
5- वर्ष 2015 मे सरकार द्वारा प्रदेश के राजकीय विभागों,स्वशासी संस्थाओं, सार्वजनिक उपक्रमों/निगमों, स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों एवं जिला पंचायतों में दिनांक 31-03-1996 व दिनांक 31 दिसम्बर, 2001 तक नियुक्त दैनिक वेतन/ वर्कचार्ज एवं संविदा कार्मिकों के विनियमितिकरण का नीति का पालन करते हुये उक्त शासनादेश की परिधि में आने वाले 71 संविदा कर्मियों के विनियमितीकरण की जो कार्यवाही विभाग द्वारा समय-समय पर की गयी (पत्रावली 198/आईआरडी/88 नोट शीटस सं0 411 से 495 ) उसको निर्दयी हठधर्मिता/भ्रष्टाचार के चलते क्यों रोका गया? पत्रावली को दिनांक बिना किसी कारण के उच्चाधिकारियों द्वारा प्रमुख सचिव, वित्त विभाग से वापस लाकर  1 वर्ष तक लम्बित क्यों रखा गया?
6- भारत सरकार के निर्देशों के क्रम में दिनांक 18-7-2016 को जिला ग्राम्य विकास अभिकरणों के सीधी भर्ती के 995 कर्मियों में से 954 कर्मियों का जिन्होनें विकल्प चुना, का संविलियन लाईन डिपार्टमेंट में करते हुये सीधी भर्ती के 85 संविदा कर्मियों को क्यों छोड़ा गया जबकि भारत सरकार के निर्देश थे कि All DRDA borne employees का संविलियन किया जाये?

7- पत्रावली 198/आईआरडी/88 में आयुक्त,ग्राम्य विकास उत्तर प्रदेश द्वारा रिक्त संख्या सहायकों के पदों पर समायोजन की अनुमति प्रदान करने हेतु प्रस्ताव को परिवर्तित कर पत्रावली को विगत 4 वर्षों से लटकाकर क्यों रखा गया और अन्ततः यह कहकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया कि यह लोग जो विगत 4 वर्षोंसे वित्त विभाग द्वारा जारी शासनादेशों से आच्छाति थे अचानक आच्छादित नहीं होते हैं, की गहन जांच अवश्य की जाये जिससे व्याप्त भ्रष्टाचार के कई पर्दे अपने आप ही खुल जायेगें।
8- वर्ष 1989 से 31 वर्षो से उपरोक्त वर्णित विभाग जैसे संगठित क्षेत्र में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की सघन जांच किया जाना अत्यन्त ही आवश्यक है। तभी न्याय की कोई उम्मीद जागृत होगी।महोदय आपसे करबद्ध पुनश्च अनुरोध है कि विगत 31 वर्षों में जिला ग्राम्य विकास अभिरकरणों व संयुक्त विकास आयुक्त कार्यालयों में संविदा पर कार्यरत कम्प्यूटर कर्मियों के जीवन को बर्बाद करने के किस-किस स्तर पर कौन-कौन कर्मचारी/अधिकारी/उच्चाधिकारी उत्तरदायी है की गहन जांच किसी स्वतंत्र,निष्पक्ष व स्वतंत्र संस्था से कराये जाने हेतु आदेश पारित करने की कृपा करें जोकि इस विभाग के उच्चाधिकारियों के प्रभाव में न आती हो।