#RTIBachao

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हमारी मूलभूत सूचना के अधिकार को कमजोर करने की एक चाल है। यह हमें भ्रष्टाचार को उजागर करने और जवाबदेही पाने से रोकेगा। बिल संसद द्वारा पारित किया गया है और राष्ट्रपति के पास उनकी सहमति के लिए जाएगा। हम उनसे उनकी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की अपील कर रहे हैं। यदि आप हमारे पेटीशन पर हस्ताक्षर करते हैं तो हम सफल हो सकते हैं।

महामहिम राष्ट्र्रपति जी,
 
मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूँ कि सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन की बिल पर हस्ताक्षर ना करें। मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप इस बिल को संसद में वापस भेजें ताकि इसपर दुबारा विचार किया जाए। RTI Act 2005 के तहत कोडिफाई किया गया ये अधिकार सभी भारतीयों के लिए बहुत ज़रूरी है। इस अधिकार को दुनियाभर में पारदर्शिता के लिए बने कानूनों में सबसे बेहतर में से एक कहा गया है।
 
नागरिकों ने इस कानून के इस्तेमाल से सरकार की निगरानी और उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करना अभी शुरू ही किया है। ये कानून कहता है कि सरकार के पास जो भी सूचना होती है, उसपर जनता का अधिकार होता है क्योंकि देश में “जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा” का राज होता है। जो सूचना इसके दायरे में नहीं आती वो इस कानून के सेक्शन 8 और 9 में दर्ज है।

जब भी सरकार किसी नागरिक को वो सूचना नहीं देती जो इस कानून के दायरे से बाहर नहीं है तो वो नागरिक सूचना आयोग के पास जा सकता है। इसके बाद आयोग की ज़िम्मेदारी होती है कि वो नागरिकों के सूचना के अधिकार की रक्षा करे। सूचना आयोग, सूचना के अधिकार कानून की ही देन हैं। इसलिए उनका सरकार के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रहना बहुत ज़रूरी है ताकि वो अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।

पहली RTI बिल, जो दिसंबर 2004 में संसद में रखी गई उसमें प्रस्तावित किया गया कि मुख्य आयुक्त का पद सरकार के सचिव के समान और अन्य आयुक्तों का पद संयुक्त सचिव के समान होना चाहिए।

इस बिल को संसदीय समिति के पास भेजा गया, जिसने 6 बार मीटिंग कर के इसपर चर्चा की। इसने आयुक्तों की शक्तियों, उनके कार्यकाल के संदर्भ में प्रस्तावित किया, “ये बात इस बिल की जान है क्योंकि सूचना पर पहुँच का तंत्र इसबात पर निर्भर करेगा कि सिस्टम कितना प्रभावशाली है। इसलिए ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सूचना आयोग तथा उसके पदाधिकारी पूरी स्वतंत्रता और स्वतंत्र प्रभार के साथ काम करें। इसके लिए ज़रूरी है कि इस आयोग को भारत के निर्वाचन आयोग के जैसा दर्जा दिया जाना चाहिए।”

आपको ये बातें ज्ञात होंगी क्योंकि स्वयं आप इस समिति के एक अहम मेंबर थे और आपने इसमें अपना बहुमूल्य योगदान दिया था। मौजूदा संशोधन उपरोक्त बातों को बदलने पर ज़ोर दे रहा है और इसको जल्दबाजी में पास किया जा रहा है। इस संशोधन की बाबत तर्क-वितर्क को तरजीह नहीं दी जा रही है और उस समिति के प्रस्तावों को बदला जा रहा है।

जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप इस दिशा में संसद का ध्यान ले आएं और RTI में संशोधन की इस बिल को दुबारा विचार के लिए भेजें।

भवदीय,

शैलेश गांधी
पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त