Free Natasha and Devangana from draconian UAPA - uphold their democratic right to dissent

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The Hon’ble President

Republic of India

We, as concerned citizens of this country, bring to your notice the recent arrests of several human rights defenders, many of whom are bright students and media activists, who are the future of Indian polity. It is painful to see that these students, who were exercising their right to dissent and opposing the controversial Citizenship Amendment Act (CAA), have been arrested under the draconian Unlawful Activities Prevention Act (UAPA), falsely charging them of terrorist activities. It is a shameful moment for the world’s largest democracy when the UN experts under the Special Procedures of the Human Rights Council, taking note of the situation, have had to call for the immediate release of these students. UN experts urge India to release protest leaders

Among these arrested students are two research scholars Devangana Kalita and Natasha Narwal who were arrested on May 23, 2020, the former an MPhil scholar, and the latter, working on her Ph.D. thesis. These students were initially arrested for their involvement in the anti-CAA agitation in Delhi. Subsequently, after bail was granted by the Hon’ble Court, they were re-arrested on other serious charges, linking them to the violence that broke out in Delhi in February this year, and charged under the UAPA, an Act supposed to be used against terrorists, getting bail under which is more or less impossible. This indicates a pre-determined malicious intent of the law enforcement agencies against these students.

27 years old M. Phil researcher Safoora Zargar, three months into her pregnancy at the time of her arrest in April (Out on temporary bail, but UAPA case continues) is another young student facing inhuman treatment by authorities. 

The only crime of these students appears to be that they are thinking individuals, articulate and sensitive towards the inequalities prevailing in the society. These students are actively engaged with social issues on the ground, readily working towards the creation of a harmonious society with equal respect and rights for all citizens irrespective of caste, creed, religion, or any other denomination. Towards fulfillment of this constitutional duty, they exercised their right to dissent against the divisive policy of the current Union Government in the form of controversial CAA. It does stretch one’s imagination to think that they would be engaged in activities that necessitated their imprisonment under the UAPA, the nature and purpose of which we are all aware of.

It is indeed a dark chapter in the history of a democratic country when voices of the young generation are being muzzled. Even as these students have been incarcerated, no action has till date been taken against those who were publicly, even in the presence of police personnel, seen to be inciting people to violate law and order.

Moreover, these students have been imprisoned at a time when our country is fighting a battle against the COVID-19 pandemic. All crowded places, including jails, are considered to be hotspots for the spread of the dreaded virus and Hon’ble courts have already issued notice to decongest prisons. This is an added threat to their health and wellbeing.

These arrests are clearly being done in a manner and with an objective of instilling fear among the civil society activists as also the public at large that any opposition to or criticism of the current political regime would be dealt with a heavy hand without any consideration of the democratic rights of the people.

In such a situation where the ruling dispensation is acting in such an authoritarian manner, the only course left for those who feel that injustice is being done is to appeal to your sensibility and demand that cases against these students be withdrawn and that human rights be upheld in India. We appeal to you and hope that your sage advice, in your capacity as the Head of the State, would prevail upon the government.

माननीय राष्ट्रपति 
भारतीय गणतंत्र

हम, इस देश के नागरिक, आपके संज्ञान में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, जिनमें से कई होनहार छात्र और मीडिया कार्यकर्ता हैं, को लाना चाहते हैं। ये भारतीय राजनीति का भविष्य हैं। यह देखना दर्दनाक है कि विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विरोध करने के अपने अधिकार का प्रयोग करने वाले इन छात्रों को भयानक गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया है, जो उन्हें आतंकवादी गतिविधियों के लिए गलत ढंग से दोषी करार देता है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक शर्मनाक क्षण है जब संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों को, मानव अधिकार परिषद की विशेष प्रक्रियाओं के तहत, स्थिति का ध्यान रखते हुए, इन छात्रों की तत्काल रिहाई के लिए आह्वान करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने भारत को अनुरोध किया है कि इन विरोध करने वाले नेताओं को छोड़ा जाए। 

इन गिरफ्तार लोगों में दो शोध विद्यार्थी देवांगना कलिता और नताशा नरवाल भी शामिल हैं जिन्हें 23 मई, 2020 को गिरफ्तार किया गया था, देवांगना एमफिल की छात्रा है और नताशा अपने पीएचडी थीसिस पर काम कर रही है। इन छात्रों को शुरू में दिल्ली में CAA विरोधी आंदोलन में शामिल होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद, माननीय न्यायालय द्वारा जमानत दिए जाने के बाद, उन्हें अन्य गंभीर आरोपों के तहत फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, उन पर इस साल फरवरी में दिल्ली में हुई हिंसा से जोड़कर यूएपीए (जिस अधिनियम का इस्तेमाल आतंकवादियों के खिलाफ किया जाता है) के तहत आरोप लगाया गया, जिसके तहत जमानत मिलना लगभग असंभव है। यह इन छात्रों के खिलाफ कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पूर्व-निर्धारित दुर्भावनापूर्ण इरादे को इंगित करता है।

27 वर्षीया एम. फिल. शोधकर्ता सफूरा ज़र्गर, जो अप्रैल में अपनी गिरफ्तारी के समय तीन महीने की गर्भवती थी,  अधिकारियों द्वारा अमानवीय व्यवहार का सामना करने वाली एक और युवा छात्रा है जिसे अस्थाई जमानत पर रिहा किया गया है लेकिन उस पर यूएपीए अभी लागू है।

इन छात्रों का एकमात्र अपराध यह प्रतीत होता है कि वे समाज में व्याप्त असमानताओं के लिए मुखर और संवेदनशील सोच रखते हैं। ये छात्र जमीनी स्तर  पर सामाजिक मुद्दों के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं, जाति, पंथ, धर्म या किसी भी संप्रदाय के भेदभाव के बिना सभी नागरिकों के लिए समान सम्मान और अधिकारों के साथ समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में काम कर रहे हैं। इस संवैधानिक कर्तव्य की पूर्ति के लिए, उन्होंने विवादास्पद सीएए के रूप में वर्तमान केंद्र सरकार की विभाजनकारी नीति के खिलाफ असंतोष प्रकट करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया। यह किसी को भी सोचने के लिए मजबूर करता है कि वे उन गतिविधियों में संलिप्त होंगे जिनके कारण उन्हें यूएपीए (जिस की प्रकृति और उद्देश्य के बारे में हम सभी जानते हैं) के तहत कारावास में डालना जरूरी था। यह वास्तव में एक लोकतांत्रिक देश के इतिहास का एक काला अध्याय है जब युवा पीढ़ी की आवाज़ों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। यहां तक ​​कि जब इन छात्रों को कैद किया गया था, तब से उन लोगों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो सार्वजनिक रूप से पुलिस कर्मियों की उपस्थिति में  ही लोगों को कानून और व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए उकसाते हुए देखे गए। इसके अलावा, इन छात्रों को ऐसे समय में कैद किया गया है जब हमारा देश COVID-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है। जेलों सहित सभी भीड़भाड़ वाले स्थानों को इस खूंखार वायरस के प्रसार के लिए हॉटस्पॉट माना जाता है और माननीय न्यायालयों ने पहले से ही जेलों में भीड़ कम करने का नोटिस जारी कर दिया था। यह उनके स्वास्थ्य के लिए एक अतिरिक्त खतरा है।

ये गिरफ्तारियां एक खास तरह से नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं में भय पैदा करने के उद्देश्य से की जा रही हैं और साथ ही साथ जनता को यह भी बताया जा रहा है कि वर्तमान राजनीतिक शासन के किसी भी विरोध या आलोचना से, बिना कोई विचार किए, सख्ती से निपटा जाएगा। 

ऐसी स्थिति में जहां सत्तारूढ़ दल इस तरह से अधिनायकवादी तरीके से कार्य कर रहा है, तब उन लोगों के लिए, जो महसूस करते हैं कि अन्याय किया जा रहा है, एक ही रास्ता बचता है कि वे आपके समक्ष अपील करें और मांग करें कि इन छात्रों के खिलाफ मामले वापस ले लिए जाएं और इनके मानवाधिकारों को बरकरार रखा जाए। हम आपसे अपील करते हैं और आशा करते हैं कि राज्य के प्रमुख के रूप में आपकी सलाह, सरकार को सकारात्मक कार्यवाही के लिए प्रेरित करेगी।