Support Democratic Funding System to Political Parties- RDR

The Issue

याचिका की विषय वस्तु 

1. बाज़ार की व्यवस्था मेंFund fo Justice in Democracy (इस Link द्वारा विस्तार से जानें) सभी लोग जिसका काम करते है, उससे पैसा लेते है। लेकिन जनप्रतिनिधि जिसका काम करता है, उससे पैसा नहीं लेता। इसलिए जनप्रतिनिधित्व के नाम पर नेता लोग वफादारी के साथ अपने वोटरों की वकालत नहीं करते। 99% वोटर अपने जनप्रतिनिधि को पैसा नहीं देते, इसलिए जनप्रतिनिधि 99% लोगों का केवल आभासी जनप्रतिनिधि होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस “चुनाव तंत्र” को “लोकतंत्र” कहने की प्रथा चल रही है, वह चुनाव तंत्र मात्र 1% लोकतंत्र है। 99% लोकतंत्र नहीं है। वह 1% लोगों के लिए लोकतंत्र है। 99% बहुसंख्यकों के ऊपर 1% अति धनवान अल्पसंख्यकों की तानाशाही है। इसलिए इसको लोकतंत्र कदापि नहीं कहा जा सकता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि चुनाव लोकतंत्र स्थापित करने का कोई माध्यम नहीं है। लोकतंत्र स्थापित करने के माध्यम की खोज करना अभी बाकी है। आरडीआर की परिकल्पना ऐसा ही एक माध्यम है, जिससे लोकतंत्र पैदा हो सकता है.

2. अगर समाज के बहुसंख्यक लोगों के पास अपने जनप्रतिनिधि को उसकी सेवाओं के बदले भुगतान करने के लिए पैसा नहीं है, तो सरकार को चाहिए कि वह वोटरों को पैसा दे, जिससे वोटर लोग अपने मनपसंद जनप्रतिनिधि को भुगतान करके चुनाव जीतने में मदद कर सकें। केन्द्र  सरकार वोटरों को पैसा इसलिए दे, क्योंकि सरकार ने करेंसी नोट छापने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है। सरकार यदि सभी वोटरों को वोट के अधिकार के साथ-साथ प्रतिमाह कुछ नकद रकम देने लगे, तब चुनाव तंत्र में भी लोकतंत्र के पौधे का अंकुरण हो सकता है। जब लोकतंत्र पैदा हो, तब लोकतांत्रिक कानून बन सकेंगे। जब लोकतांत्रिक कानून बनेगे, तभी कानून और संविधान की किताबों में लिखे हुए अधिकारों का उपभोग करने की क्षमता सभी वोटर हासिल कर सकेंगे। आज सभी लोगों को रोजगार का अधिकार तो है, लेकिन रोजगार नहीं है। सभी लोगों को न्यायालयों से न्याय पाने का अधिकार तो है, लेकिन न्याय प्राप्त नहीं होता। अपने जनप्रतिनिधि के माध्यम से अपने सामूहिक हितों पर कानून बनवाने का अधिकार प्राप्त तो है, लेकिन बहुसंख्यक वोटरों को आर्थिक न्याय देने के लिए कानून नहीं बनते। इसीलिए पार्टिया बदलती रहती हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन बहुसंख्यक समाज पर अल्पसंख्यक समाज का आर्थिक जुल्म चलता रहता है। सत्ता के ऊंट की पीठ पर कोई भी बैठे, सभी लोग कमर हिलाते हुए दिखते हैं।

3. अल्पसंख्यक धनवानों के हित में काम करने वालों को पैसा मिल जाता है. किन्तु बहुसंख्यक समाज को आर्थिक न्याय देने के लिए काम करने वालों पैसा नहीं मिलता। इसलिए बहुसंख्यक समाज के सामूहिक आर्थिक हितों के लिए कोई कानून नहीं बन पाते. जो आधे अधूरे कानून बने भी हैं, वह लागू नहीं हो पाते। अल्पसंख्यक धनवान लोगों के हितों के लिए और सरकारी कर्मचारियों के हितों के लिए सरकार करेंसी नोट छाप लेती है और उनमें बांट देती है। लेकिन बहुसंख्यक समाज को छपी नोट में से कोई हिस्सा नहीं देती। सस्ते मजदूरों के सुलभता के लिए और सस्ते निर्यात के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी बहुसंख्यक समाज को जानबूझकर सरकारें आर्थिक तंगी में रखती हैं। इसलिए जरूरत से ज्यादा उत्पादन होने के बावजूद भी बहुसंख्यक समाज की पहुंच अनाज, कपड़े, बिल्डिंग मटेरियल, दवाइयों, शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं तक नहीं बन पाती। यह कृतिम आर्थिक तंगी वास्तव में गरीबी नहीं है, अपितु आर्थिक गुलामी है। आर्थिक गुलामी सरकार प्रायोजित आभासी लोकतंत्र के कारण है. आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में रूपांतरित करने के लिए 21 वीं शताब्दी में लोकवित्त और राजनीतिक वित्त के क्षेत्र में कुछ उपाय किया जाना अपरिहार्य है। जिससे बहुसंख्यक समाज की आर्थिक गुलामी खत्म हो सके, जिससे कानूनी, संवैधानिक, मानवाधिकारों और वैश्विक अधिकारों का उपभोग करने का अधिकार सभी को प्राप्त हो सके, जिससे न्यायालयों से न्याय प्राप्त करना और विधायिका से न्यायप्रिय कानून प्राप्त करना संभव हो सके तथा जिससे सरकारों के शासन और प्रशासन से लोगों की सेवा हो सके, जिससे कथित लोकतांत्रिक शासन और प्रशासन बहुसंख्यक समाज के दमन और शोषण का जरिया न बना रह सके. आरडीआर की परिकल्पना लोकवित्त और राजनीतिक वित्त के क्षेत्र में प्रस्तावित एक ऐसा ही उपाय है।

4. कारपोरेट घराने चंदे के नाम पर एक रूपया राजनीतिक दलों में निवेश करके सैकड़ों, यहां तक कि कभी-कभी हजार गुना रकम भ्रष्ट तरीके से वापस वसूल लेते हैं। यह आर्थिक बोझ समाज के बहुसंख्यक निम्न व मघ्य वर्ग पर पड़ता है. कारपोरेट घराने सत्ता में आई पार्टी के नेताओं से गैरकानूनी काम और भ्रष्टाचार करवाने के लिए उन्हें चंदा देते हैं और साथ ही साथ प्रमुख विपक्षी दलों को भी चंदा देते रहते हैं। जब चुनाव के बाद पहली पार्टी की जगह विपक्षी पार्टी सत्ता में आती है, तो यह कारपोरेट घराने उससे भी जन विरोधी व गैर कानूनी काम और भ्रष्टाचार करवाते हैं। जिसकी वजह से सत्ताधारी पार्टी बदलने के बावजूद आम जनता को सत्ता परिवर्तन का लाभ, विशेषकर अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता।

5. यह सर्वविदित है कि संसदीय लोकतंत्र संचालित करने का दायित्व राजनीतिक दलों पर होता है किंतु चंदे और मीडिया की ताकत से कारपोरेट घराने सत्ताधारी राजनीतिक दलों को और सरकार को स्वयं संचालित कर रहे हैं। इसके कारण पूरा संसदीय लोकतंत्र व संपूर्ण संवैधानिक मशीनरी जनमत से संचालित होने की बजाय गिने-चुने कारपोरेट घरानों की निजी इच्छा से संचालित हो रही है। लोकतंत्र बहुमत की बजाय अल्पमत से संचालित हो रहा है। यानी लोकतांत्रिक राज्य की मृत्यु हो चुकी है और संवैधानिक मशीनरी का विध्वंस होने की परिस्थिति पैदा हो चुकी है।

6. आर्थिकरूप से निम्न व मध्यम वर्ग को आर्थिक न्याय दिलाने के उद्देश्य को प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा है-कारपोरेट संस्थानों के असीम धन की ताकत से संचालित बड़े राजनीतिक दल और उनके मीडिया संस्थानों द्वारा निर्मित व निर्देशित किया जाने वाला जनमत। चुनावतंत्र से लोकतंत्र भी पैदा हो सके, इसके लिए कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए, क्योकि जनप्रतिनिधि जनता का प्रतिनिधि होता है, कंपनियों का नहीं. चूंकी कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने पर रोक नहीं है; इसलिए जनप्रतिनिधि “कंपनी प्रतिनिधि” की तरह काम करने को विवश हैं। इसीलिये वर्त्तमान शासन तंत्र को “लोकतंत्र” कदापि नहीं कहा जा सकता। इसे “कम्पनीतंत्र” कहा जाना चाहिए। कंपनियों द्वारा चंदा देने पर रोक लगाने वाला कानून बनने के बावजूद यदि चोरी-छिपे कोई कारपोरेट घराना किसी राजनीतिक दल को चंदा देता है तो उसे अपराध की श्रेणी का कार्य माना जाना चाहिए।

7. उक्त परिस्थितियों को देखते हुए आरडीआर एक ऐसा प्रस्तावित उपाय है जो सरकार और बाजार से बहिष्कृत किए गए बेरोजगार युवक-युवतियों को सामाजिक और राजनैतिक सेवाा करने का अवसर  दे सकता है और उनके द्वारा किए गए सामाजिक और राजनीतिक सुधारों संबंधी कार्यों के बदले कुछ समय अंतराल के बाद अनिश्चित भविष्य में भुगतान देने का माध्यम बन सकता है और एक ही समुदाय की समस्या पर काम करने वाले तमाम सामाजिक व राजनीतिक संगठनो की एकजुट ताकत पैदा कर सकता है। आर्थिक अन्याय की एक ही पीड़ा से पीड़ित लोगों की ताकत उतने टुकड़ों में टूट जाती है, जितने राजनीतिक दल बनते हैं। इसका कारण यह होता है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के कारण एक से अधिक राजनीतिक दलों का सदस्य नहीं बन सकता। किंतु एक से अधिक राजनीतिक दलों को चंदा दे सकता है। अधिनियम में यह धारा चंदा देने वाले कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा जुड़वाई गई है, जिससे कॉर्पोरेट सभी दलों का लाभ उठा सकें और बाकी समाज के लोग केवल एक ही दल का लाभ उठा सकें। इसीलिए कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जो अलग-अलग दलों के सदस्यों को एक मंच उपलब्ध कराता हो और उनको एकजुट बने रहने का अवसर वापस उन्हें देता हो।

8. आरडीआर एक ऐसा उपाय है जिससे सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के संचालन का खर्च स्वयं निम्न व मध्यम वर्ग के लोग ही उठा पाएंगे।

9. आरडीआर एक ऐसा उपाय है जिससे कारपोरेट मीडिया के विकल्प के तौर पर वोटर मीडिया का नेटवर्क गांव-गांव मोहल्ला मोहल्ला खड़ा हो जाए, जिसमें शिशु स्वरूप वोटरों को कारपोरेट मीडिया द्वारा प्रचारित आत्मघाती कार्यक्रमों का समर्थन करके नुकसान उठाने से सुरक्षित रखा जा सकेगा और उनको उनके आर्थिक हितों के अनुरूप सूचनाएं व मार्गदर्शन नियमित मिलता रह सकेगा।

10. आरडीआर एक ऐसा उपाय है; जिससे सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने सदस्यों और सभी कार्यकर्ताओं के आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए दलीय एकजुटता का अवसर मिल सके। सभी कार्यकर्ताओं को उनके काम के बदले आरडीआर के माध्यम से उनका भुगतान समय-समय पर मिलता रहेगा। आखिर हजारों कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करते हैं, तो चुनाव जीतने के बाद आर्थिक लाभ केवल एक ही कार्यकर्ता को क्यों मिलना चाहिए, जिसको पार्टी टिकट देती है?

11. आरडीआर एक ऐसा उपाय है; जिससे राज्य को फिर से जिंदा किया जा सकेगा और संवैधानिक मशीनरी को वापस पटरी पर लाया जा सकेगा।

प्रार्थना

1. सरकार को चाहिए कि वह आरडीआर की परिकल्पना में रचनात्मक सहयोग दे. जिससे गैर सरकारी संगठनों में या राजनीतिक दलों में शामिल होकर एक आम बेरोजगार इंसान भी समाज सुधार और राजनीतिक सुधार कार्यों में अपनी योग्यता और अपनी क्षमता के अनुरूप अपना योगदान दे सकें और सरकार से वेतन पा सके।

2. सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सक्षम कानूनों द्वारा बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजनीतिक दलों को चंदा एक ऐसी व्यवस्था के माध्यम से ही दे सकें, जिससे चंदा देने वाले को यह नहीं मालूम हो सके, कि उसने चंदा किसको दिया और चंदा लेने वाले को यह नहीं मालूम हो सके कि चंदा किससे मिला और अपना दिया हुआ चंदा या अपने द्वारा किये गये दीर्घकालिक निवेश के बदले अनिश्चितकालीन अवधि में इतनी राशि वापस पा सके, जिससे अधिक से अधिक लोग अधिक से अधिक चंदा देना पसंद करें।

3. धनवानों द्वारा दिया गया सारा चंदा सरकार के माध्यम से वोटरों के खातों में बराबर बराबर बंट जाए। फिर वोटर अपने मनपसंद मीडिया संस्थान को, नेता को और पार्टी को नियमित देता रहे। इससे मीडिया तंत्र, राजनीतिक पार्टियां, विधानसभाएं, संसद और सरकारें जनता की इच्छा के अनुरूप संचालित हो सकेंगी। यानी लोकतंत्र पैदा हो सकेगा।

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The Issue

याचिका की विषय वस्तु 

1. बाज़ार की व्यवस्था मेंFund fo Justice in Democracy (इस Link द्वारा विस्तार से जानें) सभी लोग जिसका काम करते है, उससे पैसा लेते है। लेकिन जनप्रतिनिधि जिसका काम करता है, उससे पैसा नहीं लेता। इसलिए जनप्रतिनिधित्व के नाम पर नेता लोग वफादारी के साथ अपने वोटरों की वकालत नहीं करते। 99% वोटर अपने जनप्रतिनिधि को पैसा नहीं देते, इसलिए जनप्रतिनिधि 99% लोगों का केवल आभासी जनप्रतिनिधि होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस “चुनाव तंत्र” को “लोकतंत्र” कहने की प्रथा चल रही है, वह चुनाव तंत्र मात्र 1% लोकतंत्र है। 99% लोकतंत्र नहीं है। वह 1% लोगों के लिए लोकतंत्र है। 99% बहुसंख्यकों के ऊपर 1% अति धनवान अल्पसंख्यकों की तानाशाही है। इसलिए इसको लोकतंत्र कदापि नहीं कहा जा सकता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि चुनाव लोकतंत्र स्थापित करने का कोई माध्यम नहीं है। लोकतंत्र स्थापित करने के माध्यम की खोज करना अभी बाकी है। आरडीआर की परिकल्पना ऐसा ही एक माध्यम है, जिससे लोकतंत्र पैदा हो सकता है.

2. अगर समाज के बहुसंख्यक लोगों के पास अपने जनप्रतिनिधि को उसकी सेवाओं के बदले भुगतान करने के लिए पैसा नहीं है, तो सरकार को चाहिए कि वह वोटरों को पैसा दे, जिससे वोटर लोग अपने मनपसंद जनप्रतिनिधि को भुगतान करके चुनाव जीतने में मदद कर सकें। केन्द्र  सरकार वोटरों को पैसा इसलिए दे, क्योंकि सरकार ने करेंसी नोट छापने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है। सरकार यदि सभी वोटरों को वोट के अधिकार के साथ-साथ प्रतिमाह कुछ नकद रकम देने लगे, तब चुनाव तंत्र में भी लोकतंत्र के पौधे का अंकुरण हो सकता है। जब लोकतंत्र पैदा हो, तब लोकतांत्रिक कानून बन सकेंगे। जब लोकतांत्रिक कानून बनेगे, तभी कानून और संविधान की किताबों में लिखे हुए अधिकारों का उपभोग करने की क्षमता सभी वोटर हासिल कर सकेंगे। आज सभी लोगों को रोजगार का अधिकार तो है, लेकिन रोजगार नहीं है। सभी लोगों को न्यायालयों से न्याय पाने का अधिकार तो है, लेकिन न्याय प्राप्त नहीं होता। अपने जनप्रतिनिधि के माध्यम से अपने सामूहिक हितों पर कानून बनवाने का अधिकार प्राप्त तो है, लेकिन बहुसंख्यक वोटरों को आर्थिक न्याय देने के लिए कानून नहीं बनते। इसीलिए पार्टिया बदलती रहती हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन बहुसंख्यक समाज पर अल्पसंख्यक समाज का आर्थिक जुल्म चलता रहता है। सत्ता के ऊंट की पीठ पर कोई भी बैठे, सभी लोग कमर हिलाते हुए दिखते हैं।

3. अल्पसंख्यक धनवानों के हित में काम करने वालों को पैसा मिल जाता है. किन्तु बहुसंख्यक समाज को आर्थिक न्याय देने के लिए काम करने वालों पैसा नहीं मिलता। इसलिए बहुसंख्यक समाज के सामूहिक आर्थिक हितों के लिए कोई कानून नहीं बन पाते. जो आधे अधूरे कानून बने भी हैं, वह लागू नहीं हो पाते। अल्पसंख्यक धनवान लोगों के हितों के लिए और सरकारी कर्मचारियों के हितों के लिए सरकार करेंसी नोट छाप लेती है और उनमें बांट देती है। लेकिन बहुसंख्यक समाज को छपी नोट में से कोई हिस्सा नहीं देती। सस्ते मजदूरों के सुलभता के लिए और सस्ते निर्यात के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी बहुसंख्यक समाज को जानबूझकर सरकारें आर्थिक तंगी में रखती हैं। इसलिए जरूरत से ज्यादा उत्पादन होने के बावजूद भी बहुसंख्यक समाज की पहुंच अनाज, कपड़े, बिल्डिंग मटेरियल, दवाइयों, शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं तक नहीं बन पाती। यह कृतिम आर्थिक तंगी वास्तव में गरीबी नहीं है, अपितु आर्थिक गुलामी है। आर्थिक गुलामी सरकार प्रायोजित आभासी लोकतंत्र के कारण है. आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में रूपांतरित करने के लिए 21 वीं शताब्दी में लोकवित्त और राजनीतिक वित्त के क्षेत्र में कुछ उपाय किया जाना अपरिहार्य है। जिससे बहुसंख्यक समाज की आर्थिक गुलामी खत्म हो सके, जिससे कानूनी, संवैधानिक, मानवाधिकारों और वैश्विक अधिकारों का उपभोग करने का अधिकार सभी को प्राप्त हो सके, जिससे न्यायालयों से न्याय प्राप्त करना और विधायिका से न्यायप्रिय कानून प्राप्त करना संभव हो सके तथा जिससे सरकारों के शासन और प्रशासन से लोगों की सेवा हो सके, जिससे कथित लोकतांत्रिक शासन और प्रशासन बहुसंख्यक समाज के दमन और शोषण का जरिया न बना रह सके. आरडीआर की परिकल्पना लोकवित्त और राजनीतिक वित्त के क्षेत्र में प्रस्तावित एक ऐसा ही उपाय है।

4. कारपोरेट घराने चंदे के नाम पर एक रूपया राजनीतिक दलों में निवेश करके सैकड़ों, यहां तक कि कभी-कभी हजार गुना रकम भ्रष्ट तरीके से वापस वसूल लेते हैं। यह आर्थिक बोझ समाज के बहुसंख्यक निम्न व मघ्य वर्ग पर पड़ता है. कारपोरेट घराने सत्ता में आई पार्टी के नेताओं से गैरकानूनी काम और भ्रष्टाचार करवाने के लिए उन्हें चंदा देते हैं और साथ ही साथ प्रमुख विपक्षी दलों को भी चंदा देते रहते हैं। जब चुनाव के बाद पहली पार्टी की जगह विपक्षी पार्टी सत्ता में आती है, तो यह कारपोरेट घराने उससे भी जन विरोधी व गैर कानूनी काम और भ्रष्टाचार करवाते हैं। जिसकी वजह से सत्ताधारी पार्टी बदलने के बावजूद आम जनता को सत्ता परिवर्तन का लाभ, विशेषकर अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता।

5. यह सर्वविदित है कि संसदीय लोकतंत्र संचालित करने का दायित्व राजनीतिक दलों पर होता है किंतु चंदे और मीडिया की ताकत से कारपोरेट घराने सत्ताधारी राजनीतिक दलों को और सरकार को स्वयं संचालित कर रहे हैं। इसके कारण पूरा संसदीय लोकतंत्र व संपूर्ण संवैधानिक मशीनरी जनमत से संचालित होने की बजाय गिने-चुने कारपोरेट घरानों की निजी इच्छा से संचालित हो रही है। लोकतंत्र बहुमत की बजाय अल्पमत से संचालित हो रहा है। यानी लोकतांत्रिक राज्य की मृत्यु हो चुकी है और संवैधानिक मशीनरी का विध्वंस होने की परिस्थिति पैदा हो चुकी है।

6. आर्थिकरूप से निम्न व मध्यम वर्ग को आर्थिक न्याय दिलाने के उद्देश्य को प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा है-कारपोरेट संस्थानों के असीम धन की ताकत से संचालित बड़े राजनीतिक दल और उनके मीडिया संस्थानों द्वारा निर्मित व निर्देशित किया जाने वाला जनमत। चुनावतंत्र से लोकतंत्र भी पैदा हो सके, इसके लिए कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए, क्योकि जनप्रतिनिधि जनता का प्रतिनिधि होता है, कंपनियों का नहीं. चूंकी कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने पर रोक नहीं है; इसलिए जनप्रतिनिधि “कंपनी प्रतिनिधि” की तरह काम करने को विवश हैं। इसीलिये वर्त्तमान शासन तंत्र को “लोकतंत्र” कदापि नहीं कहा जा सकता। इसे “कम्पनीतंत्र” कहा जाना चाहिए। कंपनियों द्वारा चंदा देने पर रोक लगाने वाला कानून बनने के बावजूद यदि चोरी-छिपे कोई कारपोरेट घराना किसी राजनीतिक दल को चंदा देता है तो उसे अपराध की श्रेणी का कार्य माना जाना चाहिए।

7. उक्त परिस्थितियों को देखते हुए आरडीआर एक ऐसा प्रस्तावित उपाय है जो सरकार और बाजार से बहिष्कृत किए गए बेरोजगार युवक-युवतियों को सामाजिक और राजनैतिक सेवाा करने का अवसर  दे सकता है और उनके द्वारा किए गए सामाजिक और राजनीतिक सुधारों संबंधी कार्यों के बदले कुछ समय अंतराल के बाद अनिश्चित भविष्य में भुगतान देने का माध्यम बन सकता है और एक ही समुदाय की समस्या पर काम करने वाले तमाम सामाजिक व राजनीतिक संगठनो की एकजुट ताकत पैदा कर सकता है। आर्थिक अन्याय की एक ही पीड़ा से पीड़ित लोगों की ताकत उतने टुकड़ों में टूट जाती है, जितने राजनीतिक दल बनते हैं। इसका कारण यह होता है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के कारण एक से अधिक राजनीतिक दलों का सदस्य नहीं बन सकता। किंतु एक से अधिक राजनीतिक दलों को चंदा दे सकता है। अधिनियम में यह धारा चंदा देने वाले कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा जुड़वाई गई है, जिससे कॉर्पोरेट सभी दलों का लाभ उठा सकें और बाकी समाज के लोग केवल एक ही दल का लाभ उठा सकें। इसीलिए कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जो अलग-अलग दलों के सदस्यों को एक मंच उपलब्ध कराता हो और उनको एकजुट बने रहने का अवसर वापस उन्हें देता हो।

8. आरडीआर एक ऐसा उपाय है जिससे सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के संचालन का खर्च स्वयं निम्न व मध्यम वर्ग के लोग ही उठा पाएंगे।

9. आरडीआर एक ऐसा उपाय है जिससे कारपोरेट मीडिया के विकल्प के तौर पर वोटर मीडिया का नेटवर्क गांव-गांव मोहल्ला मोहल्ला खड़ा हो जाए, जिसमें शिशु स्वरूप वोटरों को कारपोरेट मीडिया द्वारा प्रचारित आत्मघाती कार्यक्रमों का समर्थन करके नुकसान उठाने से सुरक्षित रखा जा सकेगा और उनको उनके आर्थिक हितों के अनुरूप सूचनाएं व मार्गदर्शन नियमित मिलता रह सकेगा।

10. आरडीआर एक ऐसा उपाय है; जिससे सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने सदस्यों और सभी कार्यकर्ताओं के आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए दलीय एकजुटता का अवसर मिल सके। सभी कार्यकर्ताओं को उनके काम के बदले आरडीआर के माध्यम से उनका भुगतान समय-समय पर मिलता रहेगा। आखिर हजारों कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करते हैं, तो चुनाव जीतने के बाद आर्थिक लाभ केवल एक ही कार्यकर्ता को क्यों मिलना चाहिए, जिसको पार्टी टिकट देती है?

11. आरडीआर एक ऐसा उपाय है; जिससे राज्य को फिर से जिंदा किया जा सकेगा और संवैधानिक मशीनरी को वापस पटरी पर लाया जा सकेगा।

प्रार्थना

1. सरकार को चाहिए कि वह आरडीआर की परिकल्पना में रचनात्मक सहयोग दे. जिससे गैर सरकारी संगठनों में या राजनीतिक दलों में शामिल होकर एक आम बेरोजगार इंसान भी समाज सुधार और राजनीतिक सुधार कार्यों में अपनी योग्यता और अपनी क्षमता के अनुरूप अपना योगदान दे सकें और सरकार से वेतन पा सके।

2. सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सक्षम कानूनों द्वारा बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजनीतिक दलों को चंदा एक ऐसी व्यवस्था के माध्यम से ही दे सकें, जिससे चंदा देने वाले को यह नहीं मालूम हो सके, कि उसने चंदा किसको दिया और चंदा लेने वाले को यह नहीं मालूम हो सके कि चंदा किससे मिला और अपना दिया हुआ चंदा या अपने द्वारा किये गये दीर्घकालिक निवेश के बदले अनिश्चितकालीन अवधि में इतनी राशि वापस पा सके, जिससे अधिक से अधिक लोग अधिक से अधिक चंदा देना पसंद करें।

3. धनवानों द्वारा दिया गया सारा चंदा सरकार के माध्यम से वोटरों के खातों में बराबर बराबर बंट जाए। फिर वोटर अपने मनपसंद मीडिया संस्थान को, नेता को और पार्टी को नियमित देता रहे। इससे मीडिया तंत्र, राजनीतिक पार्टियां, विधानसभाएं, संसद और सरकारें जनता की इच्छा के अनुरूप संचालित हो सकेंगी। यानी लोकतंत्र पैदा हो सकेगा।

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Petition created on 28 April 2021