आयुध निर्माणियों का निजीकरण करना बंद किया जाए

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नमस्कार

आयुध निर्माणियों के निगमीकरण की चर्चा मात्र से एक संवेदनशील कर्मचारी का रोम रोम सिहर उठता है । याद कीजिए वो दिन सन 1775 का जब सबसे पहले आयुध निर्माणियों को अस्तित्व में लाने का ख्याल ब्रिटिश प्राधिकारियों के मन मे आया होगा और फोर्ट विलियम , कोलकाता में इसकी स्थापना की स्वीकृति प्रदान की होगी । याद कीजिए जब सन 1801 में काशीपुर , कोलकाता में गन कैरिज एजेंसी की स्थापना करते हुए गौरव की अनुभूति हुई होगी । गर्व से सीना चौड़ा हो गया होगा जब 18 मार्च , 1802 से काशीपुर में उत्पादन की शुरूआत हुयी होगी । इस उद्योग में जब किसी माँ का बेटा नौकरी के लिए नियुक्त हुआ होगा तो उस माँ की खुशी ने पूरे घर मे आनंद के नए महोत्सव को जन्म दिया होगा ।

इसके बाद तो लगातार विभिन्न जगहों पर अलग अलग आयुध निर्माणियाँ खुलने शुरू हो गए । इसमें बनने वाले गोला बारूद देशभक्ति की भावना से पूर्ण दुश्मनों के हौसले पस्त करने में कामयाब होते गए । हिंदुस्तान में अपने तरह का यह पहला सरकारी उद्योग था जिसने न जाने कितने ही घरों में खुशियों के दीप जलाए । आजादी के समय तक 18 आयुध कारखाना खुल चुका था । समय बढ़ता गया, विरासत सजती चली गयी, आयुध कारखाना फलता फूलता चला गया, रोजगार के साधन बढ़ते चले गये । आयुध कारखाना खुलने का सिलसिला हिंदुस्तान की आजादी के बाद जारी रहा ।
आयुध कारखानों में बनने वाले गोला बारूदों ने समय समय पर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हिंदुस्तान के ऊपर आने वाले सीमा पार के खतरों से बचाने का काम किया चाहे चाइना युद्ध हो या कारगिल युद्ध या सर्जिकल स्ट्राइक । अभी हाल ही में चंद्रयान 2 के प्रक्षेपण में स्टेज सेपरेशन के लिए स्पेशल ग्रेड का RDX इसरो को सप्लाई किया था, आयुध निर्माणी भंडारा को इसके लिए जल्द ही ISRO से धन्यवाद पत्र आएगा ।

इसके ठीक विपरीत लौह युग से शुरू हुआ यह कारखाना कम्प्यूटर युग मे प्रवेश तो कर चुका है परंतु जहाँ देश में ट्रेन का आधुनिकीकरण मेट्रो और बुलेट ट्रेन के साथ हुआ, बैंकों में रजिस्टर की जगह कम्प्यूटर और पासबूक की जगह ATM और नेटबैंकिंग ने आधुनिकीकरण को अपनाया 2जी से 5जी तक पहुँच गया, ऐसे में आयुध निर्माणियों को आधुनिकीकरण से वंचित रखा गया । लेकिन फिर भी सीमित संसाधनों और मशीनरी के दम पर ही आयुध निर्माणियों के उत्पाद गुणवत्ता के सारे मानक को पूर्ण करता है ।

ऐसे में अचानक से 218 वर्षो के विरासत समेटे हुए आयुध निर्माणियों के विश्वसनीयता गुणवत्ता क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगना निश्चित तौर पर बुरे संकेत हैं । क्या इस धरोहर को जिसने राष्ट्र की अखंडता और अस्मिता कायम रखने में अहम भूमिका निभाई है, को निजी हाथों में देकर देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा के साथ खिलवाड़ तो नहीं किया जा रहा है ? आजादी से पूर्व भी हमने स्वदेशी आंदोलन की ताकत को इतिहास से जाना है । आयुध निर्माणियाँ अपने आप में स्वदेशी कारखाने का सबसे सटीक उदाहरण है ।

क्या हम इस विरासत को यूँही समाप्त होते देखते रहेंगे । क्या हमारा इसके अस्तित्व को संभाले रखने की जिम्मेदारी नहीं है । क्या हम 87000 कर्मचारी अपने परिवार व बच्चों के सपनों को यूँही उजड़ता देखेंगे । क्या हममें इतनी ताकत नहीं कि अपने अस्तित्व व सुरक्षित भविष्य की लड़ाई भी न लड़ सकें ।
यदि ऐसा हुआ तो आने वाली पीढ़ियों को हम क्या जवाब देंगे । जब वो हमसे पूछेंगे की जब 218 वर्षों की आयुध निर्माणियों की विरासत की अस्मिता लूटी जा रही थी तब आप कहाँ थे तो हम क्या हम उनके आँखों मे आंखे डाल कर कुछ कह पाने की स्थिति में होंगे ।

इतिहास में हर सफलता के पीछे के संघर्ष का कारण बहुत मामूली रहा है । यहाँ अब तक के सबसे आंदोलन जे पी आंदोलन का जिक्र करना चाहूँगा। बिहार के छात्रों और युवकों ने भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ 18 मार्च 1974 को जोदार आंदोलन शुरू किया, जिसका नेतृत्व बाद में जे पी बाबू ने किया और एक छोटे से आंदोलन ने 1977 के चुनाव के बाद देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार को जन्म दिया । हमें इतिहास से सबक लेने की जरूरत है ।

तो आइए मिलकर लड़ें , संघर्ष करें और उखाड़ कर फेंक दे निजीकरण के उस तलवार को जिसने हमारी रोजी रोटी हमारे परिवार की खुशियों और देश के सबसे पुराने सरकारी कारखाने को निजी हाथों में देने की साजिश को कागजी अमली जामा पहनाने में दिन रात एक कर दिया । आइये मिलकर लड़ें आयुध निर्माणियों के निजीकरण के खिलाफ ।

भारत माता की जय ।