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हाल में पश्चिम बंगाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद देश को दंगों, सांप्रदायिक नफ़रत और जातिवादी पक्षपात से आज़ादी दिलाने के लिये एक मुहिम चलाने की कोशिश की जा रही है।

आप सब इसका हिस्सा बनकर नया बदलाव ला सकते हैं।

दंगों के नाम, उनकी जगह और पीड़ितों की पहचान का उल्लेख किये बग़ैर कोशिश है कि देश इस वक़्त 'दंगा विरोधी बिल' की आवश्यकता को समझे और इसको पुरज़ोर तरीक़े से पास करवाने के लिये संसद पर दबाव बनाये। कुछ बुनियादी सवाल है जिनका जवाब देने की कोशिश की गई है।

  • क्या है दंगा विरोधी बिल ?

प्रिवेंशन ऑफ़ कम्यूनल वायलेंस (एक्सेस टु जस्टिस एंड रेपेरेशंस) बिल को सबसे पहले 2005 में लाया गया था। लेकिन काफ़ी फेरबदल के बाद इसे 2014 में संसद में पेश किया गया। बहस के दौरान कई दलों ने इसको एकतरफ़ा बताकर कई कमियां गिनाई। इस विरोध की वजह से बिल को वापस ले लिया गया था।

  • पहले दंगा विरोधी बिल को समर्थन क्यों नहीं मिला ?

कई दलों ने इस विधेयक का समर्थन किया, कई इसके विरोध में थे। उन्होंने इसे एकतरफ़ा और देश के संघीय ढांचे के लिये ख़तरा बताया था। विरोध करने वालों में बीजेपी सबसे आगे थी। आज पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बीजेपी की है। ऐसे में उसे पहल करके इस विधेयक को संशोधन के साथ दोबारा लाना चाहिये।

  • दंगा विरोधी बिल की ज़रूरत क्यों है ? 

2014 में जो विधेयक पेश किया गया उसमें कमियां हो सकती हैं और इनका निवारण करना संसद के हाथों में है। लेकिन इस बिल की ज़रूरत भारत के मौजूदा हालात को देखते हुए बहुत आवश्यक है। देश गवाह है कि अब तक हुए कई बड़े दंगों के दोषियों को आज भी सज़ा नहीं मिली है। जब सरकारी अधिकारियों को दंडित करवाने की बात आती है, आम लोग अदालत के चाहे जितने चक्कर लगाएं, वो इन्हें सज़ा नहीं दिला पाते। यह तथ्य स्वयंसिद्ध है। 
इस विधेयक के तहत विशेष अदालतें, विशेष जज और लोक अभियोजकों को उपलब्ध कराने का प्रावधान है। यह विधेयक धर्म, जाति और भाषा के आधार पर हुई हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाएगा। इसके अलावा यह विधेयक दंगों के दोषियों के साथ लचर कार्रवाई के लिये ज़िम्मेदार सरकारी अफ़सरों को सख़्त सज़ा सुनिश्चित करेगा। दंगों के वक़्त पुलिस-प्रशासन की अनदेखी या पक्षपात से ना केवल हिंसा बढ़ती चली जाती है बल्कि पुनर्वास भी असंभव हो जाता है। ये विधेयक सरकारों को जवाबदेह बनाएगा। यह विधेयक किसी भी तरह के दंगे में होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिये तय वक़्त में मुआवज़े और पुनर्वास के ठोस नियम तय करेगा। नियम सभी के लिये एक हों चाहे व वह अल्पसंख्यक समुदाय का हो या बहुसंख्यक समुदाय का। नया क़ानून लागू करने के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण की स्थापना होगी। ऐसे प्राधिकरण हर राज्य में भी होंगे। प्राधिकरण में हर वर्ग, धर्म, जाति के सदस्य होंगे। लेकिन सवाल है कि इस विधेयक के तहत बनने वाला राष्ट्रीय प्राधिकरण क्या मानवाधिकार आयोग जैसी दूसरी संस्थाओं की तरह प्रभावी ना रहा तो ? इसके लिये ज़रूरी है विधेयक को पूरी बारीकी से देखा जाये और इसकी कमियों को दूर करते हुए मज़बूत सिस्टम तैयार किया जाये।

इन उपरोक्त बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए मज़बूत 'दंगा विरोधी क़ानून' की ज़रूरत है जो ऐसी हिंसा के हालात में बिना धर्म, जाति और भाषा आधारित पीड़ितों को न्याय दिलाये।



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