कामयाबी

#TareekhNahinInsaf चाहिए: यौन हिंसा का सामना कर चुके बच्चों को तुरंत मिले न्याय

2,23,462 समर्थकों के साथ यह याचिका बदलाव लाई!


मैं उस समय बस 16 साल की थी जब मेरे घर से कुछ कदम की दूरी पर मेरे साथ छेड़छाड़ की कोशिश की गई। ये कोशिश एक ऐसे व्यक्ति ने की जिसे मैं ‘भैया’ कहकर बुलाती थी।

वो नवरात्री की आठवीं रात थी और मैं पड़ोस से डांडिया खेलकर अपने घर लौट रही थी। घर की ओर जाने वाली सड़क पर बहुत अंधेरा था और मुझे अकेले चलने में बड़ा डर लग रहा था। मैं कुछ दूर अकेले चली और तभी रास्ते में मुझे ‘भैया’ दिखे।

मेरी मदद करने के बहाने वो मेरे साथ गलत हरकत करने लगे। मुझे याद है कि उनकी पकड़ से भागने के लिए मैंने कितना संघर्ष किया था। मैं खुशकिस्मत थी कि उस रात बच गई, पर हमारे देश के लाखों बच्चे खुद को नहीं बचा पाते।

उस घटना को सालों गुज़र गए हैं पर आज भी उस व्यक्ति का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है और मैं सहम जाती हूँ। उस गली का सन्नाटा आज भी मेरे कानों में चीख बनकर गूँजता है। उस घटना के बाद से तो मैं शाम होने के बाद से ही घर से नहीं निकलती थी।

मेरा दिल दुखता है ये सोचकर कि मेरे देश में ना जाने कितने मासूम बच्चे यौन हिंसा का सामना करते हैं। यौन हिंसा अपने आप में बहुत भयावह होती है लेकिन इस हिंसा के बाद जो होता है, वो उससे भी भयावह है।

हिंसा का सामना करने वाले बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं और कुछ तो आत्महत्या जैसा बड़ा कदम भी उठा लेते हैं।

गुस्सा आता है कि ऐसे मामलों में भी सालों तक केस चलता है। मासूम बच्चों को छिपना पड़ता है और अपराधी आज़ादी से घूमते हैं। मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें ताकि अपराधी नहीं, बच्चे आज़ादी से घूमें।

यौन हिंसा को रोकने और इसका सामना कर चुके मासूम बच्चों को दोबारा एक हँसता-खेलता जीवन देने के लिए, अपराधियों को जल्द से जल्द सलाखों को पीछे भेजना होगा।

“तारीख पर तारीख!” हमारे देश में इस वाक्य को मज़ाक के तौर पर लिया जाता है। पर ज़रा उस बच्चे के बारे में सोचिए जिसको यौन हिंसा के बाद, बार-बार कोर्ट आना पड़ता है। जिसको न्याय नहीं, तारीख मिलती है। क्या ये उसकी तकलीफों का मज़ाक नहीं है?

इस ‘तारीख’ की वजह से ही ऐसे मामलों में माता-पिता केस नहीं करना चाहते। बार-बार कोर्ट आना, अपने बच्चे को टूटते हुए कौन देखना चाहेगा। हमें मिलकर इसे रोकना होगा।

मैं चाहती हूँ कि बच्चों को तारीख नहीं, तुरंत न्याय मिले। मैंने ये पेटीशन शुरू की है ताकि हर राजनीतिक दल बच्चों के केस के लिए और ज़्यादा फास्ट-ट्रैक अदालतों का वादा करें। ताकि पॉक्सो (POCSO) कानून के दायरे में आने वाले अपराधों में बच्चों को तुरंत न्याय मिले।

पॉक्सो (प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012) यानी लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 का गठन इसलिए हुआ था ताकि यौन हिंसा का सामना करने वाले बच्चों को जल्दी न्याय मिले। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ऐसे केस सालों तक चलते रहते हैं।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 17,3000 केस तो वहीं उत्तर प्रदेश में 15,900 और मध्य प्रदेश में 10,950 केस लंबित हैं। केरल,ओडिशा, कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और गुजरात में 3500-5000 मामले लंबित हैं।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों में बच्चों को जल्द से जल्द न्याय दिलाने की वकालत की है। देरी से न्याय मिलना, न्याय नहीं मिलने के बराबर है!

मेरी पेटीशन पर हस्ताक्षर कर इसे शेयर करें। आइये हम साधारण नागरिक मिलकर देश के बच्चों के लिए आवाज़ उठाएं, ताकि ये आवाज़ कानून बनाने वालों तक पहुँचे। आइये मिलकर कहें कि बच्चों के लिए #TareekhNahinInsaf चाहिए। #SheVotes2019



आज — Geeta आप पर भरोसा कर रहे हैं

Geeta J. से ".@narendramodi @rahulgandhi @manekagandhibjp @sushmitadevmp #TareekhNahinInsaf चाहिए: यौन हिंसा का सामना कर चुके बच्चों को तुरंत मिले न्याय" के साथ आपकी सहायता की आवश्यकता है। Geeta और 2,23,461 और समर्थक आज से जुड़ें।